क्या दिन क्या रात


पूस की रात
नील गाय आतीं
और साफ़ कर जातीं पूरे के पूरे खेत
फागुन माह
दंगाई आए और
उजाड़ दी बस्तियाँ
ख़त्म कर दिया लोगों को
उनकी आजीविका को !
नील गायों के लिए
हल्कू,जबरा सब पहरा देते
अब दंगाइयों के लिए पहरे हो रहे
नील गायों से जितना किसान परेशान थे
आज दंगाइयों से हर इंसान
नील गायों का झुण्ड आता
दंगाइयों की भीड़ आती है
पूस की रात फागुन के दिन और रात में
तब्दील हो गई !

3 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

3 responses to “क्या दिन क्या रात

  1. BookMark

    बहुत ही सशक्त पंक्तियाँ ,और बहुत ही गहरी बात कह दी आपने। अब पढ़ते रहनेगे आपको

    पसंद करें

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