ज़िंदगी


हाँ ! आज ही तो दिखी तुम
लोहे के जाली बंद
दरवाजे के उस पार
मुस्कुराती हुई उजली सी
वो श्वेत रंग था तुम्हारा
फिर भी हरा-भरा दिखा ।
कितनी मासूमियत से पूछा था
तुमने सवाल
क्यूँ हो मुझसे दूर
बंद सींखचों के साथ ?
बस, इतनी ही दूरी है
ख़त्म कर दो इसे ।
उठो ! आओ पास मेरे देखो
तुम पर भी ये रंग खूब फबेगा
और मैंने उठकर
खोल दिया दरवाजा
अब मुक्त था जीवन
खुश था ज़िंदगी के साथ ।
सही कहा था उसने
श्वेत रंग अपनी चमक से
हर रंग भर देगा
कर देती है ज़िंदगी हर रंग
को हरा-भरा वो भी अपने
श्वेत रंग के साथ….

11 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

11 responses to “ज़िंदगी

  1. come here after a long time .. hmmm kar deti hai hara-bhara apne shwet rang ke saath .. indeeed so very true

  2. जिंदगी और बता तेरा इरादा क्‍या है

  3. यशवन्त माथुर

    बहुत ही बढ़िया

    सादर

  4. कौन कहेगा, संग रहो मत, रंग बिरंगे मत होना,
    कौन सहेगा, मन जब भरकर, पूर्णरूप खो जायेगा।

  5. बन्द दरवाज़ों को खुद खोलना होता है…फिर तो जो है वह अदभुत है

  6. induji i come often but i leave without leaving a comment … this is one is just so true ..

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