ज़िंदगी तेरे समक्ष !


हर बार सोचती हूँ रहूँगी और सचेत
हर बार फिर भी ठगी रह जाती हूँ
ज़िंदगी तेरे समक्ष !
कि अब बस और नहीं
मत करो ऐसा लेकिन
तू ढीठ ठगती है हर बार
पहले से कहीं अधिक !
तैयार करती हूँ खुद को तेरे
हर प्रहार के लिए लेकिन
तू करती कहीं ऐसी चोट
जो दिखती नहीं बस
तोड़ देती है मेरा हर पहरा
कर देती है मुझे नि:शब्द !
सोचती हूँ तुझे जियूँ प्यार करूँ तुझसे
लेकिन फिर तेरा रूप डराता है
चोट भी करता है और मैं
रह जाती हूँ स्तब्ध !
कभी-कभी चाहती हूँ तोड़ दूँ तुझे
किसी सूखी कमज़ोर लकड़ी की तरह
कभी-कभी ये भी सोचती हूँ कि
क्यों है तू इतनी सख्त क्या
पाषाण भी तुझसे हारे हैं या
इंसानों पर जीत ही तेरे रुतबे का कारण है
कायर कहूँगी तुझे मैं फिर भी
छुप कर प्रहार करने से कब कोई
वीर कहलाया
हाँ, तू खुश रह अपनी विजय पर
और ठगती रह हमें ज़िंदगी बन
ज़िंदगी भर …

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26 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

26 responses to “ज़िंदगी तेरे समक्ष !

  1. आपने लिखा….
    हमने पढ़ा….और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए बुधवार 04/09/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in ….पर लिंक की जाएगी. आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ….लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

  2. अनाम

    ज़िन्दगी भी बाध्य है यूँ करने के लिए

  3. abhi786786

    वाह वाह
    बेहद लाज़वाब प्रस्तुति
    अपनी लिखी पंक्ति साझा करने की अनुमति चाहता हूँ :
    ”ज़िन्दगी सुन ! तू हादसों का सफ़र है।
    ये सफ़र ऐसा की, न कोई हमसफ़र है।

  4. suneel yamdagni

    सुंदर अभिव्यक्ति …..जिन्दगी का आईना दिखाती ..आईने के अन्दर खड़ी मैं …खुद को समझाती जिन्दगी हूँ मैं

  5. नया इम्तिहान लेती है जिंदगी … वो ऐसे ही है … उसे ऐसे ही जीना होता है …

  6. किसको मै अच्छा कहूँ ? हर पंक्ति दिल में उतर गयी ,बहुत उम्दा रचना।
    कभी यहाँ भी पधारें।
    सादर मदन
    http://saxenamadanmohan1969.blogspot.in/
    http://saxenamadanmohan.blogspot.in/

  7. anju(anu)

    जिंदगी कुछ अलग रंग में ….बहुत खूब

  8. अनाम

    jab tak sans hai tab talak likhanaa or jeevan hai
    jaane kab sans ka saath hai
    God Bless you
    Raghvendra

  9. Shubhashish Pandey 'Aalsi'

    सोचती हूँ तुझे जियूँ प्यार करूँ तुझसे
    लेकिन फिर तेरा रूप डराता है
    चोट भी करता है और मैं
    रह जाती हूँ स्तब्ध !

    sundar abhiyakti

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