नज़्म


चाहत यही
कि गुज़रे एक शाम
तुम्हारे साथ
करूँ महसूस
ज़मीं से ऊपर उड़ रहे कदमों को
हवा से लहराता हुआ बदन
कानों में गूँजता मल्हार.
चाहत ये भी कि
ठण्ड से सख्त हुए गालों पर
गर्म सेंक तुम्हारे हाथों  की
और झुकी बंद पलकों पर
अनगिनत बोसे लबों के .
चाहत ज़रा सी
शामें अनगिनत
ढल जाएगी ज़िंदगी
ऐसी ही शाम में
कि चाहत फिर भी
रहेगी ज़िन्दा
गुज़रे एक शाम तुम्हारे साथ ……!

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9 टिप्पणियाँ

Filed under नज़्म

9 responses to “नज़्म

  1. Suneel

    सुंदर एहसास से लबालब सुंदर नज़्म

  2. अज़ब चाहतें, अज़ब अहसास…अद्भुत नज़्म!!

  3. युवराज नवीन सिंह

    यहाँ लेखिका की लेखनी जिस प्रेम की अनुभूतियाँ देतीं हैं आज के समय में इस निश्चल प्रेम को सोचना क्या संभव है?????
    ईश्वरीय कृपा माँ सरस्वती का सम्पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त हुआ है मैम्म।
    आप के माँ-बाप ने कोहिनूर को जन्म दिया है। ऐसी हीं बेटीयाँ जो कुल को कई सौ वर्षों तक के लिए एक याद दे कर जातीं होंगी और धरती से जाने के बाद भी कई कई पीढ़ियों में किताबों के माध्यम से जीवित रहतीं है।
    आज सहर्ष कहना चाहता हूँ यह क्षत्रिय कुमार युवराज नवीन सिंह कवित्री के प्रत्येक पोस्ट का इंतजार करेगा। आज पढ़ा और फैन हो गया इंदू आपका।

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