बाहों में तेरी सिमट गया था जहाँ


बाहों में तेरी सिमट गया था जहाँ
ख़ुशबू से तेरी था महका बागवाँ ।

आँखों से तेरी यूँ उतर आए जज़्बात
इक पल ठहर गया वक्त का कारवाँ ।

गर्म पानी था निकला जब कोर से कहीं
तेरी होठों की प्यास का था दरिया वहाँ ।

आगोश में तेरे, लगा मुक्त है जीवन
था बंधन तेरे जाने के साथ ही वहाँ ।

कुछ ख़्वाब हैं अधूरे कुछ थोड़े-थोड़े पूरे
हैं संग शेष तेरे बसाने को अपना जहाँ ।

14 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

14 responses to “बाहों में तेरी सिमट गया था जहाँ

  1. ‘आगोश में तेरे, लगा मुक्त है जीवन,था बंधन तेरे जाने के साथ ही वहाँ .’ सुन्दर पंक्तियाँ.

  2. यशवन्त माथुर

    कुछ ख़्वाब हैं अधूरे कुछ थोड़े-थोड़े पूरे
    हैं संग शेष तेरे बसाने को अपना जहाँ ।

    बेहद खूबसूरत!

    सादर

  3. आगोश में तेरे, लगा मुक्त है जीवन
    था बंधन तेरे जाने के साथ ही वहाँ ।

    chanbhangur jeevan ka sacha chitran kiya hy ,,,
    बेहद खूबसूरत

  4. बाहों में तेरी सिमट गया था जहाँ
    ख़ुशबू से तेरी था महका बागवाँ ।कुछ ख़्वाब हैं अधूरे कुछ थोड़े-थोड़े पूरे
    हैं संग शेष तेरे बसाने को अपना जहाँ ।…प्यार कितना भी हो फिर भी कम रह दिल के अरमा …प्यार के रूप का अंत कहां ………………..बहुत सुंदर भाव आपकी रचना के इंदु जी ..

  5. Mohit Kr. Sharma

    गर्म पानी था निकला जब कोर से कहीं
    तेरी होठों की प्यास का था दरिया वहाँ ।
    very lovely lines.

  6. गर्म पानी था निकला जब कोर से कहीं
    तेरी होठों की प्यास का था दरिया वहाँ ।
    बहुत अद्भुत अहसास…सुन्दर प्रस्तुति ..आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये. मधुर भाव लिये भावुक करती रचना,,,,,,

    दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये आपको और आपके समस्त पारिवारिक जनो को !

    मंगलमय हो आपको दीपो का त्यौहार
    जीवन में आती रहे पल पल नयी बहार
    ईश्वर से हम कर रहे हर पल यही पुकार
    लक्ष्मी की कृपा रहे भरा रहे घर द्वार..

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