कुछ समझ नहीं आ रहा अब !


कुछ समझ नहीं आ रहा अब
हे देवी! आखिर कब, काली रूप धरेंगी आप ?
या हमे ही करना होगा नर संहार !!!
हर समझ, नासमझ हो रही अब
दर्द ही रेत रहा अपनी तलवार
हे देवी ! अब तो करो प्रहार।
शक्ति कहाँ है ? ये पूछते हैं हम
माँ ! आओ ना, न करो इंतज़ार
कुछ समझ नहीं आ रहा अब !
आपका रचा ये कैसा संसार ???
गर्व था कि हम, हैं आपका रूप
असहाय कितने हुए, हैं लाचार हम
काश ! निकल आयें हमारे भी नए हाँथ
सजे हों शस्त्र जैसे ढाल तलवार
कर दें त्रिशूल हम भी हर बुराई के पार
हे माँ ! आ भी जाओ अब
नहीं कोई दूजा हमारा खेवनहार !!!

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18 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

18 responses to “कुछ समझ नहीं आ रहा अब !

  1. यशवन्त माथुर

    आपका यह प्रश्न उठाना स्वाभाविक है,

    सादर

  2. hmmm, sometimes I wonder if this everything is mythology after all. What else remains to happen invoke her wrath!

  3. सामयिक और महत्वपूर्ण पुकार इंदु जी! ये वेदना व्यर्थ न जायेगी !!

  4. आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 26/12/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

  5. हर नारी में है माँ , काली माँ , बस उसे जानने और जगाने की देरी है |

  6. praveen

    this is an obvious question coming out of all the Indians. its high time, something needs to be done. something is rotting in the indian society.

  7. ओह!
    यह असहायता सोची हुई असहायता है, समझी हुई असहायता नहीं! और अगर दिक्कत सोच या समझ से भी हो तो नादान बन कर ही क्यों नहीं…..कदम तो उठना ही चाहिए!
    पुकार तो हमारा स्वीकार है! अब चित्र-लिखित प्रतिरोध सजीव हो रहा है। गर्व तो हमें अब भी है, आपको भी होगा, होते रहना चाहिए!

    इस चिट्ठे पर पहले नहीं आया था शायद! आता रहूँगा।

  8. कुछ समझ नहीं आ रहा अब !………..kya kahun 😦

  9. अन खुद से तलवार उठाने का समय आ गया है.

  10. सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
    :पोस्ट : “जागो कुम्भ कर्णों” , “गांधारी के राज में नारी ”
    ‘”क्या दामिनी को न्याय मिलेगी ?” http://kpk-vichar.blogspot.in

  11. माँ तो अपने आप में नारी का रूप है … नारी को स्वयं ही दुर्गा, काली का रूप लेना पड़ेगा …

  12. हर नारी को धारणा होगा काली का रूप …कोई अलग अवतार उतार कर नहीं आने वाला … सुंदर रचना

  13. नारी खुद देवी रूप है जरुरत है तो बस उसको अपनी शक्ति को समझने की ,नारी को अबला समझने कि भूल करने वाले मुर्ख है बस वो तो अभी तक सहनशीलता का दामन थामे हुयी है जिस दिन उसने ये सहनशीलता का दामन छोड़ दिया उस दिन क़यामत आ जायेगी !!

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