रिश्तों की रजाई


रजाई की गरमाहट है अब भी वही

न कोई परिवर्तन

समय के साथ

बस रूप बदले

कभी खद्दर , कभी वेलवेट

और कभी सिल्क

रुई से भरी वजन में भारी

बेहद हलकी पॉलीफ्रिल वाली

जब भी आगोश में जाएँगे

आप उसके

वही गरमाहट वही सेंक

आज भी

मगर रिश्तों की रजाई !

न पहले सी गरम

न पहले सी भारी

न कोई परिवर्तन

हुआ उसके रूप में

फिर भी …

कम हुई गरमाहट बोलो कब कहाँ

रिश्तों की रजाई में

अब ठण्ड का बसेरा है

खोजती है वो भी

इक ताप गरम सेंक की !

 

 

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3 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

3 responses to “रिश्तों की रजाई

  1. suneel

    Bahut sunder abhiyakti…par kab kaha aur kaise kya badal gaya na jaane kyo iska ehsaas bahut der se hota hain….

  2. सिमिट गए हैं रिश्ते बस अपनों के बीच … ख़तम हो गई उनकी गर्मी …

  3. bahut khub darshaya aapne rishton ki ahmiyat. aapki lekhni prabhavit karti hai..aur aap meri one of fav blogger hai.. 🙂 likhti rahiye aur khush rahiye

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