Category Archives: अभिलेख

गुरुजनों को सादर नमन !


आज गुरु पूर्णिमा है . आज के दिन मै सभी गुरुजनों को सादर स्मरण , नमन और कृतज्ञ भाव से वंदन करती हूँ . जीवन में एक गुरु से काम नहीं चलता बल्कि जीवन पर्यंत गुरु चाहिए होते हैं जो हमे सही दिशा , सही मार्ग दिखाते हैं .
गुरु वो नहीं जो शिष्यों का अंबार लगाए बल्कि अच्छा गुरु शिष्य नहीं बनाता, वो तो शिष्य को गुरु बना देता है अपना सर्वस्व निछावर कर देता है . शिष्य को गुरु की तलाश नहीं करनी होती बल्कि गुरु स्वयं अपना शिष्य खोज लेता है , द्रोणाचार्य स्वयं हस्तिनापुर गए थे , भगवान् राम को भी विश्वामित्र ने चुना था .
गुरु अपना सर्वस्व दे देता है बस शिष्य के अंदर श्रद्धा और पात्रता होनी चाहिए इसका सबसे बड़ा उदाहरण एकलव्य है जिन्होंने द्रोणाचार्य से सारी शिक्षा, श्रद्धा भाव से ही प्राप्त की थी .
अंत में आज गुरु पूर्णिमा के दिन सभी गुरुजनों को सादर नमन और वंदन !

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शुभ दीपावली


जीवन की व्यस्तताओं, परेशानियों और दुखों के बावजूद पर्व अपना आगमन नहीं रोकते क्योंकि हर पर्व का उद्देश्य एक ही होता है सदा जन हित। हर घर में, हर इंसान में खुशियाँ भरने की कोशिश करते हैं पर्व। सुख-दुःख ,जीवन-म्रत्यु सभी निश्चित है, मालूम भी है सभी को फिर भी हम भूल जाते हैं और यदि हम दुखी होते हैं तो सारे संसार को उसी नज़र से देखते हैं ,पर्व ऐसे हर पलों को हर किसी के जीवन से निकालने में मदद करते हैं। त्यौहार कभी अमीरी-गरीबी का भेद नहीं करते बल्कि दोनों को उनकी सामर्थ्य अनुसार भरपूर जीने का सन्देश देते हैं। त्यौहार कोई भी क्यूँ न हो सदा सभी लोग मुंह मीठा ही करते हैं कभी भी तीखा नहीं, फिर चाहे वो पिस्ता लौंज से किया जाये या गुड की ढली से फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मुंह में जो घुलती है वो ‘ मिठास ‘ ही होती है। सभी व्यस्त हैं अतः पर्व आते ही घरों की साफ़-सफाई भी शुरू हो जाती है। त्यौहार के दिन घर-परिवार, रिश्तेदार,पड़ोसी सभी में एकजुटता और लगाव इतना भर जाता है कि शायद ही कभी और देखने को मिले। हर पर्व का असर उसके आगमन से पूर्व और पश्चात भी शेष रहता है, ज़रुरत बस इसे सहेजकर रखने की होती है जो कि हम समय के साथ भूलने लगते हैं और शायद तभी हमे याद दिलाने के लिए फिर से किसी दूसरे पर्व के आगमन की सूचना मिल जाती है। दुर्गा पूजा,दशहरा,बकरीद,दिवाली,क्रिसमस ,होली ,ईद आदि-आदि अनेक पर्व आते रहते हैं, हमे ये याद दिलाने कि प्रेम की निधि ही जीवन की अमूल्य निधि है और हम इसे संभाल कर रखें,बांटे एक दूसरे के साथ। हर पर्व अनगिनत संदेशों को समेटे हुए लाता है अपनी झोली में और हर सन्देश भरा होता है जीवन के विविध रंगों से। दीपावली का पर्व भी उन्ही में से एक है इस पर्व की खूबसूरती यही है कि सभी के जीवन को प्रकाशित करना है। जहां जितना हो सके दिए की लौ को जलना है। कोई फर्क नहीं पड़ता कि दिया शुद्ध घी से जलाया है या कि तेल से,या दिया है ही नहीं मोमबत्ती जलाई है,या वो भी नहीं है तो सबसे बड़ी लौ आशा और उम्मीद की जलाई है उद्देश्य जीवन रुपी दिए की जलाये रखना है, जिस तरह घर के कोने के अंधियारे को दिए की लौ ख़त्म कर देती है उसी तरह आशा और हिम्मत की लौ भी प्रकाशित कर देती है जीवन के अंधियारे को।

दिए जलें या न जलें अब,खुशियों की लौ को जलाना है
इस दिवाली लें शपथ अब मन का अंतरदीप जलाना है
हो जाएगा जगमग जीवन जिस दिन,इस जग में सबका
पर्व करेंगे अभिमान हम पर,यही मान हमें अब दिलाना है …

दीपावली की अनंत ज्योति भरी शुभकामनाएँ –

सादर-सस्नेह
आपकी इंदु

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है ऊँच गाँव ऊँचा जिसमे जन्मे थे राम विलास प्रवर


” है ऊँच गाँव ऊँचा जिसमे जन्मे थे राम विलास प्रवर “रमई काका की ये पंक्तियाँ आज अक्षरसः सत्य हो रही हैं और पूरे हिंदी संसार में राम विलास शर्मा जी के शताब्दी समारोह मनाये जा रहे हैं . उन्नाव जनपद के ऊँच गाँव सानीग्राम में १० अक्टूबर १९१२ को गयादीन शर्मा के पुत्र के रूप में राम विलास शर्मा जी का जन्म हुआ था.वर्ष १९३८ में लखनऊ विश्व विद्यालय से उन्होंने अंग्रेज़ी भाषा में पी.एच. डी की थी और वो लखनऊ विश्व विद्यालय से अंग्रेज़ी में पी.एच. डी पाने वाले प्रथम व्यक्ति थे .लखनऊ विश्व विद्यालय और बाद में आगरा में वो अंग्रेज़ी के प्राध्यापक रहे लेकिन उन्होंने अपने लेखन का क्षेत्र हिंदी भाषा को बनाया हरिवंश राय बच्चन जी की तरह . महा प्राण निराला के निकट संपर्क में रहे और निराला को अपनी लेखनी से अमर कर दिया .उनके रचना संसार में उपन्यास,प्रहसन,नाटक,कविता,जीवनी,पत्र,अनुवाद,निबंध,आलोचना,दर्शन और चिंतन के ग्रन्थ शामिल हैं और उनकी रचनाएँ आज हिंदी के मानक और सन्दर्भ ग्रन्थ माने जाते हैं . हिंदी जाति का इतिहास उन्ही में से एक है . साम्यवादी विचारधारा के होते हुए भी उनका दिल सदैव हिन्दुस्तानी रहा है उसकी प्रत्येक धड़कन में आजीवन भारतीय संस्कृति का ही आरोह अवरोह होता रहा . गीतकार शैलेन्द्र की यह पंक्ति उनके लिए अत्यंत उपयुक्त लगती है कि – ” सर पे लाल टोपी रूसी फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी “. अपने ६७ वर्ष के लेखन काल में उन्होंने १०० से अधिक पुस्तकें लिखी हैं वे ‘ तार सप्तक ‘ के कवियों में से प्रमुख हैं जहाँ आज के ज़माने में लोग सन्दर्भ ग्रंथों में और मंचो पर छपने तथा जमने के लिए अनेक कसरतें करते हैं वहीँ पर उन्होंने अपने एक पत्र में लिखा था कि ” मुझे बैसवारा के कवियों में न शामिल किया जाये क्यूंकि मैंने कविताएँ बहुत कम लिखी हैं”. उनके ऐसे विचार पढ़कर बरबस ही गोस्वामी तुलसीदास जी याद आते हैं कि – “कवी न होऊं नहीं चतुर कहाऊँ ” . आज उनके जन्म दिवस पर उनके ही शब्दों में उन्हें याद करना प्रासंगिक होगा – ” मै चाहूँगा कि मुझे बिल्कुल याद न किया जाए इसके बजाय मै जिन समस्याओं को हल करने में लगा रहा या जिन प्रश्नों पर सोचता-विचारता लिखता रहा उन्हें याद किया जाए “

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आज तुलसी जयंती है,पूरे देश में लोग रामचरिमानस क पाठ करते हैं किन्तु कहीं कोई तुलसीदास जी को न ही फूल चढ़ाता है न ही कही उनकी कोई तस्वीर पर फूल-माला…

हृदयानुभूति

वरेण्य वाणी पुत्र गोस्वामी तुलसी दास के साहित्य पर सर्वाधिक शोध कार्य हुए हैं,परंतु यह विडम्बना है कि इस महापुरुष का जीवन आज तक निर्विवाद नहीं है उनकी जन्म तिथि तथा पुण्य तिथि भी निर्विवाद नहीं है कुछ लोग उनका निधन श्रावण शुक्ल
सप्तमी को मानते हैं तो कुछ लोग उनका निधन-सावन कृष्णा तीज शनि को।
इसी प्रकार उनका जन्मस्थान भी निर्विवाद नहीं है। राजापुर(बाँदा चित्रकूट),राजापुर पसका(गोंडा)तथा सोरों(सूकर क्षेत्र जिला एटा)
नामक तीनों स्थान इस बात का सर्वाधिक दावा करते हैं कि तुलसी दास का जन्म उन्हीं के यहाँ हुआ था और सबके पास अपने-अपने अकाट्य तर्क और प्रमाण हैं।इन सभी स्थानों पर तुलसी दास द्वारा आरोपित तथा स्थापित बट वृक्ष तथा बजरंग बली की मूर्तियाँ हैं,सूकर क्षेत्र ,तुलसी की ससुराल या ननिहाल भी निकट है।मानस की हस्तलिखित प्रतियाँ है तथा उनके गुरु नरहरि दास का आश्रम या पाठशाला भी है।एटा,गोंडा तथा बाँदा के जिला गजेटियर में भी किसी न…

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माँ का प्यार


कोशिश है कि माँ के लिए अपने दिल के जज़बात परोस सकूं जबकि यह मालूम है चाहे कितना ही कहूँ कम ही होगा। शुरुआत कहाँ से करें ये भी समझ नहीं आ रहा,पर हाँ इतना अवश्य मालूम है कि माँ में ही दुनिया है इसके अतिरिक्त और कहीं नही। जब हम छोटे थे तब माँ का सारा स्नेह सिर्फ माँ की एक जिम्मेदारी लगता था उसके भाव तो अब समझ आते हैं। सुबह की प्यार भरी’चूम’के साथ माँ का प्यार,नाश्ते में बनी पसंद की चीज़ों में माँ का प्यार,भले-बुरे की डाँट में माँ का प्यार,जीने का सलीका सिखाता माँ का प्यार,अपने हर गम को छुपाता माँ का प्यार,अपनी हर पसंद को दबाता,अपनी तकलीफ खुद ही सहता माँ का प्यार,गर्म दिनों में आँचल से हवा करता माँ का प्यार,सर्द रातों में यूँ खुद से चिपकाती माँ का प्यार,हर मंदिर में दुआ करती माँ का प्यार,सुबह चुपके से उठकर रसोंई बनाती माँ का प्यार,हलवा खाने की चाह पर उसे परोसती माँ का प्यार,कमज़ोर शरीर से भी ताकत दिखाती माँ का प्यार,बच्चों के दूर जाने का दर्द सहती,उनके लिए लड्डू,मठरी बनाती नम आँखों से दुआएं देती माँ का प्यार,हर तरक्की पर दौड़ मंदिर में घंटा बजाती माँ का प्यार,पापा की डाँट से बचाती,हमारे लिए खुद ही लड़ जाती माँ का प्यार,हर एक फोन के अंत में”खुश रहो बेटा”
कहती माँ का प्यार,अपनी हर पसंद की चीज़ को यूँ ही न्यौछावर करती माँ का प्यार,अपने जीवन की हर साँस से सिर्फ हमारे लिए खुशी माँगती माँ का प्यार,लिखतें चलें तो अन्त नहीं,अनन्त है माँ का प्यार।

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लो तराजू – तोल दो बस….


हर रिश्ते को कितनी आसानी से अपनी-अपनी सोच के अनुसार तोल देते हैं लोग.आज हम बात कर रहे हैं एक बेहद खूबसूरत रिश्ते की जिसकी गर्माहट हर किसी को सर्वाधिक भाती है जो रिश्ता हम स्वयं बनाते हैं हमें किसी वंश परम्परा के तहत नहीं मिलता,हर तरह के भेदभाव से परे ‘दोस्ती’ का रिश्ता.सबसे साफ़-सबसे पाक हर बनावट से दूर,जाति धर्म से जिसका कोई सरोकार नहीं,अमीरी-गरीबी जिसे कभी छू न सकी फिर इस रिश्ते को सदा लिंग भेदभाव ने क्यूँ जकड़ दिया,दोस्त सिर्फ दोस्त होता है उसके समक्ष ये कहीं नहीं ठहरता की दोस्त सामान लिंग है या विपरीत. समाज की सोच में परिवर्तन हुआ मगर आज भी अधिकाँश लोग बल्कि युवा साक्षर भी कई बार दोस्ती में इस फर्क को ज़ाहिर करते हैं .एक लड़का और लड़की सिर्फ दोस्त नहीं हो सकते यह बात पुरानी हो चुकी है,सब जानते हैं फिर भी यदि दोस्ती पुरुष और महिला/लड़का-लड़की के मध्य है तो उस पर नज़र सदा पैनी ही राखी जाती है.यदि एक लड़की/स्त्री दूसरी लड़की/स्त्री को लव यू कहे या कि हग्स दे/कहे तो कोई बात नहीं ,पर यदि यही शब्द वो लड़के दोस्त/पुरुष मित्र से कह दे तो न ही उस पर शक कि सुइयां घुमा दी जाती हैं बल्कि उसे दोषी ही मान लिया जाता है और न जाने क्या-क्या उपाधियों से नवाज़ दिया जाता है.क्या पुरुष-स्त्री के मध्य दोस्ती का रिश्ता पाक नहीं होता,बलिक सबसे ऊपर ईश्वर सा सच्चा और पवित्र होता है ये रिश्ता फिर भी सदा शक के घेरे में कसा रहता है.यदि दोस्त पर प्यार आये तो भी ज़ाहिर न करो,यदि उसे गले लगाने का दिल करे तो भी मत लगाओ क्यूंकि वो सामान लिंग का नहीं है आप ने ऐसा किया तो गज़ब हो जायेगा.भला दोस्ती के रिश्ते में ये बंधन कैसे? और ये गलत कैसे? सिर्फ इसलिए क्यूंकि रिश्ता भले ही दोस्ती का है पर लिंग भेद है ? दोस्त-दोस्त भाई-भाई,जान हाज़िर ,तन-मन सब हाज़िर किन्तु लड़का-लड़की/पुरुष-स्त्री आपस में कह दें तो गलत,अपराध….
हर रिश्ते कि अपनी जगह होती है अपना वजूद होता है जो दोस्ती को समझते हैं वो इनसे परे होते हैं और उनकी भावनाएं उतनी ही पाक होती हैं जितनी किसी छोटे बच्चे को देख कर उसे प्यार करना ,उसके आंसू देख कर,दुलार करना,गले लगा लेना फिर इन पाक भावनाओं को भी क्यूँ गुज़ारना पड़ता है सदा शक के घेरे से जब भी आती हैं ये अपने दोस्त पर….बदलाव आया है पर क्या हम स्वयं को बदलने की कोशिश कर रहे हैं ? जहाँ भाई-बहन बोल दिया वहां सब उचित -जायज़,ऐसा क्यूँ ? दोस्ती भी उतनी ही पाक है फिर क्यूँ न दोस्त बने रहें,उसमे कहाँ कम पवित्रता हो जाती है? सोच ही नहीं बदल पाते हैं हम. यदि भाई-बहन बन कर लिख/कह दिया लव यू ,हग्स,मिस यू ….सब जायज़ करार दिया गया,अगर दोस्त ने लिख/कह दिया सीधा इलज़ाम से नवाज़ दिया.कब छूटेंगे ये तराजू कब टूटेंगे इनके बाँट और कितना वक्त लगेगा ? बस भी करो अब तौलना दोस्ती के रिश्ते को……..
इबादत है ये न यूँ करो बदनाम
हाँ दोस्त हैं हम,न दो कोई और नाम
माँ-बेटे,भाई-बहन से नहीं हैं हम कम
फिर क्यूँ सदा इल्ज़ामों का बोझ ढोएँ हम
अब बस भी करो दो थोड़ा ध्यान खुद पर
दोस्ती नहीं देखती रिश्तों को मरोड़ कर….

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न रूचि है पता न शौक की है तलाश…


कितनी अलग होती हर एक इंसान कि दुनिया,सोचने पर विवश करती अजब है ये दुनिया।अनगिनत वाकये हैं सभी के पास,कितना भी साझा करो कम ही होगा.यहाँ हम बात कर रहे हैं ‘रूचि और शौक’ की.जैसे एक पाठक को पुस्तकों से प्रेम है,संगीतकार को संगीत से इसी तरह हर किसी की रूचि भी अलग और शौक भी अलग अलग होते हैं।
फिर भी न जाने कितने लोग हैं जिन्हें न तो रूचि कभी मिल सकी और न ही उनके शौक कभी जग सके.जिनसे यदि आप पूछे भी तो उन्हें पता ही नहीं की ये दो शब्द भी जीवन में कहीं ठहरते हैं.हाँ ! मुश्किल है यकीन कर पाना, पर सच है यही.उन्हें जीवन से कोई शिकायत नहीं वो खुश हैं अपने उस सच के साथ जहाँ सपने उन्हें कभी सताते नहीं, लेकिन भर जाते हैं दर्द भरे भाव से ये लोग हमें.सभी जगह बिखरे हैं ऐसे अनगिनत जीवन चाहे जहां गौर कर लीजिये।सिनेमा हाल हो या क्रिकेट का स्टेडियम,स्टेडियम में करीब पच्चासों हज़ार लोग टिकट खरीद कर आते हैं अपने शौक के लिए। स्टेडियम के बाहर झंडे,सीटी,टोपी आदि न जाने क्या-क्या खरीदते हैं,पर ये सामान बेच रहे बच्चे या बड़े उनका मैच से कोई सरोकार नहीं, उन्हें न तो ‘रूचि’ पता है और ‘शौक’ तो कभी उनकी पकड़ आया ही नहीं वो तो बेहद खुश हैं की आज उनकी बिक्री खूब हुई ,आज नींद बहुत सुकून लाएगी.स्टेडियम के अन्दर लगातार चिप्स,कोल्ड ड्रिंक्स बेचते लोग गलती से भी अपनी गर्दन क्रिकेट ग्राउंड या चौके-छक्के पर नहीं घुमाते.वो तो बस अपना काम जानते हैं की अधिक से अधिक अपना सामान बेंच सकें .ताज्जुब होता है जहाँ हज़ारों लोग शोर मचा रहे हैं,कूद रहे हैं वहीँ ये दुकानदार कितने शांत-कितने गंभीर…क्या इन्हें ये शोरगुल सुनाई ही नहीं पड़ता ? शायद हाँ !! क्यूंकि उन्हें इस क्षणिक ख़ुशी के पागलपन का कोई अहसास नहीं,ये तो खुश होंगे तब जब उम्मीद से अधिक बिक जायेंगे इनके चिप्स के पैकेट.ये मात्र एक उदाहरण है ऐसे लोग हर जगह हर घर के करीब हैं कहीं वो सब्जी वाला है,कहीं कपड़ो में प्रेस करने वाला है, कहीं मजदूर है तो कही किसी पेड़ की छाँव तले छोले-कुल्चे बेचने वाला. अनगिनत रूप बिखरे हैं हर जगह.
हैं मज़बूत ये हर मौसम की मार से,
हैं जीते ये हर दिन के वार से.
सिर्फ आज में जीते हैं न कल की कोई आस,
न रूचि है पता न शौक की है तलाश…
चाहे जिधर देख लो न कोई है जवाब बस उमड़ते-घुमड़ते फैले हैं चारों तरफ से सवाल – कि ज़िंदगी है तुझे सलाम,जिंदा रह पाई तू फिर भी जब न खबर है की सुबह है या शाम……

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