कैक्टस के फूल


मैंने तुम्हे चाहा
और तुमने
मुझे चुभन दी
मैंने सोचा
तुम काँटों में घिरे हो
तुम्हे नर्म अहसास दूँ
तुमने मेरे जज़्बात को
काँटों से भेद दिया
मुझे तकलीफ हुई
तुम मुस्कुराए
तब समझ आया कि
इतने काँटे
तुमने क्यों हैं लगाए
खुद तो नर्म बिस्तर पर
कटे तुम्हारी ज़िंदगी
सहानुभूति बटोरने को
हैं इतने दाँव बिछाए
जो भी करीब आए
उसे चुभ – चुभ जाए
कैक्टस के फूल
मैंने तुम्हे चाहा ….!!!

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7 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

7 responses to “कैक्टस के फूल

  1. VP

    Hi Indu,At first i should show agreement with you that poetry is not wilfully written,it is just like natural water fall! So far this poetry is concerned,it is very touchy.

  2. आपकी लिखी रचना शनिवार 20 सितम्बर 2014 को लिंक की जाएगी……….. http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ….धन्यवाद!

  3. Suneel

    बहुत ही सुन्दर अर्थपूर्ण, प्रेम भाव को समझती रचना ..

  4. संजय भास्कर

    बहुत ही सुन्दर शब्द विन्यास और उससे भी सुन्दर भाव और उनका प्रस्तुतिकरण । बहुत बहुत बधाई !

  5. praveen rakesh

    kavita cactus ke phool shaandar hai,,main yahan apke profile pic ke uppar ki line likhi hai uske liye hun,, “Kavita likhi nahi jaati swatah likh jati hai” jab puri kavita 4 shabdon se buni hai tab sochta hun kuch adhura sa hai is pankti mein”kavita likhti nahi swatah likh jati hai” parantu nazariya”Kavita likti nahi ath likhwati hai”

  6. cactus ke phool– ek achhi aur prabhav shali kavita hai– bhav pooran rachna ke liye badhai–
    –om sapra,
    sahitya sachiv,
    mitra sangam patrika,
    N-22, dr. mukherji nagar,
    delhi-9
    m- 9818180932

  7. प्रेम कैक्टस की तरह ही खिलता और पनपता है –
    प्रेम के भीतरी मन को टटोलती भावुक रचना
    बेहद सुंदर और प्रभावी भाव —
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    सादर —

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