ज़िंदगी का तो मकसद फैलाना रिफ़ाह है।


माना हर आँख में यहाँ अश्क़-ए-तिम्साह है,
शिआर-ए-मुसव्विर उकेरना खालिस निगाह है।
कूँची में भरे रंग बस कहते हैं यही सबसे,
ज़िंदगी का तो मकसद फैलाना रिफ़ाह है।
सब बह चले उधर हैं जिस तरफ़ है हुकूमत,
ये बदलते ज़माने की बदलती रियाह है।
हथियार भी उठाना जब लाज़िम नहीं था,
हर लफ्ज़ हम पे बरसा तब बनके रिमाह है।
वतन की खातिर इंदु जो शहीद हो गए हैं,
माँ के कलेजे में बसा उनका जिबाह है।
~इंदु~

तिम्साह – मगरमच्छ
मुसव्विर – चित्रकार
शिआर – आदत
रिफ़ाह – भलाइयाँ
रियाह – हवाएँ
रिमाह – शक्तियाँ , बरछे
जिबाह – माथा ,ललाट

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8 टिप्पणियाँ

Filed under गज़ल

8 responses to “ज़िंदगी का तो मकसद फैलाना रिफ़ाह है।

  1. anju(anu)

    शब्द-अर्थ के साथ समझने और पढ़ने में अच्छी लगी ……

  2. अनाम

    माना हर आँख में यहाँ अश्क़-ए-तिम्साह है,
    शिआर-ए-मुसव्विर उकेरना खालिस निगाह है ……..

    वतन की खातिर इंदु जो शहीद हो गए हैं,
    माँ के कलेजे में बसा उनका जिबाह है …………
    बहुत सुंदर …..चन्द शब्दों में मुकम्मल कर दिया सच के सत्य और हकीकत का दिखावा करते झूट को …………….

  3. आपने लिखा….हमने पढ़ा….
    और लोग भी पढ़ें; …इसलिए शनिवार 20/07/2013 को
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    पर लिंक की जाएगी…. आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ….
    लिंक में आपका स्वागत है ……….धन्यवाद!

  4. Sanjay bhaskar

    प्रशंसनीय रचना – बधाई
    शब्दों की मुस्कुराहट पर …. हादसों के शहर में 🙂

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