बौखलाया है पुरुष


नारी शरीर तिलिस्म सा
बौखलाया है पुरुष।
नग्न कर प्रक्रति को भी
न संतुष्ट हो पाया है पुरुष।
लालायित इनके नेत्र
बिम्ब देखना क्या चाहें
लज्जा की आँखें क्यों
न ले पाया है पुरुष।
कामुक तृप्ति क्षणिक को ही
जीवन मान लिया
ऊर्जा की गहराइयों तक
न पँहुच पाया है पुरुष।
बलशाली जिस्म ले
निकला है तन कर
मजबूत डोर प्रक्रति की
न समझ पाया है पुरुष !!!

कल रात के हादसे के बाद …………………

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22 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

22 responses to “बौखलाया है पुरुष

  1. ये कविता नहीं है सीधा दिल से निकले शब्द हैं ,दर्द है एक औरत का !!!
    बात सब को एक तराजू में तौलने की नहीं है,जब दर्द होता तब कहाँ है ठीक-ठीक कोई नहीं बता सकता ,उसके आस-पास का पूरा घेरा ही उस चपेट में आ जाता है बस !!!
    किसी की भावनाओं के ठेंस पंहुचाने के लिए नहीं लिखा है।

    सादर

  2. But its wrong….i mean according to your poem …all men are same….and all men should be blamed for what happened …….though majority of men think people doing this kind of things should hanged …..nothing less than that…even people are talking about “death by stoning” …i can understand your feelings….and such incident hurt us(men) too….and i guess more than a women……Just think if a muslim is terrorist then according to your poem all muslims are terrorist which is not true …..I don’t like to generalize anything…. I want those bastard to be hanged ….

    • बात ये नहीं कि हर मुस्लिम आतंकवादी है ,बात ये है की इसी वजह से हर मुस्लिम को ये दर्द पीना पड़ता है जबकि वो भी देश के लिए हमसे कम जज़्बा नहीं रखते। यहाँ हर पुरुष की बात नहीं है किन्तु हैं तो वो पुरुष ही ना !! फिर उनके लिए अलग से नाम कहाँ से आयेंगे ???
      बात फिर वही है कि नारी का दर्द,अपमान एक तरह से मौत एक ही पल में हो जाती है और वो भी ऐसे ही कुछ पुरुषों की वजह से। आप की या अन्य किसी की भावनाओं को ठेंस पंहुचाने का कोई इरादा नहीं है …

      सादर

  3. suneel yamdagni

    एक नारी के अपने सुंदर भाव रचना के रूप मैं 🙂

  4. प्रवीण पाण्डेय

    दुखद और घृणित

  5. लज्जित है आज सारा पुरुष वर्ग इंदु जी ..और क्या कहूँ कुछ कहते नहीं बनता !

  6. it is true that every rapist is a man. So, I would not say that your generalisation is wrong. Today any Indian man worth his salt stands ashamed.

  7. आदमी वहशत जदा होता गया – मंदिर और मस्जिद दुआ करते रहे|

  8. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 22/12/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

  9. very nicely written poem, Indu. It was required at this time. Will it ever stop. Will we stop being an object, a target and finally be acknowledged as a human.

  10. something on the same lines i’ve written on my blog ..

    sad state of our country !!! 😦

  11. शर्म से इंसानियत झुकी रो रही है |

  12. नरपिशाच

    इंसान हो रहा क्यों आज अंधा
    क्यों लूट रहा प्रकृति का श्रृंगार
    कहाँ चली गयी वो संस्कृति
    कहाँ चला गया वो सम्मान

    नारी को है रौंद रहा
    नरपिशाच का मिथ्याभिमान
    नारी क्यों है इतनी कमजोर
    क्यों पुरुष को पहचानती नहीं

    नर क्यों हो रहा इतना प्यासा
    नारी देह का क्यों सम्मान नहीं
    पुरुष क्यों समझता नहीं ये बात
    नारी ही इस सृष्टि का आधार

    नारी से सृष्टि पालन होता
    नारी से ही जग आगे बढता
    नारी न हो तो नर कहाँ
    नारी के बिना जीवन कहाँ

    रिश्तों का जो करते खून
    क्या मानव वो कहलाते
    मानव की देह में छिपे
    नरभेङिए वो कहलाते

    आतंक के साये में जीती
    नारी को क्यों तौल रहा
    गर बन ये रणचंडी तो
    भूल जाएगा तू अपना अस्तित्त्व

    सुनी थी एक कहावत हमने
    देती जो नारी को सम्मान
    जहाँ जहाँ है रहती नारी
    रहते वहाँ संग उनके देवता

    अब तो कहावत बदल गयी
    नारी की पहचान बदल गयी
    नारी के इर्द-गिर्द अब
    नर पिशाच है मँडराते फिरते

    कानून भी नहीं देता न्याय
    नर पिशाच हैं खुले घूमते
    देनी होगी ऐसी उनको सजा
    नहीं नोंच सकेँ फिर नारी देह को।

    -सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

  13. anju(anu)

    दिल से निकले इन शब्दों के दर्द को समझ रहें है, हम सब और अब महसूस भी कर रहें है

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