अभिधा या व्यंजना


व्यंजना से कविता चमत्कृत हो न हो
पाठक ज़रूर अचंभित हो जाता है।
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व्यंजना और अभिधा का कोई मेल नहीं है।
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दुनिया व्यंजना है यह बात अभिधा को मालूम है।
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अभिधा व्यंजना से कोसों दूर रहती है।
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व्यंजना के संसार में अभिधा खिलौना भर है
जब चाहे जैसे खेलो और खत्म कर दो ।
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अभिधा का खत्म होना व्यंजना के लिए सुखद है।
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यह बातें सुन लक्षणा मुस्कुरा रही थी।

2 टिप्पणियां

Filed under कविता

2 responses to “अभिधा या व्यंजना

  1. वाह इंदु जी, शब्द शक्तियों अथवा शब्द व्यापार का इतना ख़ूबसूरत विवेचन कविता के माध्यम से… बहुत सुन्दर…

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