सफ़र …


काश ! ज़िंदगी
सुपरफास्ट ट्रेन सी होती
वातानुकूलित
शयनकक्ष में बैठाकर
पँहुचा देती
गंतव्य तक
यात्रा
कितनी आरामदायक होती
थोड़ा विलंब
शायद वहाँ भी होता
किंतु
इतना तो नहीं ….
मालगाड़ी सी ज़िंदगी
कोयले से भरी
तपती है धूप में
जलती है
भीगती है
सूखती है
उछलती है
गिरती है फिर भी
ख़त्म नहीं होती
बड़ा लंबा सफ़र
तय करना होता है ….!!!

7 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

7 responses to “सफ़र …

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 25 – 08 – 2016 को चर्चा मंच पर चर्चा – 2445 {आंतकवाद कट्टरता का मुरब्बा है } में दिया जाएगा |
    धन्यवाद

  2. Kulamani Das

    hann – this is true that —-jidegi main ***Badalamba safar tay kar na ho ti hai*****

  3. Kulamani Das

    hann – this is true that —-jindegi main ***Badalamba safar tay kar na ho ti hai*****

  4. सफ़र तो अपने तय समय से ही होता है … चाहे धीरे या तेज़ … मंजिल पे आने के बाद फिर खाली लगता है …

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s