मेरे ख़्वाब !


लो बना लिया ख़्वाबों को
पत्थर का मैंने
दुनिया सिर्फ एक शीशा
नज़र आती है अब
जैसे कि झेल ही न सकेगी
मेरे एक छोटे से ख्वाब को भी
यदि उछाल दूँ उसकी तरफ
बिखर जायेगी
कई – कई हिस्सों में.
शीशे में सब दिख रहा है
अपने पत्थर रुपी ख़्वाब भी
और ज़िंदगी की सारी चालाकियाँ भी
ज़िंदगी घबराई हुई है कि कहीं
उस पर न आ गिरे कोई ख्वाब
और ख्वाब
मुस्कुरा रहें हैं क्योंकि
नहीं लग रहा उन्हें कोई डर.
मालूम है उन्हें
न तोड़ सकेगा कोई
न मिटा सकेगा कोई
अमर रहेंगे वे सृष्टि के साथ सदा
ख़त्म होगी ज़िंदगी
पर कभी न ख़त्म होंगे मेरे ख़्वाब !

14 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

14 responses to “मेरे ख़्वाब !

  1. suneel

    बहुत सुंदर इंदु जी …ख्वाबो को जोड़ कर एक ख्वाब बनाया है हकीकत से आज मैने खुद को रूबरू कराया है तब जाकर इस दुनियाँ को खेल समझ आया हैं

  2. Yashwant Yash

    ख्वाब खत्म होने भी नहीं चाहिये।

    सादर

  3. आपने लिखा….
    हमने पढ़ा….और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए बुधवार 25/09/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in ….पर लिंक की जाएगी. आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ….लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

  4. बेहतरीन रचना, इंदु जी| “पत्थर के ख़्वाब” बड़ा अनोखा और साहसी विचार है|

  5. सुन्दर रचना । अच्छा लिखती हैं आप ।

    मेरी रचना:- http://pradip13m.blogspot.com/2013/09/awadh.html (चलो अवध का धाम)

  6. आपके ब्लॉग को यहाँ शामिल किया गया है । जरुर पधारें और फोलो कर उत्साह बढ़ाएं । http://pksahni.blogspot.com (ब्लॉग”दीप”)

  7. anju(anu)

    ख्याबों को कितना भी उछालों…पर वो अपने ही रहेंगे

  8. अनाम

    ek bahut hi sunder rachna indu ji ……khwaaboN ko unki raah dena koi mamooli baat nahi…………..phir ik aisa shabd dena…..jisey insaan sochne par mazboor ho jaaye…our us shabd ko soch par ek nayii rachna ko anjaam dene keliye uksa dena…….waah …merii jaanib se dhairoN daad….wasool paaiyega …

    Sabhaar

    Harash Mahajan

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