हे मानव !


उठो हटा दो सारे काँटें
पथ पर बिखरे यहाँ-वहाँ
धूल के संग मिल धूल बनो तुम
नहीं निर्जीव जीवन से धरा
कुछ गड्ढे हैं छुपे हुए
भरी धूल से दबे हुए
चट्टानों से पैर जमा दो
हिला सकें न कोई तूफाँ .
श्रष्टि तुम्ही हो,प्रकृति तुम्ही से
न उलझो किसी माया में तुम
पाँव फैला कर घने वनों सा
सब को संग ले उड़ो तुम
निराशा चाहे प्रीत तुम्हारी,करती खेल अजब
उसमे भी आशा भर जाए ऐसे खेल खेलो तुम
उठो संभालो इस जहाँ को
कहीं बिखर न जाए तम
हे मानव ! मानव बन जाओ ,मानवता ले आओ तुम …

17 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

17 responses to “हे मानव !

  1. I loved this one….please write few more inspirational or “veer-ras” poems for me 🙂

  2. anju(anu)

    ईश्वर में आस्था का प्रतीक …..बेहद सटीक

  3. निराशा चाहे प्रीत तुम्हारी,करती खेल अजब
    उसमे भी आशा भर जाए ऐसे खेल खेलो तुम………..

    har bar aap jeevan ki aas jagane wale bate karte hai
    Adhbhut ………..
    Mai ne jeena sekh liya ab manav ban ne ke koshis suru hai…
    Sadhuwad

  4. अनाम

    हर मुश्किल में सदा आगे बढते रहने कि प्रेरणा देती हुई सुन्दर रचना |

  5. एक कदम बढाओ – फिर रुक नहीं सकोगे , अपनी इंसानियत पर तुम्हें भी नाज होगा

  6. Each line reminds me hindi poems we used to read during childhood..and its one of the best creations of yours….wow!!!

  7. बहुत बढ़िया प्रेरणा संचरण करती रचना …

  8. सुंदर अभिव्यक्ति … मानवता की और अग्रसर ….good going Indu ji..!!

  9. वटवृक्ष की तरहमुझ पर छाये रहेमुझमें प्राण-संचार करते गए ……………अत्यंत भावपूर्ण आत्मीय पंक्तियाँ कह गए आप. मन को सुकून मिला.

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s