आहिस्ता – आहिस्ता !


जैसे ही सिल के दाँत
घिसने लगते हैं
उसे फिर से छिदवाती है औरत
पत्थर पर चलती हुई
छेनी और हथौड़ी की मार
थोड़ा खुरच देती है सिल को
और बार – बार लगातार
प्रहार के बाद
तैयार होती है सिल
पूरी तरह
अब जो चाहे पीसो
पिसेगा
पहले थोड़ी खिसकन
ज़रूर निकलेगी
आहिस्ता – आहिस्ता
सब गायब !
तैयार की जाती  है औरत
भी इसी तरह
रोज छेदी जाती है
उसके सब्र की सिल
हथौड़ी से चोट होती है
उसके विश्वास पर
और छेनी
करती है तार – तार
उसके
आत्म सम्मान को
कि तब तैयार होती है
औरत पूरी तरह
चाहे जैसे रखो
रहेगी
पहले थोड़ा विरोध थोड़ा दर्द
ज़रूर निकलेगा
आहिस्ता – आहिस्ता
सब गायब !

6 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

6 responses to “आहिस्ता – आहिस्ता !

  1. तैयार की जाती है औरत
    भी इसी तरह
    रोज छेदी जाती है
    उसके सब्र की सिल
    हथौड़ी से चोट होती है
    उसके विश्वास पर
    और छेनी
    करती है तार – तार
    उसके
    आत्म सम्मान को
    कि तब तैयार होती है
    औरत पूरी तरह
    चाहे जैसे रखो
    रहेगी
    पहले थोड़ा विरोध थोड़ा दर्द
    ज़रूर निकलेगा
    आहिस्ता – आहिस्ता
    सब गायब !

    एकदम सही लिखा है इंदु ! आपकी यह रचना पाठक के मन-मानस को पूरी तरह से झकझोरती है, यह एक ऐसा सच है जो पढ़ने में सोचने में बहुत कटु लगता है लेकिन है तो सच ही !

    आज का समाज सिर्फ मॉर्डर्न होने का दिखावा करता है, प्रगतिशील विचारों का ढिंढोरा पीटता है लेकिन क्या सचमुच हमारी सोच बदली है या फिर इस समाज ने बड़ी चालाकी से नारी के कार्य क्षेत्र को तो विस्तृत कर दिया है लेकिन उसे उसका देय उसे देने से नकार दिया है सच कहा जाए तो नारी आज भी दोयम के दर्जे से बाहर नहीं निकल पायी है। आज प्रगतिशीलता के नाम पर देखा जाये तो क्या बदला है…. घर के अन्दर, घर के बाहर …. यदि महिलाओं के बाहरी आवरण, पहनाव उढ़ाव , बोल-चाल को छोड़ कर देखें तो आज भी कमोबेश स्थिति वही है …. यदि पूरे परिदृश्य का ठीक से आंकलन किया जाये तो महिला जन्म दर, जनसँख्या अनुपात, बालिका शिशु मृत्यु दर जैसे आंकड़े स्थिति साफ़ करने के लिए काफी होंगे …. और अंततः सच तो यह है कि आज भी स्थिति कुछ ख़ास नहीं बदली है … कुछ अपवादों को छोड़ कर आज के उन्नत समाज में भी महिलाओ की स्थिति उतनी ही विचारणीय है जितनी पहले थी।

    खासतौर से यदि महिलाओं की सुरक्षा की बात करें तो स्थिति और भी भयावह है …महिलाओं के साथ होने वाली अप्रिय घटनाओं की तो जैसे बाढ़ सी आ गयी है, एक घटना पर अभी पूरी तरह से कानून और इन्साफ की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती कि कई कई और घटनाएं घट जाती हैं. और ये सब हालात इस बात की तसदीक़ करते हैं कि जो आपने लिखा है अक्षरशः सत्य है .

  2. DR.SAURABH DAYAL

    best aahista-aahista on sil=aurat..
    wah ek sundar aur sahi rachna.
    DR.DAYAL

  3. बहुत गहरी बात कही है आपने, सिलबट्टा और चक्की, पीसने के लिये रुक्ष होते हैं लोग।

  4. dnaswa

    गहरी और संवेदनशील … औरत हमेशा से ही सताई कई है … हर रूप में ….
    अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति …

  5. बार – बार लगातार
    प्रहार के बाद
    तैयार होती है सिल
    पूरी तरह
    अब जो चाहे पीसो
    पिसेगा
    पहले थोड़ी खिसकन
    ज़रूर निकलेगी
    आहिस्ता – आहिस्ता
    सब गायब !

    …..सशक्त अभिव्यक्ति के लिए आपको बधाई…..
    -‘सुधि’

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