सच है …!


सच लिखना मुश्किल नहीं
सच पढ़ना बेहद कठिन
सच कहना भी मुश्किल नहीं
पर सच सुनना
उससे भी कठिन !
बस इसी खातिर
लिखा जाता रहा झूठ
कहा जाता रहा झूठ
अपनी सहूलियतों के लिए
ज़िंदगी के दुर्गम रास्तों पर
आसानी से चलता रहा झूठ
सच है कि सब झूठ है और
झूठ है कि सब सच !
सिवा इसके कि शब्दों के
वर्ण हैं सच
शब्दों के मायने ….बचे अब शेष नहीं ….!!!

24 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

24 responses to “सच है …!

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 9-10-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा – 1761 में दिया गया है
    आभार

  2. “ज़िंदगी के दुर्गम रास्तों पर,आसानी से चलता रहा झूठ”…Wah kya khoob kaha hai!

  3. रोहिताश वर्मा

    बेहतरीन रचना
    चर्चा मंच पर प्रकाशित होने की बधाई स्वीकार करें.

    कृपया पधारें सब थे उसकी मौत पर (ग़जल 2)

  4. sahi kaha aapane…
    sach ki paribhasha kafi sachhi hain
    Hi I am back to blogging check my blog at
    http://drivingwithpen.com/

  5. ज़िंदगी के दुर्गम रास्तों पर
    आसानी से चलता रहा झूठ
    सच है कि सब झूठ है और
    झूठ है कि सब सच !—– इसी सच से तो हम सब छले जा रहें हैं
    प्रभावी और मन को आंदोलित करती कविता —
    सादर

  6. Suneel

    सही कहा सच कभी बदलता नहीं यह बात अलग हैं कि हर किसी को भाता नहीं..

  7. Jhuth Jarurat ho gayee sach sapna sa huaa….. Ek Dum Sahi Likha Hai Aapne.

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