गाँव की लड़की


याद आ गई खाते हुए कैथा 
लाल मिर्च वाले नमक के साथ
और सुनाई दी उसकी
तेज़ मिर्च वाली
चटकारे की चटाक  !
फिर फीते से बंधी
तेल लगी कसी हुई
दो चोटियाँ
बीच में सीधी सपाट
उसकी माँग
जैसे बंटे 
 हो दो हिस्से
और एक भी बाल को
इजाज़त नहीं पार करने की
वो बाड़ !
बैठी दो सहेलियों के साथ
चटाचट खेलती गुट्टों की आवाज़
चट -चट …….ख़ट-खट
खिलखिलाती उन्मुक्त हँसी
वो खनकती आवाज़ !
नीला कुर्ता सफ़ेद सलवार

कुर्ते में चिमटी से लगाया हुआ दुपट्टा
जाती हुई स्कूल अपने
छोटे भाई-बहनों के साथ
जैसे जाना है किसी और ही जहान
बस उड़ान को
तैयार हो रहे पंख !
चूल्हे में कंडे सुलगाती
फुंकनी से फूंक मारती

चिमटे से लकड़ी सुधारती
धुँए से आँखों को मचलती

और फिर जलते चूल्हे पर
रखती हुई अदहन चावल का 
काटती हुई साग
एक साथ

सारा काम कर लेने का
विश्वास !

मोटा लगा आल्ता
चौड़ी सी पाजेब और
तीन -तीन बिछुए
लाल साड़ी सपाट माँग में
आखिर तक भरा सिन्दूर

माथे पे बड़ी सी बिंदी
कलाइयों में भरी चूड़ियाँ

ओढ़े हुए पिछौरी
लम्बा सा घूँघट
थोड़ी हील की चप्पल
एक नया ही रूप !
 फिर सुखाती हुई कथरी
गोद में बच्चा
चढ़ा चूल्हा, चौका-बासन
बिखरे बाल
अधखुला शरीर
घुटने तक चढ़ी बिना फ़ॉल की साड़ी
बटोर रही हैं आँगन
आँचर में अभी भी बंधा है कैथा

कि खाएगी फुरसत में कभी
हाँ वही गाँव की लड़की !

12 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

12 responses to “गाँव की लड़की

  1. I don’t think you belong to a village? do you?
    In either case….awesome depiction 🙂 🙂
    jeevit kavit would be best remark according to me !!

  2. घुटने तक चढ़ी बिना फ़ॉल की साड़ी
    बटोर रही हैं आँगन
    आँचर में अभी भी बंधा है कैथा
    कि खाएगी फुरसत में कभी
    हाँ वही गाँव की लड़की !——
    bahut sunder man ko chhuti hui rachna—–badhai

  3. Suneel

    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति अल्हड़ बचपन को माँ का रूप लिए …… टूट टूट कर बिखरती रही सजाती रही अपने आंगन को …. क्या वो सिर्फ एक गाव की लड़की थी ??……नहीं वो बचपन से निकली एक औरत थी माँ के रूप में रिश्तों में बंधी …. जो भूल जाती हैं अपने बचपन को उफ़ न करती निभाती रहती अपनों के जुल्म को …

  4. गांव की मीठी की सुगंध लिए बहुत सुन्दर रचना …
    एक जीता जागता चित्र आँखों में उभर आया …

  5. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति—
    — गोद में बच्चा
    चढ़ा चूल्हा, चौका-बासन
    बिखरे बाल
    अधखुला शरीर
    घुटने तक चढ़ी बिना फ़ॉल की साड़ी–
    BADHDAI AUR SHUBH KAMNAYEN
    -OM SAPRA
    DELHI-9
    M- 9818180932

  6. स्वयं आपसे इस कविता को सुनना सुखद रहा…:)

  7. संजय भास्‍कर

    सलाम। बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर आया हूं। व्यस्तताओं और उलझनों में फंसा मन आपकीकविता में इस कदर उलझ गया कि खुद को भूल गया। बहुत ही अच्छी कविता। बधाई।

  8. अनाम

    a lovely picturisation of a village girl of India. There is a poem known as lonely reaper, I had read in my schooling days. I just got reminded of it.

  9. bahut sundar, sahaj bhasha, jaise bina kisi makup, singar ke alhad gori
    …. ladki ke jeevan ko kahani kisse sa baanchti yah kavita.. bahut gahre tak man ko chhoo gayi Indu …. itni sundar rachna likhne ke liye hriday se badhai … bas yun hi likhti raho …

    sasneh
    Manju

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