सविता


सविता पढ़ाई का ‘ प ‘ भी नहीं जानती
स्कूल जो नहीं गई कभी
वह मंझली है भाई बहनों में
बड़ा भाई बी .ए .  कर चुका
छोटी बहन ग्यारहवीं में है
बाप रिक्शा चलाता है
माँ घर संभालती है
और सविता !
सविता घर चलाती है
खर्चे बढ़ गए हैं बहुत
भाई के कपड़े और
फोन के पैसे भी।
बहन पढ़ती है पर
चाहती नहीं पढ़ना
बनना संवरना भाता है उसे
उम्र ही ऐसी है।
सविता करती है साफ़
दूसरों के घरों को
जूठन को उनकी
नहीं आती उसे कोई कोई घिन
रगड़-रगड़ कर चमकाती है
तवे – कड़ाही को
गीली फर्श पर बिछ जाती है
उसे ठण्ड भी नहीं लगती
उसे शर्म भी नहीं लगती ।
बर्तन साफ़ नहीं झाड़ू ठीक
से नहीं लगाई –
सुनना उसकी आदत में है शामिल
आज देर से क्यों आई या
कल छुट्टी क्यों चाहिए
जैसे सवाल झुक जाते हैं
उसके अड़ियल जवाब के समक्ष।
चार-चार घरों में काम करती है वो
सवालों – जवाबों की आदी है वो।
कमाती है पाँच हजार हर महीने
चलाती है  माँ – बाप का घर हर महीने
खुद पहनती है दूसरों की उतरन
लगा देती है जीवन अपनों को सजाने में।
शादी की उम्र है पर, शादी भला कहाँ
भाई की नौकरी ही माँ – बाप का अरमाँ
करेगी इंतज़ार , कर रही है वो
कोई तो सुबह हो जो उसके लिए हो।
सविता चुप रहती है
बोलना उसे नहीं भाता
उसका मौन अपने साथ
हर बवंडर को पी जाता
कभी – कभी हौले से मुस्काती है जब
ज़िंदगी भी उसके समक्ष ठगी रह जाती है तब !!!

22 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

22 responses to “सविता

  1. उसका मौन अपने साथ
    हर बवंडर को पी जाता …..

    Aah !!! This is sheer bliss 🙂

  2. एक आम से किरदार में जो खास बात है उसे बहुत सहजता से पेश कर रही है नज़्म..इस अभिव्यक्ति की अपनी एक संवेदना और गहराई है. अच्छा लगा पढ़ना.

  3. भावमय करते शब्‍दों का संगम …

  4. anita

    सजीव चित्रण इंदु जी!
    सबको अपने-अपने घरों की सविता याद आ गयी होगी!
    ~सादर!!!

  5. आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 16/01/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

  6. मन में जग का बोझ उठाये,
    अपने बिम्बों में सकुचाये।

  7. बेहद सहज रचना, सविता की स्थिति पर अफ़सोस भी होता है और उसकी हिम्मत पर फक्र भी|

  8. The last two lines made me get goosebumps. You’re amazing Ma’am 🙂

  9. यशवन्त माथुर

    बेहतरीन।
    काश इस जैसी कई सविताओं की मनोदशा को हम सभी वास्तव मे समझ पाते।

    सादर

  10. anju(anu)

    जीवन में हर सविता की एक सी ही कहानी है ….दिल को छू लेने वाली

  11. Vandana Grover

    बहुत सुन्दर ..सविता की सादगी की तरह मन को मोहने वाले ..
    कहीं गहरे तक छू गए शब्द

  12. Such a wonderfully touching and sensitive poem …. totally loved its simplicity 🙂 .. thanks for sharing !

  13. aap ko mae jb bhi pdhta hu,naya naya sa mehsoos krta hu….kamaal ki lekhni hae apke paas…likhte rahiye.

  14. बहोत ही सरल तरीके से अंतर्मुख करनेवाली लाजवाब प्रस्तुती |

  15. खुद को भूली या खुद को ढूंढती अपनों की खुशी में
    बेहद भावपूर्ण रचना.आभार हलचल का यहाँ तक लाने के लिए.

  16. कभी – कभी हौले से मुस्काती है जब
    ज़िंदगी भी उसके समक्ष ठगी रह जाती है तब !!!
    अंतिम पंक्तियाँ बहुत मार्मिक …. हर सविता की सटीक कहानी ।

  17. Mukesh Mishra

    मार्मिक अनुभूतियों और अनुभवों से जोड़ती आपकी यह कविता इंदु जी, एक तरफ मन को विकल करती है तो दूसरी तरफ संवेदनों की परिधि को बड़ा बनाती है । इसमें सच्चाई है, तनाव है, अलग-अलग तापमान हैं; लेकिन इसकी मुख्य विशेषता इसमें अभिव्यक्त होती पारदर्शिता है |

  18. वास्तविक स्थिति से व्यथित एक सह्रदय मन की भावनाएं ..सुन्दर रचना

  19. chandrakanta

    कभी – कभी हौले से मुस्काती है जब
    ज़िंदगी भी उसके समक्ष ठगी रह जाती है तब !!!
    कठोर यथार्थ के बीच आशाओं बुनती अभिव्यक्ति …

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s