है ऊँच गाँव ऊँचा जिसमे जन्मे थे राम विलास प्रवर


” है ऊँच गाँव ऊँचा जिसमे जन्मे थे राम विलास प्रवर “रमई काका की ये पंक्तियाँ आज अक्षरसः सत्य हो रही हैं और पूरे हिंदी संसार में राम विलास शर्मा जी के शताब्दी समारोह मनाये जा रहे हैं . उन्नाव जनपद के ऊँच गाँव सानीग्राम में १० अक्टूबर १९१२ को गयादीन शर्मा के पुत्र के रूप में राम विलास शर्मा जी का जन्म हुआ था.वर्ष १९३८ में लखनऊ विश्व विद्यालय से उन्होंने अंग्रेज़ी भाषा में पी.एच. डी की थी और वो लखनऊ विश्व विद्यालय से अंग्रेज़ी में पी.एच. डी पाने वाले प्रथम व्यक्ति थे .लखनऊ विश्व विद्यालय और बाद में आगरा में वो अंग्रेज़ी के प्राध्यापक रहे लेकिन उन्होंने अपने लेखन का क्षेत्र हिंदी भाषा को बनाया हरिवंश राय बच्चन जी की तरह . महा प्राण निराला के निकट संपर्क में रहे और निराला को अपनी लेखनी से अमर कर दिया .उनके रचना संसार में उपन्यास,प्रहसन,नाटक,कविता,जीवनी,पत्र,अनुवाद,निबंध,आलोचना,दर्शन और चिंतन के ग्रन्थ शामिल हैं और उनकी रचनाएँ आज हिंदी के मानक और सन्दर्भ ग्रन्थ माने जाते हैं . हिंदी जाति का इतिहास उन्ही में से एक है . साम्यवादी विचारधारा के होते हुए भी उनका दिल सदैव हिन्दुस्तानी रहा है उसकी प्रत्येक धड़कन में आजीवन भारतीय संस्कृति का ही आरोह अवरोह होता रहा . गीतकार शैलेन्द्र की यह पंक्ति उनके लिए अत्यंत उपयुक्त लगती है कि – ” सर पे लाल टोपी रूसी फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी “. अपने ६७ वर्ष के लेखन काल में उन्होंने १०० से अधिक पुस्तकें लिखी हैं वे ‘ तार सप्तक ‘ के कवियों में से प्रमुख हैं जहाँ आज के ज़माने में लोग सन्दर्भ ग्रंथों में और मंचो पर छपने तथा जमने के लिए अनेक कसरतें करते हैं वहीँ पर उन्होंने अपने एक पत्र में लिखा था कि ” मुझे बैसवारा के कवियों में न शामिल किया जाये क्यूंकि मैंने कविताएँ बहुत कम लिखी हैं”. उनके ऐसे विचार पढ़कर बरबस ही गोस्वामी तुलसीदास जी याद आते हैं कि – “कवी न होऊं नहीं चतुर कहाऊँ ” . आज उनके जन्म दिवस पर उनके ही शब्दों में उन्हें याद करना प्रासंगिक होगा – ” मै चाहूँगा कि मुझे बिल्कुल याद न किया जाए इसके बजाय मै जिन समस्याओं को हल करने में लगा रहा या जिन प्रश्नों पर सोचता-विचारता लिखता रहा उन्हें याद किया जाए “

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6 टिप्पणियाँ

Filed under अभिलेख

6 responses to “है ऊँच गाँव ऊँचा जिसमे जन्मे थे राम विलास प्रवर

  1. एक उत्तम लेखक-कवी को एक उत्तम आदरांजली |

  2. मैं भी बहुत प्रभावित हूँ। पड़ोस का ही हूँ !
    उन्हें नमन ।

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