तोहफ़ा ये कैसा तूने दिया है मुझे ….


वेदना का गहना न पसंद है मुझे
उपहार सिर्फ यही, क्यूँ भाया तुझे ।

तूने दिया है किसी को दे सकूँ न मै
तोहफ़ा ये कैसा ,तूने दिया है मुझे ।

अब लाऊँ कहाँ से हँसी की वो खनक
पिघलते मोतियों ने गलाया है मुझे ।

रूंधती आवाज़ लगती अब न मीठी
कड़वे जेवरों ने , यूँ दबाया है मुझे ।

शून्य आँखों से रोशनी भी दिखती नहीं
बिन जली लौ ने कुछ यूँ जलाया है मुझे ।

अब जिएँ कैसे भला ये भी तो बता दो
तेरे बिन जीना ही ,कभी न आया मुझे ।

14 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

14 responses to “तोहफ़ा ये कैसा तूने दिया है मुझे ….

  1. आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 24/10/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

  2. “रूंधती आवाज़ लगती अब न मीठी,कड़वे जेवरों ने , यूँ दबाया है मुझे.” अंतर-पीड़ा को सहज में झलका रही है यह पंक्ति. हर शे’र भावाभिव्यक्ति में सफल है. अच्छा लगा पढ़ना.

  3. Amit Agarwal

    अब लाऊँ कहाँ से हँसी की वो खनक
    पिघलते मोतियों ने गलाया है मुझे ।
    …bahut hi sundar likha hai, Indu!

  4. bahut sundar indu ji …………..waah

    शून्य आँखों से रोशनी भी दिखती नहीं
    बिन जली लौ ने कुछ यूँ जलाया है ………..bahut sundar

  5. बहुत सुंदर भावों से भरी गज़ल ….बहुत खूब इंदु जी ..!!

  6. आपके इस दर्द ने, निम्न लाइने लिखवा दीं , समर्पित हैं आपको !

    कदम क्यों लडखडाते हैं,निराशा के समंदर में
    हमें लोगों ने अक्सर वेदना, में हँसते पाया है !

  7. यशवन्त माथुर

    वाह क्या बात है

    विजय दशमी की हार्दिक शुभ कामनाएँ!

  8. बेहतरीन रचना…
    विजयदशमी की शुभकामनाएँ!!🙂

  9. अनाम

    वाह बहुत खूब
    कमाल की रचना…

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