धर्म पर लिखूँ तो…


धर्म पर लिखूँ तो हालात बिगड़ जाते हैं ,
देश पर लिखूँ तो धर्म झगड़ जाते हैं ।

प्रेम पर लिखूँ तो बस प्रेम ही प्रेम है ,
छल पर लिखूँ तो ये तार उधड़ जाते हैं ।

समंदर पर लिखूँ तो बेहिसाब खज़ाने हैं ,
साहिल पर लिखूँ तो खज़ाने बिछड़ जाते हैं ।

मौसम पर लिखूँ तो किस मौसम पर लिखूँ ,
जिन पर न लिखूँ वो मौसम अकड़ जाते हैं ।

लिखने को तो चाहे कितना भी झूठ लिख दूँ ,
मग़र इंदु की कलम है,सब झूठ पकड़ जाते हैं ।

10 टिप्पणियाँ

Filed under गज़ल

10 responses to “धर्म पर लिखूँ तो…

  1. क्या बात है इंदु जी! बेहद सटीक और बेख़ौफ़ कविता|

  2. सबके स्वार्थ रह रह के हिलोर लेते हैं..

  3. Kalipad 'prasad'

    बस आप लिखता जाइये ,किसी का परवा मत कीजिये |
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