हैपी इंडिपेंडेंस डे !


कितना आसान है ना, स्वतंत्रता दिवस मनाना।
एक आयोजन, कुछ भाषण, झंडारोहण साथ ही जन – गण – मन
और रंगों से भरे तिरंगे को लहरा देना।
किस तरह देश आजाद हुआ
कितनी कुर्बानियां शहीदों ने दीं
कैसे अंग्रेज़ी हुकूमत से निजात मिली सभी को पता है
और जिन नौनिहालों को नहीं पता
उन्हें हर साल बताया जाता है ये सब !
सारी देश भक्ति सारे कर्तव्य बस यहीं तक तो सीमित रह गए हैं।
स्वंत्रतता दिवस हो या गणतंत्र दिवस
तरह – तरह की विभिन्न प्रान्तों की झाँकियाँ , रंगारंग कार्यक्रम सारा माहौल देश भक्ति में डूबा
ठीक वैसे ही जैसे हर शाम वागा बॉर्डर पर गूँजते
देश भक्ति के गान।
कभी – कभी लगता है कितना आसान है ना
देश के लिए लिखना, वीर रस में लिखना
जोशीला लिखना, जबकि
बेहद मुश्किल है सच में, ” सच ” लिखना
कलम की ताकत कभी कम न थी
कभी कम होगी भी नहीं लेकिन इस ताकत
को अधिक ताकतवर बनाने की ज़रुरत है।
ऐसा क्यों है कि बस अगस्त और जनवरी के महीने में ही
जन – जन को, लेखक को, रचनाकार को देश के प्रति
अपना कर्तव्य नज़र आता है
अखबार , किताबें , टेलिविज़न सभी अचानक
देश भक्ति, देश प्रेम से भर जाते हैं और कहीं
कुछ इससे अलग देश के हालात पर
हास्य – व्यंग्य करते नज़र आते हैं
एक होड़ सी लगी है सबमें कि किसकी टी . आर . पी .
सब पे भारी ….
कौन सा चैनल सबसे आगे, किसकी रचना है दमदारी।
ऐसा क्या है जो कहा नहीं गया अब तक
ऐसा क्या है जो लिखा नहीं गया अब तक
और ऐसा क्या है जिसे बार – बार याद न दिलाया गया हो अब तक
फिर भी ….याद क्यों नहीं आज किसी को ?
सफ़ेद कुर्ता -पैजामा , खादी ,तिरंगी टोपी या हाँथ में झंडा
आज तक बस यही बना हुआ है आजादी का गर्व
सवाल ये कि इसे धारण करने वाले कब गर्वित करेंगे इसे।
देश को तो आजाद करा लिया लेकिन स्वयं को कब तक जकड़े रखना है बुराई में !!!
भ्रष्टाचार से आजादी कब मिली है, अभी तो बहुत कुछ बाकी है
फिर कैसे कह देते हैं हम
हैपी इंडिपेंडेंस  डे !
उस वक्त हम किस की बात कर रहे होते हैं ….
स्वंत्रतता दिवस, देश आजाद हुआ। गणतंत्र दिवस, संविधान लागू हुआ किंतु दोनों का मेल आज तक न हुआ … !!!

6 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

6 responses to “हैपी इंडिपेंडेंस डे !

  1. असल में हमारा देश तो बहुत पुराना है। पर 26 जनवरी और 15 अगस्त अंग्रेजी हुकूमत की वजह से हमारे लीये देश भक्ति के benchmark बन गए हैं। हम लोग अभी तक अंग्रेजों का बनाया हुआ system ही इस्तेमाल कर रहे हैं। जबकि आज की ज़रूरत के हिसाब से सब कुछ बदलने का समय आ गया है। ये हमारी विडम्बना ही है की हमारा बुद्धिजीवी वर्ग नौकरी करने में लगा/मजबूर है और देश की कमान बंदरों के हाथ में है जो की ठीक से संसद भी नहीं चला पा रहे हैं , देश क्या चलाएंगे।

  2. काश, यदि ऐसा हो पाता, सब एक दिशा में चल पाते।

  3. यशवन्त माथुर

    स्वतन्त्रता दिवस की शुभ कामनाएँ!

    कल 15/08/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

  4. लगता है स्वंत्रता भ्रम है,
    केवल राज बदला राजा नहीं
    पहले से अधिक धन लोलुप,निरंकुश , कर्तव्य से दूर
    ..सार्थक रचना ,बधाई

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