सारे रसों से परिपूर्ण …


सारे रसों से परिपूर्ण
जन्म लिया इंसान ने
ले कुछ का रसास्वादन
वो भर गया अभिमान में ।

शांत रस दब गया
फ़ीकी सियाही की तरह
रौद्रता ने भिगो दिया
नग्न जिस्म की तरह ।

श्रृंगार रस फैला है
प्रकृति में चंहु ओर
इंसान ने देहं सजा ली
किसी मकान की तरह ।

करुण रस जोड़ा गया
नारी से ममत्व रूप में
इंसान से बस जुड़ा वो
किसी दिखावे की तरह

न जाने कितने रसों से
है भरा हर इंसान
न दिखता आज फिर भी
सिर्फ इंसान की तरह ।

13 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

13 responses to “सारे रसों से परिपूर्ण …

  1. यशवन्त माथुर

    न जाने कितने रसों से
    है भरा हर इंसान
    न दिखता आज फिर भी
    सिर्फ इंसान की तरह ।

    आज के समय का यही सच है।

    सादर

  2. rajtela1

    saarthak rachnaa….
    कब इंसान में इंसान बसेगा ,
    कब इंसान इंसान बनेगा
    वक़्त के खेल का नज़ारा तो देखो,
    ऊपर वाले की इच्छा का,
    हिसाब तो देखो
    ये कैसा वक़्त आया है?
    प्यार में नफरत का नाम आया है,
    विश्वास में विश्वाश्घात आया है
    मनों में दरार का सैलाब आया है,
    दिलों में में नफरत का तूफ़ान आया है
    खुदा तुझ से मुखातिब हूँ
    या जवाब दे दे,या हालात को बदल दे
    इंसान को इंसान बना दे,
    नफरत को प्यार से भर दे
    मुलाक़ात जब भी होगी,
    बात दो टूक होगी,
    इंसान में इस बदलाव का,
    राज बता दे
    निरंतर इबादत करता हूँ,
    इस इंतज़ार में ज़िंदा हूँ
    कब तेरा दिल पसीजेगा,
    कब इंसान में इंसान बसेगा,
    कब इंसान,इंसान बनेगा

  3. गहनता लिये बेहद सशक्‍त भाव रचना के …
    अनुपम प्रस्‍तुति

  4. anju(anu)

    खूबसूरत सोच को लिए एक सम्पूर्ण अभिव्यक्ति

  5. वाह!, बेहद सजीव चित्रण|
    “Nature gives all with reservation,
    and loses nothing,
    Man graspes all,
    and looses everything!”

  6. अनाम

    insaan ne deh saja li …kisi makaan ki tarah ..best line.

  7. suneel yamdagni

    इंदु जी बहुत सुंदर रचना लिखी हें आपने …पर जब उन्नति अहंकार बन जाती है तब मानवता ,मानवता की दुश्मन बन जाती हें तब एक इंसान का मिलना मुस्किल हो जाता हैं

  8. you write very well. Aapki kavitayin bhi sabhi rason se pariporn hain.

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