फ़िक्र नहीं मुझे…


तेरे वजूद को समेट लिया है खुद में
मेरा वजूद तू हुआ अब फ़िक्र नहीं मुझे
तेरे हर शब्द हर भाव को जी लिया है
दुनिया करे जो बातें अब फ़िक्र नहीं मुझे
मेरी यादों में पलते हैं तेरे होश सारे
जहाँ कहे मुझे बेहोश अब फ़िक्र नहीं मुझे
इक हूक भरी आवाज़ उठती है तुझमे भी
तू रहे  इससे बेखबर अब फ़िक्र नहीं मुझे
तेरे ज़हन से ना हटेंगे कर लो चाहे कुछ भी
लाख करो इंकार इकरार की फ़िक्र नहीं मुझे
कभी तो कहोगे बेसब्र होकर तुम भी
इस जनम या उस जनम  अब फ़िक्र नहीं मुझे…

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11 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

11 responses to “फ़िक्र नहीं मुझे…

  1. Yashwant Yash

    अच्छा है फिक्र होनी भी नहीं चाहिये 🙂

    सादर

  2. Yaar Indu…mere pas tareef k liye words nahi hai ..This was amazing !!!!!!

  3. suneel

    Waah……….bhaut sunder rachna…………khoobsurat bahv sunder ehsaas ke saath

  4. कभी तो कहोगे बेसब्र होकर तुम भी
    इस जनम या उस जनम अब फ़िक्र नहीं मुझे…

    Nice poem humesha ki tarah 🙂

    visit my blog pl.
    http://sunnymca.wordpress.com

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