कच्ची मिट्टी थी !


कच्ची मिट्टी थी

पकने को डाल दिया

तपती आँच पर

तपो – पको

हो जाओ थोड़ा सुर्ख

थोड़ा मज़बूत कि

कच्ची मिट्टी को 

कोई भी रौंद सकता है

लेकिन पक्की ?

कौन बतलाए कि

तोड़ सकता है उसे भी कोई

एक ही झटके में

बिखर जायेगी

कई – कई टुकड़ों में

मिट्टी है

मिटना ही उसकी नियति !

 

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6 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

6 responses to “कच्ची मिट्टी थी !

  1. Bohot accha likha aapne. Very very nice and loved reading it. Thank u for the share.

    • कसरत चाहे कितनी कर लो ,
      जीवन को खुशियों से भर लो,
      फर्क कहाँ कुछ पड पाता है
      मिट्टी का तन मिट जाता है |

      चाहे आगे जो कुछ जो हो जाए,
      अभी देह यह चाहे क्षय हो जाए ,
      सुख साधन एकत्रित करने से,
      बोलो कब मानव रह पाता है ?

  2. suneel

    कड़वा सच मन का दर्द लिए …….. जब तक इसको नियति मानते रहोगे बदलाब असंभव हैं

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