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अनोखा


जैसा कि नाम कुछ अलग है ‘ अनोखा ‘ वैसी वो अलग बिलकुल भी नहीं थी बस न जाने क्यूँ उसका नाम अनोखा था . करीब पाँच फुट लम्बी, साँवला रंग ,छोटी निर्जीव आँखें ,भूरे सूखे बाल , ऊपर के चारो दांत कुछ आगे को निकले हुए, उसके पास से आती पसीने की असहनीय गंध और शरीर में लिपटे हुए पुराने कहीं-कहीं से फटे हुए कपड़े ये थी अनोखा की रूपरेखा . एक बेहद गरीब नाई हरी प्रसाद की बेटी थी वो और इकलौती नहीं बल्कि चार छोटी बहने और पाँचवा एक भाई भी था जिसकी माँ की भूमिका अनोखा ही निभा रही थी. अनोखा की माँ रामरती लोगों के घर चौका-बासन और लिपाई-पुताई करके किसी तरह अपने बच्चों के लिए रोटी जुटा पाती थी . एक लड़के की चाह में पाँच बेटियाँ जनी थीं उसने . दबाव किसी का नहीं था उसे खुद ही बेटा चाहिए था अपने बुढ़ापे को सँवारने के लिए . खुद की उम्र अभी तीस पार न थी पर देखने में किसी पिछली सदी सी दिखती थी रामरती . रंग इतना काला कि उसके दाँत चूने जैसे सफ़ेद चमकते थे , शरीर सिर्फ हड्डियों का ढांचा मात्र बचा था कई बार खेतों की फसल बचाने के लिए खड़े किये गए बिजुका भी उससे भले दिखते थे .अनोखा के पिता हरी प्रसाद को मिर्गी के दौरे पड़ते थे आए दिन यही सुनने में आता कि आज यहाँ तो कल वहाँ हरी प्रसाद गिरा पड़ा है और मुंह से झाग फेंक रहा है . यही बीमारी उसकी सबसे बड़ी दुश्मन थी पूरे गाँव में कोई भी उससे अपने बाल या दाढ़ी ( हजामत ) नहीं बनवाता था कि कहीं उसकी साँसों से ये बीमारी उन्हें भी न लग जाए. पास के गाँव में सप्ताह में दो दिन सब्जी और मवेशी का बाज़ार लगता था अतः हरी प्रसाद वहीँ जाकर किसी पेड़ की छाँव तले अपनी पिटारी खोल उस्तरे को चमकाता हुआ बैठ जाता और कोई दो-चार लोग जो उसे नहीं पहचानते थे अपने बाल कटवा लेते थे या हजामत बनवा लेते थे बस यही उसकी कमाई थी .खेती बाड़ी न के बराबर थी एक बिसुआ उसरहा खेत उसे मिला था अपने भाइयों से बँटवारे के बाद जिसमे मुश्किल से धान की फसल हो पाती थी और थोड़े बहुत गेंहूं भी मिल जाते थे . बीमारी के चलते दूसरे लोग उसे अपनी खेती भी बटाई पर नहीं देते थे उसके पास अपने बैल या हल भी नहीं था जुताई आदि के लिए. बामुश्किल वो अपने भाइयों से बैल और हल ले पाता था अपने खेत की जुताई के लिए इसके बदले वो उनके खेतों में फसल की कटाई – ढूआई करा देता था . इतनी सब कठिनाइयों के बीच जो दो-चार रूपए कमाता भी तो रोज तो नहीं पर हाँ महीने में एकाध बार देसी दारु में डुबो देता था उसका कमज़ोर शरीर झेल भी न पाता और वो पड़ा रहता कभी किसी मेड़ पर ,कभी किसी तालाब के किनारे बेसुध . गाँव का कोई न कोई बच्चा या बड़ा ये ख़बर उसके घर पंहुचाता की हरी प्रसाद यहाँ या वहाँ पड़ा है दारु पीकर तब रामरती और अनोखा एक साथ आते और उसे घसीटते हुई दोनों घर तक ले जाती .रामरती के मुँह से गालियाँ बरसतीं , अपनी किस्मत को कोसती और सारा गुस्सा अपनी बेटियों पर निकालती ,उन्हें पीट डालती लेकिन इस सब का हरी प्रसाद पर कोई असर न होता और अनोखा बचपन से ही आदी थी इस सबकी इसलिए कभी कुछ नहीं कहती बस अपने पिता को घर तक ले जाने में चुपचाप रामरती की मदद करती थी . रामरती रोते हुए बेटे अनूप को कलेजे से लगा के चिल्ला – चिल्ला के कहती कि बस मेरा बेटा बड़ा हो जाए तो मुझे इस नरक की दुनिया से मुक्ति मिले न जाने इन पाँच-पाँच बोझ की गठरियों से कब पीछा छूटेगा , मुझे मार कर ही मरेंगी ये सब ! और उस पर ये दारु बाज खसम न मरता है न मरने देता है . घर में अनाज की कमी इतनी कि न जाने कितनी रातें रामरती ने सिर्फ पानी पर गुज़ारीं थीं . दिन में तो फिर भी जिस घर में काम करती कोई न कोई उसे बासी रोटी -आचार या खराब हो रहा खाना खिला ही देता हाजमा इतना मज़बूत हो चुका था उसका कि सब कुछ हजम हो जाता . अनोखा अब चौदह वर्ष की हो चुकी थी और उसका शरीर अब उन फटे कपड़ों से छुप नहीं रहा था रामरती के लिए सबसे बड़ी मुसीबत यही हो रही थी की सब गाँव वालों की नज़रों से कैसे बचाए अपनी बेटी के विकसित हो रहे शरीर को . रामरती ने अपनी समस्या जिन घरों में काम करती थी उनकी मालकिनो से बताई तो कुछ भली औरतों ने अपनी पुरानी फटी ब्रा रामरती को दे दी कि इसे सिल कर वो अनोखा को पहनाये और अनोखिया से बोल कि दुपट्टे से ढँक कर रखा करे ठीक से अपना शरीर ज़्यादा बाहर आने – जाने की ज़रुरत नहीं है घर पर ही रहे और घर सम्हाले बाहर कमाने के लिए तो तुम हो ही . पुरानी साडी को फाड़ कर रामरती ने अनोखा के लिए दुपट्टा भी बना दिया और फटी ब्रा की मरम्मत करके अनोखा को पहना दी इस हिदायत के साथ अब तू बड़ी हो रही कायदे से रहा कर पर भला कब तक और कहाँ तक ढँक पाती ये पुरानी अंगिया और पुरानी ओढ़नी अनोखा के नित नए विकसित हो रहे शरीर को. आखिर उसे भी तो अच्छा लगता था अपने शारीर का बदलता हुआ यह रूप क्यों कि अब जब भी वो घर में रहती तो चचेरे भाई भी उसे बड़े ध्यान से निहारते और जब भी बाहर जाती गाँव के चाचा-ताऊ सब उसे अपने पास बुलाते, उसके हाल पूछते और बिना किसी काम के ही दो – चार रुपए भी पकड़ा देते कि रख लो कुछ अपनी पसंद का ले लेना . आज तो जैसे ही बिसात खाने वाले की आवाज़ सुनकर अनोखा घर से बाहर भागी और उसके पास बैठ के सामान देख रही थी कि तभी गाँव के रज्जन काका वहाँ आ गए और उन्होंने बिसात खाने वाले से उसे पूरे ९ रूपये के कान के बुँदे और ३ रुपए की नाखूनी दिलवाई साथ ही बड़े प्यार से बोले अनोखा कल यह बुँदे पहन कर इसी वक़्त मेरे ट्यूबवेल पर आना जरा मैं भी तो देखूं कि कैसी दिखती है तू इन बूंदों में . अनोखा ने पहली बार कान में बुँदे पहने थे आठ बरस की थी जब उसने शौक में कान छिदवाए थे लेकिन आज तक सिवाए नीम की सूखी डंडी के कोई जेवर उसे न मिला था . हरा नग था उन बुन्दो का और उसमे तीन छोटे – छोटे घुंघरुओं की लटकन भी थी उन्हें पहन कर अपने छोटे- छोटे घिसे हुए नाखूनों में नाखूनी लगा कर अनोखा इतरा रही थी और सोच रही थी कि माँ बस यूँ ही परेशान रहती है और सब को कोसती है जबकि सब लोग कितने अच्छे हैं गाँव में ख़ास कर रज्जन काका .
शाम को घर आते ही रामरती की नज़र जैसे ही अनोखा पर पड़ी वह दंग रह गई और जोर से उसके बाल खींचते हुए बोली कलमुही कहाँ से लाई ये सब और नाखूनी लगाकर क्यूँ बैठी है ? अनोखा घबरा कर – डर कर रोने लगी . माँ को पता चलेगा तो मार ही डालेगी सोचकर उसने झूठ बोला कि रज्जन काका की बेटी बेबी जिज्जी ने दिए हैं हमें वो कह रही थीं कि हमारी शादी हो गई है और अब हम सोने के गहने पहनते हैं इनका कोई काम नहीं है इन्हें अब तू रख ले और ये नाखूनी भी उन्होंने ही दी ये सुनकर रामरती कुछ शांत हुई और बोली ठीक है लेकिन आइंदा कभी कोई तुझे कुछ सामान दे तो मुझे बताना और ये नखूनी-अखूनी शादी के बाद लगाना अभी कायदे से रह ! चल अब रात के लिए रोटी सेंक भूख लगी है आज रामसरन कक्कू के यहाँ से माठा मिला है उसी से सब खा लेंगे और हाँ देख ये थोडा गुड़ है इसे अनूप के मट्ठे में डाल देना कहकर रामरती चली जाती है घर के बाहर बैठकर पंचायत कर रही अपनी जिठानियों और देवरानियों के पास और शामिल हो जाती है गाँव के सभी ठाकुरों की ठकुरई के बारे में बात करने और दबीं जुबान से उन्हें गरियाने के लिए तभी मौका देखते ही उसकी जिठानी हमेशा की तरह उसे छेड़ती है – अरे रामरती अनोखा सयानी हो गई है कोई लड़का देख भी रही है या नहीं ? मेरी मान जल्द उसकी शादी कर दे कहीं कुछ ऊँच-नीच हो गई तो क्या करेगी. तू कहे तो अपने बड़े भाई से बात चलाऊँ कोई दान-दहेज़ भी नहीं देना पड़ेगा बस मेरे भईया को एक लड़का दे दे और फिर क्या, राज करे पूरा जीवन. तीन बेटियां है बस चौथे बच्चे के समय भौजाई ख़तम हो गई तब से उनका घर सूना है खाने पीने की भी कोई कमी न है मेरे भईया के पास वैसे भी तू कहाँ से कर पायेगी अनोखिया की शादी .रामरती वहाँ से बिना कुछ बोले हुए चली आती है और मन ही मन सोचती है कि सही तो कह रही है उसकी जिठानी आखिर कैसे होगी अनोखा की शादी . खाने के बाद खाट पर लेटी हुई रामरती इंतज़ार करती है नींद का रात चढ़ आई लेकिन नींद उसकी आँखों से कोसों दूर है दिमाग में वही सवाल कि कैसे जीवन कटेगा लडकियाँ बड़ी हो रही हैं और यहाँ तो खाने तक के लाले हैं ऐसे में शादी ? तभी हरी प्रसाद आता है और एक झटके में उसके ऊपर टूट पड़ता है ये कहते हुए कि मट्ठा खट्टा था बहुत मेरी भूख अभी बाकी है. निष्प्राण,निर्जीव रामरती से अपनी वासना की भूख शांत कर हरीप्रसाद सो जाता है , और रामरती, उसकी भूख ? उसे भूख है ही नहीं . ज़िंदगी ने इतना भर दिया है उसे कि वो भूख को ही भूल चुकी है. कई बार तो उसे खुद के जीवित होने पर भी शक हो उठता है रात बीत जाती है और सुबह होते ही रामरती चल पड़ती है उन घरों की ओर जहाँ वो चौका-बासन करती है ,सुबह की चाय उसे वहीँ नसीब हो जाती है हालांकि दूध नहीं होता उस चाय में बची हुई उबली हुई पत्तियों में ही पानी डाल कर उबाल कर दे दिया जाता है उसे पीने को पर शक्कर खूब होती है क्यूंकि मालकिन अक्सर ही कहती हैं कि इन काम वालों को मीठा बहुत पसंद होता है इनकी चाय में शक्कर खूब होनी चाहिए बस . सही तो कहती हैं मालकिन, हमारे जीवन की मिठास इसी चाय की ही तरह तो है न पत्ती, न दूध,बस दिखावे की चाय जिसका बस रंग गाढ़ा है हमारे गाढ़े जीवन की तरह .
उधर घर में अनोखा जल्दी-जल्दी सारे काम निपटाती है अपने छोटे भाई अनूप को नहला-धुला कर ,उसकी आँखों में मोटा सा कानो तक फैला हुआ काजल लगाकर उसे अपनी छोटी बहनों के हवाले कर खुद नहा कर तैयार हो जाती है. अनोखा को ब्रा पहनना पसंद नहीं रोज ही रामरती की डाँट से पहन लेती है पर आज वो ब्रा पहनना नहीं भूलती . आज उसे अपने बदन पर ये कसाव अच्छा लग रहा था कानो में हरे बुँदे खूब जँच रहे थे . अब रज्जन काका से मिलने कैसे जाए बस यही सोचते हुए वो हाँथों में लोटा उठा कर चल देती है ताकि कोई सवाल न करे कि वो कहाँ जा रही है क्योंकि उसकी चाची और ताई सब अपनी मोटी नज़र उस पर रखते हैं कि कब वो कोई गलती करे और वो रामरती को नीचा दिखा सके . ट्यूबवेळ पर रज्जन पहले से ही मौजूद था अनोखा को देखते ही उसकी धमनियों का प्रवाह तेज़ हो गया लेकिन खुद को नियंत्रित करते हुए सामान्य स्वर में बोला अरे आओ अनोखा मै तेरी ही राह देख रहा था. अनोखा ये कहते हुए कि काका आपने कहा था न कि बुँदे पहन कर दिखाना चुप – चाप जमीन की ओर निहारने लगती है . हाँ ! रज्जन बोला, थोड़ा पास तो आ ,मेरे पास आ कर बैठ कहते हुए रज्जन अनोखा को अपने पास खींच लेता है. अनोखा डर जाती है लेकिन कहती कुछ नहीं, हिम्मत ही नहीं उसमे बस नीचे ज़मीन को ही निहारती रहती है. रज्जन चुप्पी तोड़ता है ,कितनी अच्छी लग रही है तू ,किसी फिलम कि हीरोइन माफक . अनोखा शरमा जाती है और दुपट्टे से मुंह ढँक लेती है .रज्जन कि नज़र सीधे अनोखा के कसे हुए शरीर पर जाती है . देख अनोखा मै तेरे लिए और भी बुँदे, माले और नया सूट भी ला दूँगा या तू अपनी पसंद का ले लेना मै तुझे पैसे दे दूँगा अब शरमाना छोड़ और खुश रह बस ! अनोखा कहती है काका आज तक मैंने कभी नया कपड़ा नहीं पहना ,घर में कुछ नई साड़ियाँ हैं माँ के बक्से में लेकिन उन्हें माँ भी नहीं पहनती, कहती है कि मेरे ब्याह में मुझे देगी पता नहीं सच कहती है या झूठ क्यूंकि प्यार तो वो सिर्फ अनूप को ही करती है आप कितने अच्छे हो रज्जन काका कहते हुए वो थोड़ा सहज हो जाती है . देख मै तेरे लिए क्या लाया हूँ कहते हुए रज्जन अपने कुरते की जेब से अख़बार कि एक पुड़िया निकालता है और उसकी ओर बढ़ा देता है जिसमे चिपकी होती हैं तीन-चार जलेबियाँ .अनोखा खुश होकर कहती है जलेबी ! रज्जन कहता है हाँ तेरे लिए ही लाया हूँ और अनोखा झट से अखबार लेकर जलेबियाँ खाने लगती है . रज्जन ध्यान से अनोखा के होठों को निहारता है और एकदम से उसका मुँह पकड़ कर अपने मुँह में भर लेता है . काका आप क्या कर रहे हैं कहते हुए अनोखा खुद को छुड़ाती है . कुछ नहीं तूने जलेबियाँ खाई तो मैंने सोचा मै भी मुँह मीठा कर लूं रज्जन कहता है . तू डर क्यूँ रही है अनोखा देख तुझे कुछ भी नहीं हुआ , मुझे अच्छा लगा क्या तुझे अच्छा नहीं लगा कहकर रज्जन अनोखा की कमर में हाँथ डालकर उसके पेट को दबाता है . मुझे डर लग रहा है काका यदि माँ को पता चला तो मुझे मार ही डालेगी कहते हुए अनोखा अपनी ओढ़नी को फैला लेती है . रज्जन कहता है मै तुझे प्यार करने लगा हूँ अनोखा और मैं तेरा पूरा ख्याल रखूँगा किसी को भी कुछ नहीं पता चलेगा तुझे किसी से भी डरने की कोई ज़रुरत नही है , मै हूँ ना . तू रामरती को भी मत बताना कहते हुए रज्जन खुद को अनोखा के शरीर से पूरी तरह सटा देता है . अनोखा उम्र के जिस मोड़ पर है उसे ये सब किसी सपने और सतरंगी दुनिया के सामान लगता है . रज्जन धीरे-धीरे अनोखा के शरीर को सहलाता है वो डरती है और साथ ही शरमाती भी है लेकिन मना नहीं करती आखिर अभी-अभी जलेबियाँ खाई थीं उसने और फिर नया सूट भी तो मिलगा तभी किसी की आवाज़ आती है रज्जन …ओ रज्जन ! रज्जन चौकन्ना होता है अनोखा को एक झटके से अलग कर झट से खड़ा होता है, कल फिर आना कहते हुए उसे कोठरी के पीछे के दरवाजे से निकल जाने को कहता है और खुद को सँभालते हुए कोठरी के बाहर आता है वहाँ गाँव के प्रधान होते हैं . अरे प्रधान साहब आप यहाँ, बताइए कैसे आना हुआ . अनोखा चली जाती है और आज पहली बार वो अपने शरीर में कुछ पिघलन महसूस करती है. जल्दी से घर पहुँच कर बुँदे उतार देती है और घर के कामो में जुट जाती है लेकिन आज उसे अपना शरीर हवा की तरह उड़ता हुआ सा लगता है. माँ कभी भी जलेबी नहीं लाई हाँ एक बार किसी ने दो जलेबियाँ दी थीं उसे वो भी माँ ने अनूप को खिला दी थीं, उसकी बची ज़रा सी चाशनी ही मुझे चाटने को मिली थी और आज पूरी चार जलेबियाँ खाईं मैंने कितना अच्छा लगा था अनोखा सोचती है . इसी तरह पूरा दिन बीत जाता है और रात आते ही अनोखा सुबह की प्रतीक्षा में बेचैन हो रही है कि कल भी उसके लिए कुछ तो ज़रूर ही लायेंगे रज्जन काका .आज रात खुद से ही शरमा रही है और खुद को ही सहला भी रही है . ये सब उसे अच्छा लग रहा है पर क्यूँ ,क्या ये तो उसे खुद भी नहीं पता लेकिन ये सच है कि इतना खुश इससे पहले वो कभी नही हुई . हरी नाई रोज ही निकल जाता कि शायद आज कोई उससे बाल बनवा ले और रामरती घरों के चौका-बासन करने चली जाती उनके जाते ही अनोखा भी फटाफट सारे काम निपटा कर निकल जाती किसी न किसी बहाने से अपने रज्जन काका से मिलने . रज्जन काका की उम्र करीब ४८ की होगी और उनकी बेटी, बेबी जो कि १९ की है इसी साल उसकी शादी हुई है . अनोखा अभी चौदह की पूरी हो पंद्रहवीं की दहलीज में कदम रख रही है. रज्जन रोज ही अनोखा के लिए मिठाई लाता,कभी कोई अँगूठी तो कभी नगद रूपए भी देता . आज तो उसने अनोखा को पचास रूपए दिए ये कहकर कि अपने लिए एक नई ब्रा खरीद ले जिसमे लाल रंग की लेस लगी हो अनोखा रोज एक ही उधड़ी सी कुछ मटमैले रंग की ब्रा पहने रहती है यह जानने के लिए रज्जन को कभी उसकी कमीज़ नहीं उतारनी पड़ी क्यूंकि अनोखा के घिसे पारदर्शी कुरते के ऊपर से दुपट्टा हटाते ही रज्जन की ललचाई नज़रें सीधा वहीँ ठहरती हैं . ये रज्जन का रोज का काम था वो अनोखा की ओढ़नी दूर रखवा देता कि मुझसे क्या शर्म मै तो तेरा ही हूँ और जी भर निहारता उसके अधखुले,अधढंके कसे शरीर को. अगले ही दिन पैसे को सलवार के नारे में खोंस कर अनोखा बाज़ार से खरीद लाती है अपने जीवन का पहला नया कपड़ा वो भी अंतरंग और मचल पड़ती है सोचकर ही कि कल वो नया कपड़ा पहनेगी . पर माँ ! सोचते ही डर जाती है कि माँ को पता चलेगा तो मार ही डालेगी . मारे डर के नई ब्रा को भी खोंस लेती है सलवार के नारे के ही बीच में ताकि किसी कि नज़र न ही पड़े . खुश थी क्यूंकि पूरे दस रूपए भी बच गए थे जिसकी उसने आइसक्रीम खा ली थी . सब कितना अच्छा लग रहा है वो सोचती है कि बड़े होने के कितने फायदे हैं. माँ तो घर में रोटी और नमक ही देती है या कभी-कभी मठ्ठा या चटनी बस ! रज्जन काका उसे रोज ही उसकी पसंद की चीज़े खिलाते हैं और माँ कहती है किसी से बात न करो ,खुद नहीं करती बात किसी से तभी कोई माँ को कुछ नहीं देता . मै खुश हूँ और मुझे माँ जैसा नहीं बनना . अगले दिन नई ब्रा पहन कर ऐसे इतराती है खुद पर जैसे कोई सोने का हार पहन लिया हो. घर के छोटे से मटमैले शीशे में खुद को निहारती है मटक-मटक कर और जा पँहुचती है अपनी खुशियों के भगवान् रज्जन काका के पास .अनोखा को देखते ही रज्जन ताड़ जाता है फिर भी सवाल करता है कुछ लिया या नहीं ? अनोखा नज़रें नीचे कर शरमा जाती है और रज्जन उसकी ओढ़नी हटा देता है धीरे से उसे बांहों में जकड़ लेता है उसके कानो में बोलता है ऐसे दिख नहीं रहा ज़रा ठीक से दिखा देखूं तो सही कहते हुए अनोखा का कुर्ता उतारने लगता है अनोखा डर जाती है पर मना नहीं कर पाती आखिर रज्जन काका ने ही तो दिलवाई है रज्जन हटा देता है उसके शरीर से कुर्ता और धीरे-धीरे उसके करीब जाकर जकड़ लेता है उसे और कर देता है अनोखा का कौमार्य भंग ! अनोखा तेज़ दर्द से कराह उठती है ,उठ भी नहीं पाती . नीचे खून देख कर डर कर रोने लगती है ,रज्जन उसे समझाता है मै हूँ तेरे साथ और पहली बार में होता है ऐसा, तू थोड़ी देर आराम कर फिर उठना सब ठीक हो जायेगा. अनोखा धीरे-धीरे सुस्त कदमो से खुद को संभालती हुई घर आ जाती है . आज उसे कुछ अच्छा नहीं लगा,बहुत थक गई है वो घर आकर भी कोई काम नहीं करती बस लेटी रहती है पूरा दिन.शाम को रामरती से डांट भी खाती है पर उठती नहीं,पेट दर्द का बहाना बना कर लेटी रहती है अगले दिन सुबह उसे ठीक लगता है ,लेकिन कुछ मीठा खाने की चाह नही रही अब और न ही रज्जन काका से मिलने की . दो-तीन दिन वो घर से नहीं निकली तो रज्जन खुद दोपहर उसके घर आकर उसकी तबियत पूछता है और साथ ही कल आना कुछ ज़रूरी बात करनी है कहकर चला जाता है. रज्जन के इस तरह से आने और उसका का हाल पूछने से अनोखा को अच्छा लगता है और वो खुद को ठीक महसूस करती है अगले दिन फिर वो रज्जन से मिलने जाती है रज्जन उसे पकड़ कर सब जगह चूमने लग जाता है ये कहते हुए कि अनोखा अब मैं तेरे बिन नहीं रह पाऊंगा तू क्यों नहीं आई तीन दिनों से क्या मै तुझे पसंद नहीं और जवाब की प्रतीक्षा किये बिना कुरते की जेब से पाजेब निकल कर खुद ही उसे पहनाने लगता है. अनोखा कुछ बोल नहीं पाती बस एक बार फिर रज्जन के साथ खुद को रज्जन का कर देती है ,इस बार उसे भी अच्छा लगता है . पर ज्यादा अच्छा क्या लगा रज्जन का साथ या अपने पैरों में चाँदी की पायल ये न समझ पाई वो खुद भी. धीरे-धीरे ये मुलाकातें बढ़ती गईं और फिर एक रोज़ रामरती की नज़र पड़ी कि अनोखा का शरीर पहले से अधिक गठा और स्वस्थ नज़र आ रहा है इस फर्क को वो समझ पाती कि अनोखा की उबकाइयों ने सब बता दिया . रामरती अनोखा को बुरी तरह पीटती है और उसके कुछ न बताने पर उसकी तलाशी लेती है तलाशी लेने पर उसे पायल मिलती है जो अनोखा ने छप्पर के अन्दर छुपा रखी थी जब रामरती जोर से उसका गला दबाती है तब जाकर वो रज्जन का नाम लेती है. रामरती वही आँगन में लड़खड़ा जाती है ये कहते हुए कि कहाँ से लाए ज़हर की पुड़िया जो खिला सके अनोखा को और खुद को भी. हरीप्रसाद को कोसते हुए, अनोखा को गालियाँ बकते हुए वो सीधे रज्जन के घर जाती है . रज्जन घर में नहीं था और उसकी दुल्हिन से कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं हुई आखिर उनके घर ही काम करती है रामरती और यदि काम से निकाल दिया तो ? कहाँ से पेट भरेगी सबका उधर अनोखा भाग कर खेत में रज्जन के पास जाकर सब बताती है कि माँ कह रही है तू पेट से है और मुझे बहुत मारा तो मैंने आपका नाम बता दिया .रज्जन कोई बात नहीं अनोखा तू चिंता मत कर और अपनी माँ को बोल कल तुझे लेकर दूसरे गाँव के अस्पताल में मिले ,जो भी खर्चा होगा मै दूंगा बस एक बात का ध्यान रहे ये बात किसी और को पता नहीं चलनी चाहिए .अगले दिन रामरती अनोखा को लेकर अस्पताल पहुँचती है रज्जन उसे पैसे और साथ ही धमकी देकर कि ये बात कहीं और नहीं निकलनी चाहिए वहाँ से चला जाता है . पंद्रह वर्ष की अनोखा का उसकी जान के रिस्क पर कराया जाता है गर्भपात! इस उम्र में गर्भ में नया जन्म और फिर उसकी हत्या अनोखा को ज्यादा कुछ फर्क नहीं पड़ता सिवा इसके की माँ बहुत गुस्सा है जबकि रामरती नहीं समझ पाती कि वो जिन्दा है या मर गई . गाँव में भला कब ऐसी बातें छुपती हैं आग की तरह ये बात भी फ़ैल गई और अब तो हर जवान-बूढ़ा पुरुष अनोखा से मिलना चाहता सिवाय रज्जन काका के . अनोखा को रामरती ने घर में बंद कर दिया था और वो कहीं आ जा न सके ये जिम्मेदारी उसकी छोटी चारों बहनों की थी .पूरे गाँव में हर घर में हर एक की जुबान पर बस एक ही बात थी कि फूटी किस्मत है रामरती की पति मिर्गी वाला मिला और लड़की ने तो नाक ही कटा दी,हमारी होती तो ज़हर खिला कर मार डालते ऐसी कुल्टा लड़की को अरे रज्जन का क्या दोष आदमी है इसी से न संभाली गई होगी अपनी जवानी पूरे गाँव के मुँह पर कालिख पोत दी इसने . इस गंदगी को जल्दी से जल्दी गाँव से फेंक देना चाहिए,हर कोई समझाता रामरती को. रामरती की जुबान चिपक चुकी थी और आँखे रेगिस्तान से भी अधिक सूखी हो चली थीं कोई राह नज़र नहीं आ रही थी उसे कई ठाकुरों ने तो यहाँ तक समझाया कि अनोखा को मेरे पास भेज दिया कर तेरे दिन भी बहुर जायेंगे आखिर और भी तो चार बेटियाँ हैं तेरे . रामरती बस यही सोचती कि पैदा होते ही गला क्यूँ न घोंट दिया मैंने इन लड़कियों का ,लड़कियां होती ही हैं भार कहते हुए बस अनूप को गले से चिपका लेती है.शाम का वक्त है रामरती की जिठानी आती है और बेहद दया भाव से कहती है जो होना था हो गया तू कहे तो अब भी बात बन सकती है मै अपने भईया को कुछ नहीं बताउंगी अनोखा की शादी जल्दी से उनके साथ करवा सकती हूँ तेरे सर से मुसीबत भी हट जाएगी और मेरे भाई का घर भी बस जायेगा . लेकिन जिज्जी तुम्हारे भईया की उम्र तो चालीस पार है और अनोखा अभी पंद्रह की भी पूरी नहीं हुई रामरती कहती है. ये सुनते ही जिठानी गरम तवे सी छन्ना के बोली हाँ !और रज्जन तो बस अभी सोलह बरस का ही है न ! जब अड़तालीस साल के आदमी के साथ सोना आता है तुम्हारी बेटी को तो हमारे भईया तो अभी चालीस के ही हैं.सही कहते हैं भला करने चलो और अपना ही हाँथ जलाओ जिठानी जोर से कहती है . रामरती कुछ सोच नहीं पाती कि क्या करे ,किससे मदद ले,कैसे अनोखा की शादी कर जल्द से जल्द उसे गाँव से अपने जीवन से निकल फेंके इसी उधेड़बुन में बैठी है कि तभी अनूप रोते हुए आता है , कहता है मम्मी मेरे पापा मर गए ! चलो देखो चल कर सब कह रहे हैं वो मर गए.
‘अच्छा हो की मर गया हो तेरा बाप कम से कम कहीं से तो मुक्ति मिले ’ कहते हुए रामरती भागती है गाँव के बड़े तालाब की ओर वहीँ किनारे हरिप्रसाद पड़ा है भीड़ लगी हुई है कोई कह रहा है कि इसे मिर्गी आई है, कोई कह रहा है कि दारु पी है इसने .सब दूर खड़े हैं कोई उसके पास नहीं जाता . रामरती उसे छूती है ,ठंडा है उसका पूरा शरीर और दारू की तेज़ दुर्गन्ध आ रही है , मुंह से लेकर कान के अन्दर तक झाग फैला है, मृत्यु एक साथ सारे ही ऐबों को ले जाती है. एक जोर की चीख गूँज जाती है पूरे गाँव में “अनूप के पापा ” ! रामरती वहीँ हांथों को पटक कर चूड़ियाँ तोड़ देती है और कहती है अच्छा हुआ मर गए, मुक्ति तो मिली . चूड़ियों के टूटने से हांथों से खून बहने लगता है और उन्ही खून भरे हांथों से मिटा देती है अपना सिन्दूर . हरी प्रसाद का क्रिया कर्म जैसे-तैसे उसके भाई कर देते हैं .रामरती कई दिनों तक घर से नहीं निकलती एक सन्नाटा पसरा है उसके चारों ओर . शाम का वक्त है अनोखा आती है और सन्नाटे को तोड़ती हुई कहती है माँ घर में कुछ भी खाने को नहीं है . सब तो खा गई , अब मै ही बची हूँ, आ मुझे भी खा ले कहते हुए रामरती अपनी चुप्पी तोड़ती है तभी अनूप रोते हुए आता है माँ, मुझे भूख लगी है. रामरती उसे चुप कराती है और घर में तलाशती है कि कुछ खाने को मिल जाये लेकिन घर में सिवाय ख़ाली बर्तनों के कुछ भी नहीं मिलता . रामरती भाग कर ठाकुर के घर जाकर रोती है और वहाँ से अनूप के लिए खाना लाती है, ठकुराइन उसे खाना तो दे देती हैं लेकिन साथ ही कल से काम पर आने कि हिदायत भी कि यदि काम नहीं करेगी तो उसके बच्चों के लिए खाना कौन देगा इस तरह जितना शोक करना था कर लिया,वैसे भी क्या करता था तेरा पति, अब तू आगे की सोच और कल से काम पर आना शुरू कर. रामरती घर जाकर अपने कलेजे के टुकड़े को खाना खिलाती है और लड़कियों को खुद परोस के खाने के लिए कह देती है अगले दिन से ही रामरती घरों में काम के लिए जाने लगती है अभी एक महीना भी नहीं बीता कि फिर से जमींदार उसे नए-नए बहानों से परेशान करने लगे कि वो अनोखा को उनके पास भेज दे. रामरती बेहद डर चुकी थी अतः सीधा अपनी जिठानी से अनोखा की शादी कि बात करती है कि क्या वो अब भी अपने भाई के साथ अनोखा की शादी कर सक सकती है .जिठानी अपनी ख़ुशी को दबाते हुए कहती है अब इतना अहसान तो करना ही पड़ेगा तुझ पर पहले ही मान जाती तो इतनी बेईज्ज़ती तो नहीं उठानी पड़ती अब देखती हूँ मै भैया से बात कर के. एक महीने के अन्दर साधारण ढंग से अनोखा कि शादी हो जाती है. बारात में दूल्हा और उसकी तीन बेटियाँ थी. दूल्हा अनोखा को देख किसी बांके छोरे की तरह लालायित था जबकि अनोखा इतनी शांत कि तालाब का शांत पानी भी उसके समक्ष कोलाहल करता नज़र आये .बेटियाँ उसे मम्मी-मम्मी पुकार रही थीं .बड़ी लड़की की उम्र तो १० या ११ की ही होगी . अनोखा की शादी संपन्न हो गई और विदाई में उसे मिली थीं तीन बेटियाँ . वैसे भी अपने घर में अपनी चार बहनों और भाई अनूप की माँ तो वही थी बस फर्क ये था कि उसी उम्र के उसके भाई-बहन उसे दीदी बुला रहे थे जबकि वो बेटियाँ उसे मम्मी बुला रही थीं . अनोखा की विदाई में सभी आँखें शून्य थीं सिवाय अनूप के वो सबसे छोटा था और अनोखा खुद से ज्यादा अनूप का ख्याल रखती थी इसलिए अनूप को दीदी का जाना बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा था विदाई में रामरती अनोखा को गले लगाते हुए कहती है अब मेरी जिम्मेदारी ख़तम अब वही तेरा घर है जी या मर बस यहाँ मत आना . ससुराल में अनोखा का स्वागत करने के लिए भी कोई न था सिवाय अनोखा की विधवा सास के और वो थी भी तो दूसरी पत्नी, इसलिए सास को भी कोई उत्साह नहीं था कि वो अनोखा का स्वागत धूम धाम से करे . पूरा दिन गुज़र गया शाम होते ही तीनो लड़कियों को दादी के पास भेज कर अनोखा का पति कांतिलाल कमरे में आता है और बिना किसी वार्तालाप के वसूल लेता है अपने पति होने का अधिकार .शादी के दूसरे ही महीने अनोखा गर्भवती हो जाती है सास और पति दोनों को लड़का ही चाहिए इस लिए तीन महीने पूरे होते ही वो उसकी जांच करवाते हैं. गर्भ में लड़की है पता चलते ही अनोखा का गर्भपात करा दिया जाता है. पंद्रह की उम्र और दो-दो बार गर्भपात, अनोखा पीली पड़ जाती है ,उसका शरीर निष्प्राण सा दीखता है. अभी कच्ची उम्र है अनोखा की कहते हुए डॉक्टर कांतिलाल को कुछ वक्त अनोखा से संबंध न रखने की सलाह देता है लेकिन कांटी लाल को इंतज़ार नहीं है और कुछ ही महीनो में फिर से अनोखा की कोख हरी हो जाती है, कर दी जाती है. तीन महीने पूरे होते ही एक बार फिर से जाँच,लेकिन इस बार लड़का है कि खबर से सास और पति उसे भर पेट खाना भी खिलाते हैं और उसका ख्याल भी रखते हैं. अनोखा का कमज़ोर शरीर टूट चुका है अब तक वो सिर्फ लेटी रहती है उससे ठीक से चला भी नहीं जाता. कम उम्र कमज़ोर शरीर का नतीजा आठवें महीने में ही उसे प्रसव का दर्द उठ जाता है और बच्चा जनने में ही निकल जाती है अनोखा की जान ! बड़ी मुश्किल से बच्चा बचता है क्यूंकि डॉक्टर से बच्चा बचाने के लिए ही कहा गया था माँ तो नई भी आ जाएगी लेकिन लड़का इतनी मुश्किल से तो घर का चिराग मिला है इसलिए बच्चा हर हाल में बचना चाहिए . कांतिलाल और उसकी माँ खुश है कि लड़का हुआ है उनके वंश का वंशज मिल गया है, पालने के लिए माँ तो मिल ही जायेगी . अनोखा बिलकुल शांत हो चुकी है क्योंकि उसे जीवन से मुक्ति मिली है हालाँकि क्या यही जीवन था क्या यही होना चाहिए था…. क्या यही मुक्ति है ….अनोखा में कुछ खास या अलग भले ही न रहा हो किन्तु उसका जीवन उसके नाम की तरह अनोखा ही गुज़रा ….!

हमारी यह कहानी  ‘ लमही ‘ के अप्रैल – जून  अंक में प्रकाशित हुई है !

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ये जीवन है


सुबह से दो सर्जरी करने के बाद अब ओ पी डी में मरीजों से घिरा हूँ . नाम क्या है ? शेफ़ाली डाक्टर साहब . शेफ़ाली लिखते ही कलम अंतिम शब्द पर रुक सी गई और याद आ गया वो दिन जब ये नाम पहली बार लिखा था. बीस साल हो गए. लखनऊ के मेडिकल कालेज का पहला दिन और मेरी पहली दोस्त . हाय मै शेफ़ाली और आप ? मै राजीव ! मै कानपुर से हूँ और आप ? मै अलाहाबाद से ! पहली क्लास में वो मेरे पास ही आकर बैठी और मेरी कॉपी पर लिखे नाम को देखकर बोली ‘ ओह ! तुम्हारी राइटिंग कितनी सुन्दर है तुम डॉक्टर कैसे बन सकते हो ?’ एक लम्बी साँस खींच कर उसकी तरफ देखते हुए मैंने बोला जैसे कि आप ! मतलब क्या है तुम्हारा ? मतलब ये कि सुन्दर लड़कियाँ पढ़ती भी हैं ? जी हाँ और तभी मै यहाँ हूँ. लेकिन डा. की राइटिंग तो कभी अच्छी नहीं देखी . अच्छा लो मेरी नोट बुक पर मेरा भी नाम लिख दो और पहली बार ये नाम क्या लिखा मैंने कि बस अगले पाँच सालों तक सभी कॉपी किताबों में उसका नाम लिखना जैसे मेरे कोर्स का हिस्सा ही हो गया .रोज क्लास ख़त्म होते ही हम दोनों सारी भीड़ – भाड़ से दूर कैम्पस के कोने में लगे पाकर के पेड़ के नीचे उसी की टेक लेकर ज़मीन पर एक साथ बैठते और उस दिन के हर लेक्चर पर खूब चर्चा करते. आज का लेक्चर कितना बोरिंग था ना राजीव मेरी समझ में तो कुछ भी नहीं आया . हाँ कुछ चीज़े हम सिर्फ लेक्चर से नहीं समझ सकते हैं कल प्रैक्टिकल करोगी तब समझ जाओगी . वैसे तुम्हे डर तो नहीं लगेगा ? हाँ या पता नहीं कल की कल देखेंगे. एक बात याद रखना शेफ़ाली कि तुम्हारा लक्ष्य क्या है ? बस ! सारा डर भाग जाएगा. थैंक्स राजीव अब मुझे कोई डर नहीं लगेगा कहते हुए उसकी बड़ी – बड़ी आँखें थोड़ा और बड़ी हो जाती हैं. यार तुम अपनी आँखों से मुझे डरा देती हो. हद है सब तो कहते हैं कि मेरी आँखें सुंदर हैं और तुम्हे इनसे डर लगता है ? जब तुम इन्हें ऐसे और बड़ा करके देखती हो तब ! ठीक है कोई तो है जो मुझसे डरता है . तुमसे नहीं तुम्हारी आँखों से शेफ़ाली और फिर दोनों ही हँस पड़ते है. पहला सेमिस्टर हम दोनों का ही अच्छा गया अब तक हम कॉलेज के माहौल में रम चुके थे.रोज सुबह – सुबह क्लास के लिए भागमभाग. होस्टल का चाय नाश्ता फिर लेक्चर, प्रैक्टिकल, ब्रेक के बाद लंच और शाम की क्लास ख़त्म होते ही हम सब का थक के चूर होना लेकिन फिर करीब एक-दो घंटे तक साथ बैठना सब एक रूटीन सा हो चुका था. देखते ही देखते चार साल बीत गए और हम दोनों एक दूसरे के बेहद करीब हो गए . मठरी और लड्डू आये हैं घर से बड़ी मुश्किल से तुम्हारे लिए अपनी सहेलियों से छुपा कर लाई हूँ अब खुद ही खाना ये नहीं कि जनाब किसी और को खिला रहे हैं. बैग से स्टील का एक चपटा हुआ टिफिन निकालकर शेफ़ाली मेरे बैग में डाल देती है . बड़ी फिकर हो रही है मेरी इरादे क्या हैं मेमसाहब ? सब ठीक तो है कहते हुए शेफ़ाली का हाँथ पकड़ कर अपनी तरफ खींच लेता है …..

हाँ सब ठीक है ऐसे क्यूँ पूछ रहे हो राजीव ? क्योंकि मै कुछ अलग सा महसूस कर रहा हूँ आजकल क्या तुम भी ? मतलब ? शेफ़ाली मै तुमसे प्यार करने लगा हूँ और अब ये सोचने लगा हूँ कि क्या हम एक साथ पूरा जीवन नहीं बिता सकते ? ये हमारा आखिरी साल है फिर… तुम क्या सोचती हो शेफ़ाली ? मै क्या कहूँ राजीव ? क्या तुम मेरा साथ दोगी ? क्या तुम मुझसे प्यार करती हो ?. शेफ़ाली ने भरी हुई आँखों से कहा हाँ राजीव ! और वो मेरी गोद में सर रख कर रोने लगी . फिर रो क्यूँ रही हो ? क्योंकि हमारे घर में ये रिश्ता कभी नहीं स्वीकार होगा राजीव. लेकिन क्यूँ ? क्योंकि हम एक जाति के नहीं हैं और अंतरजातीय विवाह के लिए मेरे घर में कोई राजी नही होगा . मै हूँ ना शेफ़ाली सब संभाल लूँगा क्या इतना भरोसा नहीं है मुझ पर. शेफ़ाली के आंसू पोछते हुए उसका मुँह अपने हांथो में भरकर अच्छा एक बात बताओ मुझे हुआ तो हुआ तुम्हे मुझसे कैसे प्यार हो गया ? और तुमने कभी बताया भी नही ये तो गलत है कहते हुए राजीव मुस्कुराया और शेफ़ाली शरमा कर राजीव की गोद से उठ कर अलग बैठ गई. क्या राजीव तुम भी ना ! और क्यूँ तुम कब से मुझे चाहने लगे . क्या करें यार कापी – किताबों में नाम लिखते – लिखते कब अपने दिल पे लिख दिया पता ही नही चला बस ! वो आखिरी साल था हमारा मेडिकल का बहुत ही ख़ास साल . एक तो डॉ . बन जाने की खुशी और जल्दी भी तो दूसरी ये कि हम दोनों एक साथ रहेंगे सदा . वक्त कब बीत गया पता ही नहीं चला और हम सब अब डॉ . बन चुके थे और अब सब अपनी –अपनी मंजिल की तरफ जा रहे थे किसी को प्रैक्टिस करनी थी तो किसी को आगे एम् डी की पढ़ाई. शेफ़ाली के घर में उसकी शादी उसके मम्मी – पापा की पहली ज़िम्मेदारी थी. घर में शादी के लिए आई ढेरों तस्वीरें देखकर शेफ़ाली हैरान थी .आज शाम लड़के वाले तुमसे मिलने आयेंगे जैसे ही पापा ने कहा, मै डा. राजीव से शादी करना चाहती हूँ शेफ़ाली बोल पड़ी .क्या ? कौन राजीव शेफ़ाली ? हमने साथ ही पढाई की है पापा बस वो हमारी जाति के नहीं हैं .आप एक बार उनसे मिल कर तो देखिये . शेफ़ाली शायद तुम भूल गई हो कि हम अभी भी इसी समाज में रहते हैं और हम तुम्हारी शादी अपनी ही जाति के लड़के के साथ करेंगे . तुम डा . क्या बन गईं तुम्हे हमारे मान – सम्मान का ख़याल ही नहीं रहा पापा ने थोड़ी गंभीर आवाज़ में कहा. शेफ़ाली रो पड़ी नहीं पापा ऐसा नहीं है लेकिन आप एक बार ..प्लीज़ ! शेफ़ाली तुमने अपने पापा को आज बहुत दुखी किया है वो तुम पर गर्व करते थे और आज तुम अपने पापा से बहस कर रही हो ? नहीं मम्मी ऐसा नहीं है हम दोनों एक दूसरे से प्यार करते हैं और हमारे साथ के कितने ही डा . हैं जिनकी शादियां भी हो रही हैं आप लोग एक बार राजीव से मिल तो लीजिए मम्मी वो बहुत अच्छे हैं हम एक साथ खुश रहेंगे आप प्लीज़ पापा से कहो ना . शेफ़ाली तुम्हे अपने मन का करना है तो तुम्हारे लिए इस घर में कोई जगह नहीं है इस बार पापा गुस्से में बोले. अपने आप को संभालो शेफ़ाली कहते हुए मम्मी मेरे आँसूं पोछने लगी हालांकि उनकी आँखे ज़रूर भीग गईं थीं …

हम दोनों अपने – अपने परिवारों के रिश्तों में जकड़े हुए थे और उनकी नामंजूरी ने हमे तोड़ दिया था. उन्हें प्रेम विवाह से कोई आपत्ति नहीं थी लेकिन प्रेम अपनी जाति के लड़के या लड़की से होना चाहिए बस ! उन्हें कौन समझाता कि प्रेम दो इंसानों के बीच होता है जातियों के बीच नहीं लेकिन हमारी हर कोशिश भरभरा कर ढेर हो गई . उन्हें दुःख देकर हम अपना घर नहीं बसा सकते थे और माता – पिता की ख़ुशी से बढ़ कर कोई ख़ुशी नहीं हो सकती है हमे कोई अधिकार नहीं कि हम उन्हें तकलीफ दे अतः हमने खुद को तकलीफ दी और जुदा हो गए एक दूसरे से इस वादे के साथ कि चाहे कुछ भी हो जाये हम खुश रहेंगे सदा ….. हमने फैसला किया था कि हम जीवन के हर पल को पूरी इमानदारी के साथ जिएँगे . जीवन में आगे बढ़ेंगे अपने मम्मी – पापा की पसंद से शादी भी करेंगे और उसे निभाएंगे भी . हम अपने अतीत का कभी ज़िक्र ही नहीं करेंगे और जान बूझ कर एक दूसरे से कभी नहीं मिलेंगे लेकिन हाँ यदि कभी गलती से टकरा गए तो अनजान भी नहीं बनेंगे और मैंने ये फ़ैसला निभाया भी जैसा मेरे घर वालों ने चाहा मैंने वही किया और मेरे जीवन में मेरी हम सफ़र बन कर दिव्या शामिल हो गई . दिव्या एक बेहद सुलझे विचारों की लड़की है और उसे नौकरी करने से अधिक बेहतर घर संभालना लगता है बल्कि इतने सालों में एक वही है जिसे सभी का खयाल है मै तो इतना बिजी रहता हूँ फिर भी वो कभी शिकायत नहीं करती . मेरे दो बेटे हैं और हम एक साथ बहुत खुश हैं . लेकिन क्या शेफ़ाली ने भी अपना वादा निभाया होगा ? ये सवाल मुझे बेचैन कर गया फिर खुद ही जवाब भी कि हाँ क्यूँ नहीं ज़रूर उसने भी हमारे वादे का मान रखा होगा. पिछले बीस सालों में हम न कभी मिले न कभी हमने एक दूसरे के बारे में कुछ भी जानने की कोशिश की हाँ मुझे ये ज़रूर पता था कि हम यादों में कभी जुदा नहीं हुए लेकिन आज फेस बुक पर शेफ़ाली का इतना छोटा सा मैसेज न जाने क्या – क्या सवाल ज़हन में पैदा कर रहा है . कैसी है वो ? कहाँ है वो ? शादी हो गई ? बच्चे ? पता नहीं क्या –क्या …उसकी प्रोफाइल सिर्फ दोस्तों के लिए ही खुली है अतः वहाँ से भी कुछ नहीं पता कर सका सिवाय इसके कि वो अब भी लखनऊ में ही है शायद !
मै तो लखनऊ तब से गया ही नहीं या ये कह दो कि वो शहर मुझे पसंद ही नहीं उसने मुझसे मेरी शेफ़ाली को अलग किया था . बीस साल हो गए मै इस सपनो की नगरी मुंबई का हिस्सा बन चुका हूँ साथ ही मेरी पत्नी दिव्या मेरे जीवन का और मेरे दोनों बेटे हमारे जीवन का . ज़िंदगी कितनी तेज़ी से गुज़र गई ,बीस साल हो गए ? पूरा दिन मै बेचैन रहा और जैसे ही वक्त मिलता केबिन में जाकर अपना फेस बुक चेक करता कि कहीं कोई मैसेज तो नहीं ? बार – बार अपना फ़ोन देखता कि कहीं कोई मिस कॉल तो नहीं . इतना लम्बा दिन है आज दो – दो सर्जरी थीं आज सुबह से फिर उसके बाद ओपीडी के मरीज़ रोज तो वक्त कब गुज़र जाता है ख़बर नहीं होती लेकिन आज का दिन है कि कट ही नहीं रहा बस मुझे बेचैन किये जा रहा है. थक कर कुर्सी को पीछे करके सर की टेक कुर्सी के बैक से लगा कर आँखें बंद कर लेता हूँ कि थोडा आराम कर लूँ तभी शाम के करीब सात बजे एक अन नोन न. से कॉल आती है मेरे फ़ोन पर मै जल्दी से फ़ोन उठता हूँ कि शायद ये शेफ़ाली हो और मेरा अंदाजा बिलकुल सही होता है सुबह के इतने लम्बे इंतज़ार के बाद उधर से वही आवाज़ “ हेलो राजीव , मै शेफ़ाली ” पहचाना ? ओह ! हाय कैसी हो, कहाँ हो ? हाँ पहचानूँगा क्यूँ नहीं. “ यहीं मुंबई में हूँ किसी काम के सिलसिले में आई थी सोचा इस बार आप से भी मिल लूँ ” .यहीं मुंबई में, तो क्या इसे मालूम है कि मै यहाँ मुंबई में रहता हूँ ? और इस बार, से क्या मतलब ? क्या शेफ़ाली मुंबई आती रहती है ? लेकिन कैसे / क्यूँ ? मै मन ही मन सोचने लगा . मतलब क्या शेफ़ाली को मेरे बारे में सब पता है क्या वो अब भी ? न जाने कितने सवाल एक साथ मुझ पर हावी हो गए. “ हेलो ” क्या हुआ राजीव ? शेफ़ाली की आवाज़ ने मेरा ध्यान खींचा . और मैंने खुद को सँभालते हुए कहा हाँ शेफ़ाली मै भी तुमसे मिलना चाहता हूँ बताओ कब कहाँ मिलना है ? मै खुद तुमसे मिलने आ जाता हूँ .
“ तो फिर मिलते हैं तुम्हारे हॉस्पिटल के ठीक सामने सड़क पार करते ही बाईं तरफ जो कॉफ़ी बीन कैफ़े है वहीँ पर ठीक आठ बजे ” कहते हुए शेफ़ाली ने फ़ोन रख दिया . और मै कुछ देर तक अपनी सीट पर चुपचाप ऐसे बैठा रहा जैसे भाव शून्य. सब पता है इसे तो ये भी कि मेरा हॉस्पिटल कहाँ है उसके सामने का कैफ़े तक . क्या शेफ़ाली को मेरे बारे में सब पता है ? बीस साल हो गए लेकिन इतने सालों बाद भी शेफ़ाली की आवाज़ में वही खनक और वही सौम्यता थी , क्या शेफ़ाली सब जानती है ये सवाल बेचैन कर रहा है मुझे और मैंने तो उससे कुछ पूछा भी नहीं ये भी नहीं कि वो है कहाँ इस वक्त ? लेकिन इतना ज़रूर समझ गया कि वो मेरी व्यस्तताओं से अवगत है तभी उसने मेरे हॉस्पिटल के पास ही मिलने के लिए कहा होगा उसका इतना केयरिंग नेचर अभी भी नहीं बदला. कुछ भी हो जाये उसकी वजह से किसी को तकलीफ न हो इस बात का ध्यान तो वो हमेशा से ही रखती रही है .
कैफे में ब्लैक कलर की कॉलर वाली टीशर्ट और डेनिम जींस में बैठी शेफ़ाली बिलकुल वैसी ही लगी जैसी बीस साल पहले थी वही बड़ी – बड़ी और बोलती हुई आँखें जो उसके हेलो कहने से पहले ही बोल पड़ती थीं और होठों पर फैली हुई लम्बीईईईई सी मुस्कान जो किसी को भी अपनी तरफ़ खींच ले. बस उसकी लम्बी चोटी गायब थी और बाल पहले से काफी छोटे थे हाँ शायद वजन पहले से थोडा अधिक था . बिना किसी औपचारिकता के हम एक दूसरे के ठीक सामने बैठ गए और आँखें एक दूसरे में गड गईं . कितना कुछ पूछना था मुझे लेकिन अब एक सवाल भी नहीं निकल रहा था मुँह से . कैसे हो ? यह भी पहले शेफ़ाली ने पूछा. हाँ अच्छा हूँ और अच्छा लगा तुम्हारा यूँ अचानक मिलना. तुम सुनाओ कैसी हो ? मैंने पूछा लेकिन उसके जवाब से पहले ही शेफ़ाली ने कहा अचानक नहीं राजीव मुझे इस बार मिलना था तुमसे इस लिए मैंने तुम्हे मैसेज किया अन्यथा मै तो पिछले १५ वर्षों से यहाँ हर महीने ही आती हूँ अपने हॉस्पिटल के काम से लेकिन कभी जानबूझकर एक दूसरे की लाइफ़ में नहीं आयेंगे ये कहा था हमने और इसी वजह से मै कभी आप से नहीं मिली लेकिन आज खुद को रोक नहीं सकी राजीव. मुझे लगा कि हम क्यों न मिले ? और हम क्यों नहीं मिल रहे हैं एक दूसरे से ? हम किससे भाग रहे हैं क्या हमने कोई गुनाह किया था कभी ? क्या प्यार गुनाह है ? हमने तो सभी की ख़ुशी की खातिर अपने प्यार तक को भुला दिया फिर ? इस सवाल ने मुझे बेचैन कर दिया था राजीव क्या हम इतने कमज़ोर हैं कि अपने ही लिए गए फ़ैसले पर कायम नहीं रह सकेंगे ? जब हम उस उम्र में इतना बड़ा फैसला ले सकते हैं और पूरी ईमानदारी से उसे निभाते भी हैं तो फिर क्यूँ हम अजनबी बने हैं इतने सालों से एक दूसरे से ? मेरा भी परिवार है पति है ,बच्चें हैं और मैं बहुत खुश हूँ संतुष्ट भी फिर सिर्फ इस वजह से कि हमने कभी कोई वादा किया था अतः हम नहीं मिल सकते कहाँ तक सही है राजीव आप ही बताइये ? एक सबसे अच्छे दोस्त की कमी लगातार पिछले बीस वर्षों से खल रही है और ये कमी कहीं से भी नहीं पूरी हो सकती थी इस लिए आज खुद को तुमसे मिलने से नहीं रोक पाई …..

शेफ़ाली बोलती गई और मै चुपचाप सुन रहा था साथ ही मुझे आश्चर्य हो रहा था ये जानकर कि शेफ़ाली कितना सही कह रही है जबकि मैंने कभी इस तरह से सोचा ही नहीं था . हाँ मै उसे याद तो करता था सदा ही लेकिन बस हमेशा उसी वादे में जकड़ा रहा कि हमे कभी नहीं मिलना है. हम दोनों इतने सालों तक एक दूसरे के सबसे अच्छे दोस्त रहे और फिर प्यार हुआ हमे और फिर पिछले बीस वर्षों से हम अजनबी रहे क्यों ? जबकि हम कभी अजनबी थे ही नहीं. आज हम दोनों ही अपने-अपने परिवार के साथ खुश हैं हमारी ज़िंदगी में कोई कमी नहीं है सिवाय एक दोस्त के फिर क्यूँ न हम इस अजनबी बनी हुई दीवार को गिरा दें सोचते हुए मैं तुरंत घर फ़ोन मिला देता हूँ फ़ोन दिव्या ही उठाती है मै बोलता हूँ कि दिव्या पता है “ आज अचानक हमारी बैच मेट शेफ़ाली मिली वो किसी काम के सिलसिले में लखनऊ से यहाँ आई हुई है, क्या हम उसे आज डिनर पर अपने घर बुला लें ? ” दिव्या को तो हमेशा ही अच्छा लगता है कि उसके घर लोग आयें और वो पूरे दिल से सभी का स्वागत करती है. हाँ राजीव क्यूँ नहीं ज़रूर, मै डिनर की तयारी करती हूँ आप उन्हें ज़रूर बुलाइए कहते हुए दिव्या फ़ोन रख देती है . उधर शेफ़ाली अपने पति कार्तिक को बता रही थी कि आज वो अपने दोस्त राजीव से मिली है और उसे थैंक्स भी कह रही थी कि कार्तिक आप नहीं होते तो आज मै राजीव से नहीं मिल पाती. थैंक्स कि आप ने मुझे समझा भी और समझाया भी . लव यू कार्तिक मेरी ज़िंदगी में आने के लिए और उसे संवारने के लिए. आज आप ने मुझे बरसों बाद मेरे दोस्त से मिलवाया है, मै अभी राजीव के साथ उसके घर डिनर पर ही जा रही हूँ और आज पहली बार उसकी पत्नी और बच्चों से मिलूंगी. और हाँ कल दोपहर ठीक एक बजे मेरी फ्लाईट वहाँ पंहुचेगी मै सीधे आपके पास हॉस्पिटल ही आऊँगी आप बस ड्राइवर को भेज दीजियेगा. और बाय ..लव यू …टेक केयर कल मिलते हैं कहते हुए शेफ़ाली ने फ़ोन काट दिया. चले राजीव, दिव्या इंतज़ार कर रही होगी कहते हुए शेफ़ाली मेरे साथ मेरी कार में बगल वाली सीट पर बैठ गई और फिर न जाने हम दोनों ने कहाँ – कहाँ की और अपने बैच के हर किसी के बारे में कितनी बातें की. इतना खुल कर तो मै पिछले बीस सालों में कभी हँसा ही नहीं था जितना कि आज . आज मन को बहुत हल्का लग रहा है जैसे कि न जाने कितना भार इतने बरसों से इस मन पर था और आज अचानक वो गायब हो गया है. यूँ लगा बीस सालों के थके हुए जकड़े हुए मन को आज राहत मिली है ……..
घर पँहुचते ही दिव्या हमेशा की तरह गर्म जोशी और अपनत्व के साथ शेफ़ाली का स्वागत करती है और शेफ़ाली भी जैसे कि अपनी किसी पुरानी सहेली से मिल रही हो इस तरह दिव्या के साथ घुल मिल जाती है . दोनों बेटे शेफ़ाली आंटी द्वारा लाये गए अपने – अपने गिफ्ट पाकर खुश हो जाते हैं और थैंक्यू आंटी कह कर अपने कमरे में चले जाते हैं. खाने के बाद स्वीट डिश खाते – खाते दिव्या पूछ बैठती है कि आप दोनों जब इतने अच्छे दोस्त थे तो फिर इतने सालों तक एक दूसरे की कोई ख़बर क्यों नहीं ली ? और मै कोई जवाब तलाशूं उससे पहले ही शेफ़ाली बोल पड़ती है हाँ वही तो दिव्या ये जनाब पढ़ाई ख़त्म होते ही एम् . डी . की पढ़ाई के लिए मुंबई आ गए और मैंने वहीँ लखनऊ में ही नौकरी कर ली और फिर जल्द ही मेरी शादी भी हो गई और तुम तो जानती ही हो कि शादी के बाद ज़िंदगी में कितनी सारी नई ज़िम्मेदारियाँ शामिल हो जाती हैं बस समय का पता ही नहीं चला . नई ज़िंदगी और साथ में नौकरी भी ,फिर बच्चे …बस इन सभी के साथ अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करते –करते अब जाकर ये अहसास हुआ कि ज़िंदगी में पीछे क्या छूट गया है और बस उसी अहसास ने मुझे अपने पुराने दोस्तों की खोज के लिए मजबूर कर दिया . अचानक सर्च करते – करते जैसे ही मुझे राजीव की प्रोफाइल दिखी मैंने झट से इन्हें मैसेज किया और आज हम सब एक साथ आपके घर पर हैं.
हाँ तुम सही कह रही हो शेफ़ाली ज़िंदगी तो सच में सभी की बहुत बिज़ी हो गई है . राजीव को अपने खाने तक की सुध नहीं रहती इनका पूरा समय हॉस्पिटल में ही बीत जाता है फिर घर आकर बच्चे भी पापा के साथ समय बिताना चाहते हैं इन सबके बीच दोस्तों को याद करने की भी फुरसत नहीं मिलती . अच्छा किया कि ये पहल तुमने कर दी कम से कम इसी बहाने मुझे एक अच्छी सहेली तो मिल गई . बातें करते – करते रात के एक बज गए . अब मुझे चलना चाहिए कहते हुए शेफ़ाली उठ जाती है . नहीं इतनी रात को आप अकेले क्यूँ जायेंगी और जायेंगी ही क्यूँ यहीं रुक जाइए क्या ये आपका घर नहीं ? दिव्या कहती है . नहीं ये बात नहीं अगली बार जब आउंगी तो ज़रूर रुकूँगी दिव्या लेकिन कल सुबह की मेरी फ्लाईट है और सारा सामान होटल में है , टैक्सी भी बुक है इसलिए अभी इजाज़त दीजिये. अच्छा ठीक है लेकिन आपको होटल हम अकेले नहीं जाने देंगे . राजीव आप शेफ़ाली को छोड़ आइये मै साथ नहीं आ पाउंगी क्योंकि बच्चे सो रहे हैं . राजीव और शेफ़ाली दोनों चले जाते हैं . रात का वक्त है दोनों खामोश है होटल पँहुच कर दिव्या बस यही कहती है कि राजीव तुम लकी हो कि दिव्या जैसी सुलझी हुई जीवन साथी तुम्हे मिली है . आज तुम्हे इस तरह खुश देखकर मुझे हमारे जीवन से कोई भी शिकायत नहीं है . क्या हुआ कि हम नहीं मिले ….उससे अच्छा तो आज ये लग रहा है कि हम आज मिल सके हैं और ये मिलना अब सदा के लिए है इसमें कोई बिछोह नहीं है…..है ना कहते हुए शेफ़ाली चली जाती है मै अकेले वापस लौट रहा हूँ अपने घर अपनी दिव्या के पास . एफ़.एम् में गाना बज रहा है ‘ ये जीवन है इस जीवन का यही है ..यही है …यही है …रंग रूप !

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गिरमिटिया मजदूर


कितने बरस गुज़र गए अपने देश गए हुए, बल्कि लगता है कितनी सदियाँ गुज़र गईं और मै तरस गया अपने देश, अपने गाँव नरीखेड़ा की मिटटी को छूने के लिए। नियति थी की मै यहाँ ‘ सूरीनाम’ में ‘गिरमिटिया मजदूर ‘ बन कर आ गया था। उस वक्त ये नहीं पता था की यही हमारी उपाधि हो जाएगी। एक अच्छी सोच के साथ यहाँ आया था लालच बस यही था कि यहाँ नौकरी मिलेगी और मै अपने घर-परिवार , गाँव सबका नाम रोशन करूँगा जैसे और भी आस-पास के गाँव के लोग यहाँ सूरीनाम आकर करते हैं। कभी कोई वापस लौट कर ही नहीं आता इतना खुश हो जाते हैं सब यहाँ। कच्ची उम्र में तरक्की के सपने संजोये मै भी चला आया था ‘दक्षिण अमेरिका’ के पश्चिम में स्थित छोटे से देश ‘सूरीनाम’ में। यहाँ तक का सफ़र पानी के जहाज का था और सारा खर्चा हमारे अंग्रेज़ मालिकों ने ही उठाया था जिनसे हमने यहाँ की तारीफें सुनी थी और बस उसी ख़ुशी की तलाश में,गरीबी से निजात पाने मै और मेरे जैसे न जाने कितने ही लोग आये थे इंडिया से। उस दिन अपना गाँव- देश छोड़ते हुए ज़रा भी दुःख नहीं हुआ था उम्र ही ऐसी थी, बस सपनो को मुट्ठी में करना था और उन्ही सपनो को सच करने का वादा दिलाकर ही अंग्रेज़ हमे यहाँ लाये थे।कई दिनों के लम्बे सफ़र और उसकी थकान के बाद जैसे ही जहाज़ बंदरगाह पर पहुँचता है जंजीरों से जकड़ा जाता है ठीक उसी तरह से जकड़ दिए गए थे हम सब भी सदा के लिए। जहाज़ तो एक समय बाद वापस मुक्त हो जाता है लेकिन हमारी मुक्ति हमे मौत ही दिलाएगी।अंग्रेजों द्वारा दिलाये गए सारे वादे खोखले थे और सामने था रात्रि के समंदर जैसा काला पानी सा सच !
सूरीनाम जहाँ की भाषा को ‘सरनामी’ भाषा कहते हैं,सीखने में हमे काफी वक्त लगा क्योंकि हमसे बात करने के लिए इस भाषा का नहीं बल्कि ‘कोड़ों की मार ‘ भाषा का ही अधिक प्रयोग किया जाता था। रोज़ अनगिनत बार कोड़ों की मार से शरीर नीला-काला हो जाता था पर धीरे-धीरे चीखें कम निकलती थीं,आदत हो गई थी शरीर को। यहाँ मै ही अकेला नहीं था बल्कि पूरे भारत वर्ष के अलग-अलग प्रान्तों की भीड़ थी और वो सब भी हमारी तरह अच्छे जीवन के प्रलोभन से ही यहाँ आये थे। कलकत्ता के लोगों की संख्या अधिक थी। भारतीय इतने अधिक थे कि यूँ लगता था अपने ही देश का कोई छोटा सा शहर बसा है सूरीनाम में। सूरीनाम में गन्ना बहुत अधिक होता है और हम सबसे यहाँ गन्ने की खेती ही करवाई जाती थी। पूरे दिन बिना खाना-पानी के काम कराया जाता था और सिर्फ एक बार इतना ही खाना  मिलता था की हम जिन्दा रह सकें। हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था क्योंकि हम वहां से भाग भी नहीं सकते थे। पानी के रास्ते जहाज़ से ले तो आये गए किन्तु वापसी का कोई भी रास्ता हमारे लिए नहीं था। हमारा जीवन समुद्र के खारे पानी के साथ मिलकर नमकीन ही रह गया,बल्कि नमक कुछ अधिक ही। अपने घर और देश से दूर यहाँ आकर हमे ये अहसास हुआ कि क्या खो चुके हैं हम। समय बीता और साथ ही हमारा जीवन भी, एक नए जीवन की शुरुआत भी यहीं से हुई और उसका पहला कदम था यहीं की एक लड़की से शादी। हम एक-दूसरे को अधिक नहीं जानते थे और न ही एक-दूसरे की भाषा की हमे समझ थी लेकिन फिर ये भी तो सच है प्यार कब भाषा का मोहताज़ हुआ है। आँखों ने मन की बातें पढ़ लीं और ज़ुबाँ ने जो कहना चाहा वो कानो से लेकर ह्रदय तक संप्रेषित हो गया। एक बार फिर से जीवन जीने की चाह जगी। हमने शादी कर ली और शादी के एक वर्ष बाद ही जब बेटे रिहान का जन्म हुआ तब यूँ लगा जैसे अपना ही नया जन्म हुआ हो। सारी तकलीफ़ें जैसे उड़न छू हो गई पल भर में ही। हम दोनों खूब काम करते और जो भी मुश्किल से पैसे बचते उन्हें रिहान की परवरिश के लिए रख लेते क्योंकि अपने अंश अपने बेटे को हम एक बेहतर जीवन देंगे ये हमने एक दूसरे से वादा किया था। रिहान धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था और हम दोनों उसके अच्छे भविष्य के लिए तत्पर। रिहान बहुत समझदार था सारी परिस्थितियों से वाकिफ़ भी था इस लिये हमेशा यही कहता कि नौकरी मिलते ही मै आप दोनों को इन सारे कष्टों से दूर रखूंगा, बहुत कर लिया आप दोनों ने अब मेरी बारी है कि मै अपने मम्मी-पापा को खुशियाँ दूं।आज भी याद है वो दिन जब रिहान को पहली तन्खाह मिली थी उसने पूछा था बताओ पापा क्या दिलाऊँ आपको और मैंने कहा था, बस एक बार मुझे मेरे गाँव मेरे देश ले चलना बेटा और दूजी कोई चाह नहीं है मेरी।मेरा देश बहुत अच्छा है , वहाँ सब में आपस में बहुत प्यार है , वहाँ हर जाति-धर्म के लोग आपस में मिलकर रहते हैं और सभी एक दूसरे के त्यौहार मानते हैं ,इतना भाईचारा दुनिया में और कहीं नहीं। मुझे पावन गंगा नदी में स्नान करना है फिर एक बार महसूस करना है जैसे माँ की गोद में बैठ गए हों उस स्पर्श का अहसास आज भी कितना ममतामई है। रिहान मेरे गाँव से बस थोड़ी ही दूरी पर है जगह बक्सर। गंगा नदी वहीँ से होकर गुज़रती है और वहां पर माँ चंडी देवी का प्राचीन सिद्ध मंदिर भी है। मंदिर के ठीक नीचे अंतिम सीढ़ियों में सदा ही गंगा का जल बहता रहता है। मेरे पिता जी बताते थे की मेरा मुंडन भी वहीँ उसी मंदिर के आँगन में हुआ था और मेरे बालों को आंटे की लोई में भरकर वहीँ गंगा नदी में प्रवाहित किया गया था। बक्सर के करीब 13 किलोमीटर पहले जगह पड़ती है भगवंत नगर वहां के मान हलवाई की दुकान और उसके मीठे समोसे बहुत प्रसिद्ध थे। ताज़ी गरम जलेबियाँ बरगद के पत्ते में मिलती थीं आज भी याद है उन गरम जलेबियों की मिठास जब कि उस वक्त मै 10 बरस का थ। हमारे गाँव में सब घर अपने जैसे ही थे जहाँ भूख लगे वहीँ खाना खा लो। चाचा,काका-काकी जैसे रिश्ते सिर्फ स्नेह और ममता ही बरसाते थे। रिहान मेरी पहली और अंतिम इच्छा यही होगी कि तुम मुझे मेरे गाँव, मेरे देश ले चलना। अभी कोई जल्दी नहीं है पहले खूब कमाओ, जियो अपनी माँ को आराम दो अपना परिवार बसाओ  फिर मुझे मेरी मिटटी तक ले चलना। अपने दादा जी की डायरी पढ़ते-पढ़ते रॉबर्ट की ऑंखें नम हो आईं आज अचानक ही दादा जी के कमरे से उसे ये डायरी मिली थी जो उसने बड़ी उत्सुकता वश पढनी शुरू कर दी थी बिना अपने पापा रिहान की इज़ाज़त के। रॉबर्ट डायरी लेकर अपने पापा रिहान के पास जाता है। पापा आपसे बिना पूछे दादा जी की डायरी पढ़ी और मेरा मन बहुत दुखी हो गया है क्या आप दादा जी को उनके देश भारत लेकर गए थे ?
नहीं !! कहते हुए रिहान एक लम्बी सांस लेते हुए अपनी आँखें बंद कर लेता है। कुछ देर की चुप्पी के बाद रिहान कहता है मै तुम्हारे दादा जी को भारत ले जाना चाहता था किन्तु नहीं ले जा सका कई समस्याएं थीं उस वक्त और जब तक मै उनकी ये इच्छा पूरी करता वो नहीं रहे इस बात का दुःख मुझे आज तक है क्योंकि सिर्फ यही एक चीज़ मांगी थी उन्होंने मुझसे और मै नहीं दे पाया। उस वक्त तुम बहुत छोटे थे ,तुम्हारे जन्म के समय ही तुम्हारी माँ गुज़र गईं और तुम्हारा लालन पालन तुम्हारी दादी ने ही किया। उस हालत में न तो मै तुम लोगों को भारत ले जा सकता था और न ही तुम्हे छोड़कर।इसी तरह वक्त कब बीत गया पता ही नहीं चला और एक रात तुम्हारे दादा जी सोए तो फिर उस गहरी नींद से कभी नहीं उठे। तुम्हारी दादी इसी देश की थीं इस लिए भी मै बाद में भारत नहीं गया क्योंकि पिता जी की अंतिम इच्छा पूरी नहीं कर सका था इस लिए कम से कम माँ के अंतिम समय में मै उन्हें उनके देश उनकी मात्र भूमि से दूर नहीं ले जाना चाहता था। आज अच्छा लग रहा है ये जानकार रॉबर्ट, कि तुम दादा जी की भावनाओं को समझ सके हो ” आय एम् प्राउड ऑफ़ यू माय सन “.
डैड क्या हम इण्डिया चल सकते हैं, क्या हम वहाँ चल कर दादा जी के परिवार से मिल सकते हैं ? आखिर वो हमारा भी तो है …है ना डैड।
रॉबर्ट यहाँ तुम्हारा परिवार है ,वाइफ है दो बच्चे हैं इस हालात में तुम इंडिया जाने की कैसे सोच सकते हो जब कि तुम कभी इंडिया गए भी नहीं। हाँ तुम मेरी टिकट करा दो और मै अपने पिता के देश उनके गाँव हो आता हूँ ,उन सभी तीर्थ स्थलों के दर्शन भी कर लूँगा जिनका जिक्र पापा हमेशा ही किया करते थे। वापस आकर तुम सब को ले चलूँगा जब बच्चों की भी छुट्टियां होंगीं तब ! तुम्हारा इस तरह पापा की डायरी पढना इस बात का संकेत है कि पापा आज भी अपने देश के लिए तड़प रहे हैं शायद उनकी आत्मशांति तभी होगी जब मै उनके देश-गाँव हो आऊंगा। वहाँ की मिटटी के स्पर्श मात्र से तुम्हारे दादा जी को मुक्ति मिल जाएगी और शायद मुझे भी, आखिर वही तो है हमारा भी देश हमारा अपना। रॉबर्ट अपने डैड रिहान की टिकट करा देता है और रिहान असंख्य सपने संजोये हुए  रखता है कदम अपने पापा की स्वप्न से भी सुन्दर दुनिया में।उसे याद है कि पापा सदा ही अपने गाँव पैसे भेजा करते थे,गाँव के अपने सभी भाई-बंधुओं के लिए और जब, वो बड़ा हुआ उसे अच्छी नौकरी मिली तब से तो उसके पापा ने हर महीने एक निश्चित रकम गाँव भेजनी शुरू कर दी थी सिर्फ यही सोचकर कि घर परिवार से दूर होना मजबूरी है लेकिन घर-परिवार की पैसों से मदद करना कर्तव्य। रिहान लम्बी हवाई यात्रा के बाद इण्डिया पंहुचता है अभी सुबह के तीन बजे हैं । रखता है अपना पहला कदम देश की राजधानी दिल्ली के हवाई अड्डे पर। सोचता है मन ही मन कि क्या सच में ये उसका देश है ? पूरा दिन है उसके पास क्यूँकि उसके गाँव जाने की ट्रेन रात साढ़े नौ बजे की है। टैक्सी वाले को रेलवे स्टेशन के पास के ही किसी होटल में चलने के लिए कहता है। सुबह-सुबह बिलकुल शांत है दिल्ली। इण्डिया गेट और राष्ट्रपति भवन देख कर खुश होता है वह कि हमारा देश तो सच में बहुत सुन्दर है। होटल में पंहुचकर सोने की कोशिश तो बहुत करता है लेकिन कौतूहल उसे सोने नहीं देता। नहा-धो कर तैयार हो चल पड़ता है दिल्ली की सैर करने। होटल से ही टैक्सी तय कर ली थी पूरे दिन दिल्ली के ऐतिहासिक स्थलों और शहर के घूमने की।रिहान खुश है आज बार-बार उसे पापा याद आ रहे हैं और पापा की कहीं हजारों बातें। पूरा दिन कब गुजर गया पता ही न चला शाम हो गई। ट्रेन निश्चित समय से २ घंटे की देरी से चल रही है फिर भी रिहान जाकर पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेट फॉर्म न . ६ पर इंतज़ार करता है। करीब ढाई घंटे बाद अनाउन्समेंट होता है की अम्बाला से चलकर ऊंचाहार जाने वाली ‘ ऊंचाहार एक्सप्रेस ‘ प्लेट फॉर्म न . ६ पर आ रही है। सारा सामान ले वो झट से ट्रेन में चढ़ जाता है। ट्रेन चल पड़ती है और रिहान अपनी आँखों में असंख्य सपने संजोये याद करता है अपने पापा को। कहता है मन में ‘ पापा ‘ मै आ रहा हूँ। अगली सुबह वो कानपुर स्टेशन पर उतर जाता है और वहीँ से अपने गाँव के लिए टैक्सी कर लेता है उसे पता ही नहीं की ये ट्रेन उसके गाँव के बेहद करीब से गुज़रती है। टैक्सी वाला बताता है उसे कि साहब ये गाड़ी तो आपके गाँव के पास से ही जाती है, आप इतना पहले उतर गए हैं। रिहान फिर भी निश्चिन्त है कोई बात नहीं ,आपको मेरे गाँव का पता मालूम है ना बस आप ले चलिए फिर। मात्र एक घंटे में ही वो एक ‘बक्सर’ नामक जगह पर पंहुच जाता है। वहाँ एक विशाल नदी को देख कर ड्राइवर से पूछता है की ये कौन सी नदी है ? ” गंगा नदी ” ड्राइवर का जवाब सुनते ही रिहान बोल पड़ता है ओ वॉव ! रोको प्लीज़ मैं इस पावन नदी का स्पर्श करना चाहता हूँ। रिहान बचपन से ही पापा से गंगा नदी की पवित्रता के बारे में सुनता आया था। गंगा नदी के स्पर्श में रिहानअपने पापा का स्पर्श महसूस करता है। नदी में स्नान के बाद वो प्रसिद्ध सिद्ध पीठ चंडी माता के दर्शन करता है। रिहान भावुक हो उठता है ये सोचकर कि पापा कितने बेचैन रहे होंगे अपने देश अपनी मिटटी से अलग। आज वो पापा के दर्द को खुद में महसूस करता है। बक्सर से करीब
१ २ किलोमीटर बाद वो भगवंत नगर नामक एक छोटे से कस्बे में पंहुचता है यहाँ पर ड्राइवर रुककर उसके गाँव ‘ नरी खेड़ा ‘ का रास्ता पूंछता है। रिहान गाड़ी से उतर आता है सामने एक चाय की दूकान पर बैठ जाता है। काफी लोगों की भीड़ इकठ्ठा थी उस दूकान पर तभी उसकी नज़र दूकान के ऊपर लिखे उसके नाम पर जा पड़ती है ,काफी धुंधला सा दिख रहा है शायद जब दूकान खुली होगी तभी नाम लिख कर टांगा गया होगा। ” मान हलवाई ” नाम पढ़कर वो अचंभित हो गया और एकदम जोर से बोला, मान हलवाई ! रिहान की आवाज़ सुन आस-पास के लोग उसे देखने लगे कि हुआ क्या है। किसी ने बोला  भी ‘ इसमें आश्चर्य की क्या बात है ‘ लगता है कोई परदेसी है ? रिहान अपना पूरा परिचय बताता है और साथ ही देश आने का उद्देश्य भी। वहाँ उपस्थित दो लोग उसे झट से गले लगा लेते हैं और कहते हैं ‘ अरे ,तू सरजू का बेटा है, मेरे सरजू का। मै सरजू का बड़ा भाई हूँ और ये छोटा चचेरा भाई है ।रिहान की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता वो झट से दोनों लोगों के पैर छूता है। अरे चाय लाओ भाई साथ ही समोसे, पकौड़ी और गरमागरम जलेबी भी। चाय आती है सब पीते हैं और खूब जमकर खाते हैं बाद में बिल रिहान की तरफ बढा दिया जता है। ये कैसा आतिथ्य ? रिहान बिल के पैसे देते हुए सोचता है। रिहान कहता है कि ‘घर चलें काका’ सुनते ही काका कहते हैं हाँ क्यों नहीं बेटा फिर तुरंत ही बोल पड़ते हैं कि कुछ पैसे चाहिए हमे। हमारे पास तो वैसे भी कुछ है ही नहीं। सरजू तो कमाने गया और फिर लौटा ही नही भूल गया हम सबको,कभी एक पैसा तक न भेजा उसने। ये सुनकर रिहान दंग रह गया क्योंकि जब से वो बड़ा हुआ था वो खुद ही पैसा भेजता था इन सबके नाम से ,फिर ये झूठ क्यों बोल रहे हैं ? आधा दिन बीत गया उसी दूकान पर लेकिन किसी ने रिहान को घर या गाँव चलने के लिए नहीं कहा बल्कि तब तक कुछ और लोग उसके आने की खबर पाकर वहीँ आ गए और अपना- अपना रोना रोने लगे कि अब तुम आ गए हो बेटा तो तुम ही कुछ करो जब इतना कमाया है तो वो अपनों के लिए ही ना।हम सब बेहद गरीब हैं या तो हमारी पैसों से मदद कर दो या फिर अपने ही साथ ले चलो। सरजू तो कभी आया नहीं और हम बस जिम्मेदारियों के नीचे दबते चले गए। अब जो तुमने हमारी मदद न की तो क्या यहाँ हमारी गरीबी का मजाक बनाने आये हो। रिहान को कुछ समझ नहीं आ रहा था एक पल को उसे ऐसा लगा जैसे उसकी सोचने समझ पाने की कोई शक्ति कहीं चली ही गई है कि ये सब क्या कह रहे हैं जबकि उसके पापा ने तो ख़त के ज़रिये अपनी सारी ज़मीन तक इन्ही भाइयों के नाम कर दी थी और हमेशा ही इन्हें पैसे भेजते रहे फिर ये लोग उल्टा हमसे पैसे क्यों मांग रहे हैं, देखने में तो कोई भी निर्धन नहीं लग रहा है। दुकान पर बैठे -बैठे शाम होने को आई लेकिन न ही किसी ने उससे खाने को पूछा और न ही गाँव चलने को कहा बल्कि सब के सब किसी भूखे गिद्ध की तरह उससे पैसे ही मांगते रहे और अपनी लाचारियाँ जताते रहे बल्कि उससे ज्यादा उसके सूटकेस पर सभी की नज़रें जमीं रहीं। अँधेरा घिरने लगा और वो सब एक साथ उठ खड़े हुए कि अच्छा अब चलते हैं , रिहान भी उठा कि हाँ चलिए मैं भी बहुत थक गया हूँ तभी काका बोले बेटा तुम कहाँ चलोगे तुम यहीं कहीं अपना इंतजाम कर लो हमारे घर तो बहुत छोटे हैं और हम सब तो जमीन पर ही सोते हैं कोई खाट या बिस्तर नहीं है हमारे पास या तो कुछ पैसे दे दो तो हम तुम्हारे लिए बिस्तर खरीद लें। अब तक रिहान को समझ आ गया कि ये सब लालची हैं और उसने तुरंत कहा नहीं काका आप सब जाओ मैं आज यही रुक जाऊँगा कल मिलेंगे फिर आप सभी से। पैसे तो मैं भी लेकर नहीं आया कल सुबह बैंक से निकालूँगा, आज की रात यहीं कहीं गुजार लूँगा। कल आप के साथ गाँव चलूँगा। ठीक है बेटा अब तुम आराम करो हम कल सुबह ही आ जायेंगे। सभी चले जाते हैं और रिहान वहीँ बैठा रहता है जब तक दूकान बंद नहीं हो जाती है। रात हो गई साहब, चलना नहीं है ? ड्राइवर की आवाज़ से रिहान की खामोशी टूटती है। चलना है लेकिन पहले कहीं खाना खा लेते हैं जोर की भूख लगी है। ड्राइवर एक ढाबे पर रोकता है तो रिहान कहता है कि भूख ही नहीं है लेकिन साहब आपने ही तो कहा था की भूख लगी है। हाँ , क्योंकि तुम्हे भूख लगी होगी कुछ खा लो फिर चलना है। ड्राइवर खाना खाता है और रिहान अपने गले में पापा के रुन्धते -अटकते शब्दों को निगलने की कोशिश करता है। चलें साहब मैंने खा लिया, किधर रिहान के मुंह से निकलता है। मैंने आपके गाँव नरीखेड़ा का रास्ता समझ लिया था दिन में ही, कहते हुए ड्राइवर गाड़ी स्टार्ट करता है और सीधा नरी खेड़ा गाँव पंहुचता है। गाँव के ठीक बाहर ही रिहान गाड़ी रोकने को कहता है। तुम यहीं रुको मैं जरा गाँव के अन्दर हो कर आता हूँ। पूरे दिन का नजारा देख कर ड्राइवर भी इतना तो समझ ही चुका था कि साहब क्या देखने पैदल जा रहे हैं इस लिए उसने बस यही कहा हाँ ठीक है साहब वैसे भी खाने के बाद मुझे नींद आती है तब तक एक नींद मार लेता हूँ। रिहान के लिए ये गाँव क्या देश ही नया था फिर भी अपने पापा की नज़रों से उसने गाँव को अपने बेहद करीब महसूस किया था। एक गाँव वाले से सरजू के घर का पता पूछता है और घर के बाहर पंहुच कर हतप्रभ रह जाता है।एक आलीशान घर के बाहर दो जीप खड़ीं थीं,नौकर – चाकर घूम रहे थे। बाहर ही दो खाट पड़ी थीं और चार-पांच कुर्सियां भी साथ ही एक लकड़ी की बेंच भी। तभी ठीक किनारे थोडा दूर उसकी नज़र पड़ी एक काफी मोटे से नीम के पेड़ पर जिसे वो हमेशा ही पापा से सुनता आया था कि पापा का बचपन उसी के साथ बीता था वो वहीँ बैठ जाता है सट कर नीम के पेड़ से अँधेरा होने की वजह से किसी की नज़र उस पर नहीं पड़ती। रिहान के कानों में आवाज़ पड़ती है कि आज तो बच गए अगर वो गाँव आ जाता तो तो हमारे ठाट – बाट देखकर अगले ही महीने से हमे रकम भेजना बंद कर देता सरजू अपने परिवार के साथ बैठा बात कर रहां था।सभी जोर-जोर से हँसे फिर कोई बोला सरजू काका ये सोने का अंडा देने वाली मुर्गी है कल जितना हो सके निकलवा लीजियेगा। अरे तू चिंता मत कर बेटे इसके बाप ने भी जीवन भर हमे पैसे भेजे हैं यही सोचकर कि हम यहाँ बहुत गरीबी में हैं और अब ये भी भेजता रहेगा। कल ही किसी बहाने से मोटी रकम निकलवा लूँगा बैंक से ,सरजू बोला । ये सब सुन कर रिहान सन्न रह गया वहीँ हांथों से नीम के पेड़ के नीचे की थोड़ी नम सी मिटटी को निकाल कर मुठ्ठी में लिया और वहां से चला गया। टैक्सी में बैठते ही बोला सीधे कानपुर चलो अभी। रात कानपुर के एक होटल में गुजारी और अगले ही दिन दिल्ली और फिर वहां से पहली फ्लाईट ले सीधे सूरीनाम के लिए उड़ गया। सूरीनाम में उतर कर पहली बार उसे ये ज़मीन अपनी लगी उसे लगा कि उसके पैरों तले ज़मीन है।अचानक रिहान को घर पर देख सभी अचम्भित रह जाते हैं साथ ही घबराए हुए से उसकी खैरियत पूछते हैं।बहुत थका हूँ अभी ,कह कर वो अपने कमरे में चला जाता है और सो जाता है। अगले दिन सुबह रॉबर्ट पूछता है डैड क्या हुआ ? आप बहुत परेशान लग रहे हैं और इतनी जल्दी वापस कैसे आ गए सब ठीक तो है ? प्लीज बताइए, कैसा है दादा जी का गाँव बल्कि इण्डिया कैसा है ,कौन-कौन मिला आपको ,सब कैसे हैं वहाँ पर …रिहान बिलकुल  चुप था फिर थोड़ी देर बाद बोला  पापा के गाँव में अब कोई नहीं रहा। आस -पास के गाँव वालों से पूछने पर पता चला कि कई वर्षों पहले वहाँ प्लेग फैला था और एक महामारी की तरह पूरा गाँव उसकी चपेट में आ गया। रॉबर्ट इण्डिया अपना देश है और जैसा पापा ने बताया था उससे भी अधिक नया लगा मुझे लेकिन पापा का गाँव और उसका नामों निशाँ नहीं है अब। ओह ! कहकर रॉबर्ट ऑफिस चला जाता है रिहान अपने पैंट की जेब में पड़ी नीम के पेड़ के नीचे की मिट्टी निकालता है और घर के बाहर के अपने छोटे से लॉन में उड़ा देता है ये कहते हुए कि “पापा आपके घर, आपके देश की मिट्टी अब यहीं है और सदा यहीं रहेगी आपके साथ”।

हमारी यह कहानी त्रैमासिक पत्रिका  ‘ विश्व गाथा ‘ के सितम्बर – नवंबर : २०१३ अंक में प्रकाशित हुई है 🙂

आप सभी की अमूल्य प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी .

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उड़ना है मुझे फिर


एक मोर बेहद ख़ूबसूरत,नहीं आना चाहता था ज़मीन पर सदा पेड़ की सबसे मजबूत शाखा पर बैठ निहारता ज़मीन को और डर जाता कि ज़मीन पर तो खतरा है बहुत मै यहीं सुरक्षित हूँ । यहीं से ही ज़मीन की सुन्दरता को देखना ठीक है सोचता वो मन ही मन । अचानक एक रोज़ एक इंसान ने देख लिया उस मोर को और उसके ख़ूबसूरत पंखों को बस देखता ही रह गया,उसने सोचा कि कितना अच्छा हो अगर ये ख़ूबसूरत पंख मुझे मिल जाएँ तो इन्हें मै अपने घर में सजाऊँ । बस ! धरा रूप उसने भी एक बलशाली मोर का, जा पँहुचा उसके समक्ष उसी डाली पर । फैलाया मोह जाल और फाँस लिया उस सुन्दर मासूम मोर को
दिलाया भरोसा चलो ज़मीन पर मै हूँ तुम्हारे साथ,ज़मीन के लोग इतने भी बुरे नहीं और मै सदा तुम्हारे साथ ही रहूँगा,बस अपनी मर्जी से कहीं मत जाना और जहाँ मै कहूँ वहीँ रहना,जिस पर मै कहूँ उसी पर भरोसा करना । सब बातें मान, कर भरोसा चल पड़ा सुन्दर मोर उस बलशाली मोर के साथ करने ज़मीन की सैर निहारने उन सभी फूलों को जो दूर से कुछ धूमिल नज़र आते थे उसे । ज़मीन की सख्त सतह पर उतरते ही सुन्दर मोर को अपनी शाख जैसी मजबूती का अहसास हुआ । सुन्दर फूलों से भरी क्यारी में जैसे खिल उठा वो , अपलक देखता रहा उन गुलाबों को और खो सा गया उस मनभावन ख़ुशबू के बीच कि तभी खीँच लिए पीछे से पूरी ताकत से किसी ने उसके सुन्दर पंख । कराह उठा वो दर्द से तेज़ ! जीते जी किसी को इस तरह मारना , दर्द भी न बयाँ हो सका उसका । चीख भी ख़ामोश हो गई उसकी जब देखा उसने कि ये मौत उसे कोई और नहीं वही बलशाली मोर दे रहा है और मुस्कुराते हुए वह अपने असली भेष में आ गया, देखो कैसे मैंने तुम्हे ज़मीन पर उतारा क्यूंकि चाहिए थे मुझे तुम्हारे सुन्दर पंख अपने मकाँ को सजाने के लिए।
निःशब्द ,स्तब्ध मासूम मोर पड़ा रहा ज़मीन पर जड़वत ! लहूलुहान,पीड़ा से घिसटता रहा और उसकी तकलीफ से बेपरवाह वो छलधारी देखता रहा मुस्कुराता रहा अपनी जीत पर कि आज सबसे सुन्दर मोर के पंख नोच लिए मैंने और अब ये मेरे हो गए हैं सिर्फ मेरे । सजाऊंगा इनसे अपना ड्राइंगरूम,समेट सारे पंखों को चला गया वो । सुन्दर मोर जिसकी सुन्दरता के पंख न थे अब उसके पास खुद को ज़मीन से लगाता ,लोगों की नज़रों से बचाता ,पीड़ा को छिपाता जा छुपा कुछ बड़ी घास और कंटीली झाड़ियों के पीछे । वहाँ से ठीक से उसे अपनी वो मजबूत शाख भी न दिख पा रही थी फिर याद आया कि वो तो उड़ भी न सकेगा अब ।करना होगा उसे फिर से नए पंख उगने का इंतज़ार, उनके बढ़ने का और तब कहीं वापस जा सकेगा वो अपने घर । उड़ेगा ज़रूर वो क्यूंकि ज़मीन पर नहीं रहना उसे, जाना है अपनी शाख के पास और इस बार ज़मीन पर वापस न ला सकेगा कोई उसे ।
मान्यता अपने स्कूल की हिंदी किताब से ये कहानी सुना रही थी मुझे और मै ! मै तो न जाने कहाँ गुम थी कि अचानक उसने कहा – मम्मी क्या हुआ ,आप रो क्यूँ रही हो ये तो एक कहानी है और देखो आखिर में मोर ने पॉजिटिव बात सोची है कि वो उड़ेगा फिर । मान्यता की आवाज़ कानों में पड़ तो रही थी पर अतीत की कुछ चीखें इतनी तेज़ी से सुनाई दे रही थीं कि एक पल लगा किसी ने फिर से खुले ज़ख्मों पर नमक छिड़क दिया वो भी पिसी सुर्ख लाल मिर्च के साथ । खुद को कैसे संभाला था मैंने जब इसी तरह नोच लिया था मेरा भी अस्तित्त्व मेरे सबसे प्रिय दोस्त प्रतीक ने । उफ़ ! कितना असहनीय दर्द था की आज भी मोर की कहानी सुनकर अपना दर्द ताजा सा चुभा । सर में तेज़ दर्द हो उठा ,एक प्याली अदरक की तेज कड़क चाय बनाकर उसके गर्म घूँट लेते हुए पलट जाते हैं कुछ पन्ने प्रतिभा के अतीत के जब कि वो भी थी उसी अल्हड़ उम्र पर जब यौवन खिलता है पूरी तरह .सब उसे उसकी सुन्दरता से जानते थे जो भी उसे देखता बस देखता रह जाता और यदि कोई उसकी आवाज़ सुन लेता तो बस मन्त्र मुग्ध ही हो जाता। प्रतिभा बेहद शर्मीली,संकोची अपने घर की सबसे छोटी ,माँ-पापा और भईया की लाडली थी । जब भी उसे ज़रूरत होती सदा ही ये घनी शाखाएँ उसके साथ होती । गाना सुनने और गाने का शौक उसे बचपन से ही था,उसने कहीं से सीखा तो नहीं था पर फिर भी सुरों पर उसकी पकड़ ज़बरदस्त थी जब भी गाती पूरे दिल से गाती और सुनने वाले उसकी मधुर आवाज़ के दीवाने हो जाते । एक दिन अखबार में एक विज्ञापन देखा कि शहर में ‘गायन प्रतियोगिता’ हो रही है और जो भी गाने के इच्छुक हों भाग लेने के लिए आवेदन कर सकते है । माँ-पापा और भईया के कहने पर प्रतिभा भी जा पहुँचती है ऑडीशियन के लिए। अपना नंबर आने से पहले सभी अपनी-अपनी तैयारी में लगे थे और मुझे तो लग रहा था कि मुझसे गाया ही नहीं जायेगा हमेशा सिर्फ घर वालों और दोस्तों के बीच ही गाया था मैंने । सबसे थोड़ा दूर अलग जा कर एकांत में गाने के बोल दोहराती हुई अभ्यास कर रही हूँ कि तभी एक आवाज़ पड़ती है कानो में – वाह ! इतना मीठा, बहुत सुन्दर गाया आपने । पलट कर देखा तो करीब ६ फुट लम्बा लड़का मुस्कुराते हुए ताली बजा रहा था, आमना-सामना होते ही झट से उसने हाँथ आगे बढ़ाया – हाए, मै प्रतीक माथुर । अभी आपका गाना सुना,कमाल का गाया आपने । सच कह रहे हैं न आप ? मुझे बेहद घबराहट हो रही थी इसलिए मै यहाँ गाने के बोल दोहरा रही थी । मेरा नाम – प्रतिभा है , प्रतिभा नायक । आपने सच में अच्छा गाया है तभी तो मै खुद को रोक नहीं पाया, अब मै भी गाता हूँ और आप बताइयेगा कि कैसा लगा , कहकर प्रतीक ने गाना शुरू किया और मै बस उसे सुनती रह गई । एक खास कुछ अलग लहजा था उसकी आवाज़ में । आप तो बहुत ही अच्छा गाते हैं प्रतीक, आपका सेलेक्शन तो पक्का । आपका भी प्रतिभा ,मुस्कुराते हुए उसने कहा ।
प्रतीक पिछले आठ वर्षों से गायन प्रशिक्षण ले रहा था सो प्रतिभा ने मन ही मन उसे अपना गुरु मान लिया,आप हमे संगीत की बारीकियाँ सिखाएँगे उसने प्रतीक से पूछा । हाँ ! क्यूँ नहीं ज़रूर,वैसे आपके गायन में कोई कमी नज़र आई नहीं हमे फिर भी हर मोड़ पर आपका साथ दूँगा मै । धीरे-धीरे प्रतीक और हम रोज़ ही मिलने लगे,कब प्रतीक मेरे दिल के करीब आ गया मुझे पता ही न चला ये अहसास भी प्रतीक ने ही मुझे दिलाया तब जाकर पता चला कि हम दोनों को ही प्यार हो गया है एक – दूजे से । दुनिया बेहद ख़ूबसूरत हो चली थी, अब बागंबेलिया के फूलों में भी महक महसूस होने लगी थी । साथ-साथ गाना हमे बेहद भाता था धीरे-धीरे हमारे गायन में और निखार आता जा रहा था फिर वो दिन भी आया जब टॉप दो की पोजीशन पर हम दोनों ही पँहुचे और उसी पल मैंने चाहा कि बस अब तो विजेता का ख़िताब प्रतीक को ही मिलना चाहिए , प्रतीक ही डिज़र्व भी करते हैं और इस मुकाम पर मै सिर्फ अपने प्रतीक को ही देखना चाहूँगी, भला इस से ज्यादा मेरे लिए और कोई ख़ुशी हो ही नहीं सकती पर जब वो पहला नाम लिया गया कि इस प्रतियोगिता कि विजेता हैं प्रतिभा नायक । सहसा अपने ही कानो पर यकीं नहीं हुआ ,अच्छा तो लगा पर ख़ुशी अधूरी सी लगी क्यूंकि मै तो सिर्फ प्रतीक का नाम ही सुनना चाहती थी . प्रतीक ने मुझे बधाई दी और उसी वक्त वहाँ से चला गया.ढेरों बधाइयाँ,उपहार और साथ ही कुछ नए गानों के एलबम व एक फ़िल्म में भी गाने का मुझे औफ़र मिला । अगले दिन प्रतीक मुझसे मिला तो कुछ बदला-बदला सा लगा हालाँकि व्यवहार वो पहले जैसा ही कर रहा था पर न जाने कुछ अलग सा महसूस हुआ मुझे । मैंने उसके हांथों में अपना हाँथ रखते हुए कहा कि प्रतीक मै चाहती थी बल्कि मुझे पूरा विश्वाश था कि विजेता तुम ही होगे पर पता नहीं कैसे मेरा नाम…
छोड़ो न यार, जो हो गया सो हो गया कहते हुए प्रतीक ने मेरे हाँथ से अपना हाँथ अलग कर लिया । प्रतिभा मै तुम्हारे लिए बहुत खुश हूँ आखिर तुमसे प्यार जो इतना करता हूँ और मै तो यहाँ तुम्हे इन्वाइट करने के लिए आया हूँ । आज शाम को हम सब दोस्तों ने तुम्हारे लिए एक पार्टी राखी है कहते हुए प्रतीक ने मेरा हाँथ पकड़ लिया और बोला, आई लव यू यार ! मी टू,प्रतीक ! कहते हुए हम दोनों एक दुसरे के गले लग गए । चलो फिर शाम को ठीक ६ बजे तैयार रहना , मै खुद आऊँगा तुम्हे लेने के लिए कह कर प्रतीक चला गया …
आज प्रतिभा बेहद खुश थी क्यूँकि प्रतीक उसके साथ उसकी ख़ुशी में शामिल था आज उसकी आँखों व चेहरे की चमक ही अलग थी और आवाज़ की खनक तो ऐसी कि लगे जैसे सुर की देवी ने ही वीणा के तारों को छू दिया हो । शाम को क्या पहनूँ इसी उधेड़बुन में बैठी थी की माँ आजाती हैं । माँ को देखते ही, माँ आज शाम ६ बजे मेरे दोस्तों ने मेरे लिए पार्टी रखी है सभी मेरे कॉलेज के फ्रेंड्स हैं और कुछ जो कि अभी इस प्रतियोगिता के समय बने हैं , प्रतीक खुद मुझे लेने आएगा माँ मै जाऊं ना । हाँ ! ज़रूर जाओ बेटा ,यही तो मौका है तुमने इतनी बड़ी ख़ुशी दी है कि हम सब को गर्व है तुम पर । पर मै पहनू क्या माँ ?
कुछ भी पहन लो वैसे गुलाबी रंग में तुम मुझे परी सी लगती हो, कोई भी गुलाबी रंग कि ड्रेस पहन लो कहकर माँ चली जाती हैं । लेकिन प्रतीक का तो फेवरेट कलर व्हाइट है कितनी ही बार कह चुका है कि सफ़ेद मेरा सबसे प्रिय कलर है , ‘इस रंग को पहन कर तो तुम मुझसे कुछ भी करवा लो, आई जस्ट लव दिस कलर ‘ .
हाँ ! मै तो अपने प्रतीक की पसंद का रंग ही पहनूंगी सोचते हुए मैंने अलमारी से सफ़ेद चिकन के सूट को निकल कर पहन लिया । कान में भी सफ़ेद मोती की छोटी-छोटी लटकन और गले में चुनरी प्रिंट का दुपट्टा ले लिया । फिर याद आया ओह ! प्रतीक को तो बिंदी भी बहुत पसंद है सो झट से छोटी सी तिल समान काली बिंदी भी सजा ली माथे पर । ठीक शाम ६ बजे प्रतीक घर आ गया आंटी मै इसे ले जा रह हूँ, मेरी जिम्मेदारी है ठीक ८ बजे सही-सलामत आपके पास वापस छोड़ जाऊंगा आप चिंता मत करियेगा . और मै चल पड़ी प्रतीक के साथ । आज प्रतीक ने एक बार भी मेरी तारीफ नहीं की जबकि मैंने तो सब कुछ उसी की पसंद का पहना है फिर भी उसकी नज़र नहीं पड़ी , क्यूँ ? मन में सोच ही रही थी कि इन्डियन कैफे हॉउस आ गया. सारे दोस्त वहाँ पहले से ही मौजूद थे .सभी ने गले लगाया,बधाइयाँ दी और फिर प्रतीक ने मेरा मन पसंद गाना सुनाया । सब कुछ इतना सुखद कि जीवन में इस से पहले कभी कुछ इतना भी अच्छा नहीं लगा था । प्रतीक ने सबको बताया कि पार्टी जल्द ही ख़त्म करनी है क्यूँकि कल से ही प्रतिभा के गानों की पहले एलबम की रिकार्डिंग है इसलिए इसे जल्दी घर जाकर आराम करना होगा और सुबह जल्दी उठकर रियाज़ भी । पर क्या हम सभी इसे यूँ ही जाने देंगे ,कम से कम एक गाना तो इसकी आवाज़ में सुन ही लें पता नहीं कल ये हमे पहचाने भी या नहीं , आखिर बड़ी स्टार हो गई है । सभी दोस्तों ने प्रतीक के साथ शोर मचाना शुरू कर दिया । प्रतिभा…प्रतिभा…प्रतिभा..प्रतिभा ….
और फिर मैंने इस शर्त पर कि मै और प्रतीक एक साथ गायेंगे अपनी दोनों की पसंद का गाना चुना और जब हुमदोनो ने गाना गाया सभी मंत्रमुग्ध हो उठे थे । गीत के बोल थे ही इतने प्यारे ” हम तुम दोनों युगों -युगों से गीत मिलन के गाते रहे हैं, गाते रहेंगे ” सभी दोस्तों ने एक साथ ही कहा था “टच वुड” ! पार्टी यहीं समाप्त हो गई थी सभी अपने-अपने घर जाने की तयारी में थे की प्रतीक मेरे पास आया उसके हाँथ में जूस का ग्लास था उसे मेरी तरफ बढ़ाते हुए उसने प्यार से कहा कि लो जूस पी लो तुम्हे प्यास लगी होगी ,है ना ! लिम्का और कोक सब बहुत ठन्डे हैं यहाँ तक की पानी भी सादा नहीं है इस लिए मै तुम्हारे लिए तुम्हारा मन पसंद औरंज जूस लाया हूँ । प्रतीक का इतने स्नेह इतनी केयर देख मन भर आया था उसके हाँथ से ग्लास ले एक ही घूँट में सारा जूस पी गई मै । अब खुश ! मैंने प्रतीक से कहा और जवाब हाँ ! बहुत खुश । चलो अब मै तुम्हे घर छोड़ दूँ,वरना आंटी को फिकर हो जाएगी आखिर तुम्हे सही सलामत घर पंहुचाना मेरी ज़िम्मेदारी है । हमने सब दोस्तों को थैंक्स कहा और हम घर के लिए चल पड़े । रास्ते में ही मुझे गले में कुछ ख़राश सी लगी,मैंने मजाक में पूछा कि प्रतीक तुमने तो अच्छा जूस पिलाया मेरा तो गला ही छिल रहा है । सब ठीक हो जायेगा यार ,तुम सोचो मत ज़्यादा,कहकर वो गाड़ी चलाता रहा . लो घर आ गाया और अभी भी आठ बजने में पाँच मिनट बाकी है और मैंने तुम्हे सकुशल घर पँहुचा दिया । हाँ ! थैंक्स प्रतीक , कहते हुए मुझे लगा कि ये आवाज़ तो मेरी है ही नहीं और साथ ही गले में तेज़ दर्द हुआ कि अपना ही घूँट निगला न गया । अरे तेरी आवाज़ को क्या हुआ ? तुम्हारा तो गला ही बैठ रहा है शायद ! कहते हुए प्रतीक ने झट से अपने बैग से एक डिब्बी निकाली और उसमे से एक काले रंग की छोटी सी गोली मुझे मुँह में डालने के लिए दी । ये क्या है प्रतीक ? कुछ नहीं चुपचाप खा लो ,आयुर्वेदिक है मै यही खाता हूँ और देखो मेरा गला हमेशा ठीक रहता है तुम्हे भी आराम मिल जायेगा कहते हुए प्रतीक ने मेरे मुह में वो गोली डाल दी । गोली खाते ही कुछ ठंडा सा लगा,अच्छा लागा । थैंक्स प्रतीक ,तुम मेरा कितना ख़याल रखते हो । हे आई लव यू यार,अब मै तुम्हारा ख़याल नहीं रखूँगा तो और कौन रखेगा ? ये दवा तुम रख लो प्रतिभा कल सुबह तुम्हारी रिकार्डिंग है रात में यदि तुम्हे तकलीफ हो तो खा लेना सुबह तक गला बिलकुल ठीक हो जायेगा . चलो अब मै चलता हूँ,फिर मिलेंगे कहते हुए प्रतीक चला तो गया लेकिन कहीं, वहीँ मेरे अन्दर सदा के लिए रह गया । रात गहराई,गला भी गहराया ,गोलियां खाई पर नींद कब आई पता ही ना चला , सुबह माँ की आवाज़ कानो में पड़ी, ” उठ जा मेरी बच्ची आज तो तेरे जीवन की एक नई शुरुआत है ” कहते हुए मेरे बालों पर उनका ममता भरा हाँथ महसूस हुआ और मैंने आँखे खोल दी और जैसे ही कहना चाहा हाँ! माँ
मेरे होंठ तो चले पर मेरी आवाज़ गायब थी । बार-बार मेरा मुँह तो खुल रहा था पर आवाज़ …मौन ! माँ -पापा सब घबरा गए कि ये क्या हुआ ,कैसे, नहीं ऐसा नहीं हो सकता ..
गले में दर्द तो कुछ कम था रात से पर आवाज़ बिलकुल नहीं ! माँ ने प्रतीक को फ़ोन मिलाया पर फोन नहीं उठा । सब मुझे लेकर डॉ. के पास भागे. ना जाने कितनी जाँचें हुई और फिर आया वो सच जिस पर यकीं ही न हुआ । मेरे शरीर में एक तरह का ज़हर था और उससे सबसे ज़्यादा प्रभावित था मेरा गला । वो जूस जिसे मैंने पिया था,पिलाया था किसी ने प्यार से उसमे था वो ज़हर और वो रही सही कसार पूरी करी उन गोलियों ने ठीक वही ज़हर उन गोलियों में भी था । डॉ ने बताया कि इस तरह के ज़हर का असर बहुत धीरे-धीरे शरीर पर होता है किन्तु सबसे पहले इंसान का गला ही प्रभावित होता है क्यूँकि गले के ज़रिये ही ये शरीर में प्रवेश करता है । हफ्ता गुज़र गया मुझे अस्पताल में और प्रतीक, उसका तो कुछ पता ही नहीं कहीं । यकीन ही नहीं हो रहा था कि प्रतीक ऐसा कुछ कर सकता है । गानों की रिकार्डिंग ,फ़िल्म के गीत सब कैंसिल हो गए कुछ रह गया तो वो था मेरी भारी और दर्द से भर्राई आवाज़ ! डॉ. ने बताया की कुछ महीने लग जायेंगे वापस अपनी आवाज़ आने में क्यूँकि क्षति काफी हुई है । और उन महीनो में छुपी रही मै सबसे,खुद से और यदि कोई नाम छाया था हर तरफ अख़बारों में, टी.वी. चैनलों में तो वो था आज का उभरता सितारा ‘प्रतीक’ !
कुछ महीनो में आवाज़ तो आ गई पहले जैसी पर मन की आवाज़ तो बैठ चुकी थी सदा के लिए और जो आज तक मौन ही है । समय के साथ मेरी शादी कुनाल से हो गई फिर एक बरस में ही मान्यता हमरी खुशियाँ बनकर हमारी जिंदगी में आ गई पर फिर भी लौट ना पाई मेरी वो ‘आवाज़ ‘ ! मालूम ही नहीं किसी को की कभी थे वैसे ही सुन्दर पंख मेरे पास भी. नोच लिया मेरे पंखो को भी किसी बहरूपिये ने और दे दिया दर्द … कर दी ख़ामोश मेरी आवाज़ ।
पर हाँ ! आज इस कहानी से ये सुकून और हिम्मत ज़रूर मिली है की वो मासूम सुन्दर मोर टूटा नहीं है मेरी तरह । है हौसला उसमे अभी भी ,करेगा अपने नए पंख आने का इंतज़ार और फिर भरेगा अपनी उम्मीदों की उड़ान । सोचते हुए चाय का प्याला किचन में रखने पंहुचती हूँ और रात के खाने की सब्जी को बनाने में जुट जाती हूँ कि ना जाने कैसे निकल पड़ी मेरी आवाज़ – ” तुझसे नाराज़ नहीं जिंदगी हैरान हूँ मै ” आज बरसों बाद अपनी ही आवाज़ सुनी है मैंने । शायद मेरे भी नए पंख भरना चाहते हैं अब अपनी उड़ान …

” उड़ना है मुझे फिर ” हमारी कहानी पश्चिम बंगाल के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले दैनिक समाचार पत्र ‘ प्रभात वार्ता ‘ के रविवारीय अंक में प्रकाशित हुई है, आप सभी की अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा है .
सादर
इंदु

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सुधा और चंदर


सुबह का वक्त है ड्राइंग रूम में अकेले सोफे पर बैठे हुए आँखें बंद करीं कि न जाने कहाँ से सुधा और चंदर याद आ गए.चेहरे पे मुस्कान पर दिल में गहरी टीस उठी ये वो किरदार हैं जिनसे आप सभी परिचित हैं,हर घर में सुधा हर घर में चंदर है ,बस हर घर की कहानी अलग है.यूँ तो प्यार जन-जन्मान्तर का रिश्ता होता है पर बनने में ज़रा भी वक्त नहीं लगता और बनाना भी नहीं पड़ता स्वतः ही अपने हर रूप को धर लेता है प्यार.सुधा कश्मीर कि वादियों में जन्मी अपने घर कि सबसे बड़ी और सबसे छोटी भी, मतलब संजय श्रीवास्तव की इकलौती संतान .संजय जी पेशे से बैंक कर्मचारी हैं .सुधा की माँ यानि अरुणा जी घरेलु महिला हैं और पूर्णतयः पति और परिवार को समर्पित .शीला जी को घूमने का नई-नई जगहें देखने का बहुत शौक है किन्तु पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते ये शौक मन में ही रहे.सुधा है तो एक साधारण से नयन नक्श वाली लड़की लेकिन कश्मीर ने अपनी खूबसूरती की छाप उस पर बखूबी छोड़ी है.साँवला रंग,मोती से दांत,कमर तक लहराते काले घने बाल,छोटी मगर बोलती हुई आँखें ,हंसती है तो लगता है गौरैया ने अपनी गर्दन ऊपर उठा ली हो .सुधा ने बी. कोम किया है और अब अरुणा जी को बस उसके लिए उपयुक्त वर की तलाश है.सुधा को अभी तक प्यार नहीं हुआ जबकि वह २१ वर्ष की हो चुकी है पर अभी तक वह इस अहसास से कोसों दूर है.हाँ ! दूसरी लड़कियों की तरह आकर्षित होती है वह भी पर कोई अलग सा अहसास उसे न हुआ अब तलक.खैर ! प्यार कब उम्र देख कर होता है बस होना होता है जब कोई रोक न पाया आज तक..अब हम आपको यहीं छोड़ते हैं सुधा के साथ और आप ये न सोचें कि चंदर का परिचय कौन कराएगा क्यूंकि चंदर अपना परिचय स्वयं ही देगा.और आप अब सुने सुधा और चंदर कि सीधी बात ,हम यहीं से हटते है.क्यूंकि जो आनंद फिल्म देख कर महसूस किया जा सकता है वो उसकी कहानी सुनकर नहीं…सुधा बाज़ार में सहेलियों के संग खा रही है अपनी मनपसंद वनीला आइसक्रीम…

चंदर : आइसक्रीम वाले भईया ज़रा एक डिस्क चोकलेट कौर्नैटो देना .

सुधा : लोग कड़वी चीज़ें कैसे खाते हैं भला रश्मि !

चंदर : जीवन का रूप यही होता है सुंदरी.

सुधा : सुंदरी ! किसे कहा ,और हम अपनी सखी से बात कर रहे हैं..आप कौन ??

चंदर : मै ! मै चंदर … आपकी परछाई…

सुधा : क्या मतलब…

चंदर : आपकी खूबसूरती के समक्ष तो मै दिखूंगा नहीं कहीं सो इस तरह मै परछाई हुआ …सुंदरी….:)

सुधा : मेरा नाम सुधा है ! सुंदरी नहीं….

चंदर : हाँ पर मेरे लिए तो सुंदरी ही रहेगा …
( सुधा वहां से चली जाती है )

घर आकर भी चंदर के कहे शब्द न जाने क्यूँ बार-बार याद आ रहे हैं ऐसा लग रहा है की कोई कानो में कह रहा है सुंदरी ,सुंदरी …ये क्या हो रहा है मुझे ,भला क्यूँ इतना खिंचाव महसूस कर रही हूँ मै उस चंदर के लिए.. हाँ ! पर उसका मुझे सुंदरी बुलाना बुरा भी नहीं लगा बल्कि अच्छा-बहुत अच्छा लगा .शायद चंदर तो मुझे भूल गया होगा ,आखिर लड़का है बदमाशी में ही छेड़ रहा होगा और मै यहाँ उसके ख्यालों में गुम हूँ .शाम हो गई आज तो रश्मि के घर जाना है ओह ! मै तो भूल ही गई थी… माँ मै रश्मि के घर जा रही हूँ ,आज सब दोस्त मिल रहे हैं वहां और मै भूल ही गयी थी देर हो गई .
अरुणा जी : अँधेरा होने से पहले घर आ जाना सुधा, नहीं तो फिकर लगी रहती है और हाँ उसके घर पहुच कर फ़ोन कर देना…
सुधा : जी माँ .
सुधा : मन ही मन काश ! इक बार तुम दिख जाओ चंदर,देखो ये आँखे तुम्हे ही खोज रही हैं .नहीं दिखा कहीं चंदर और रश्मि का घर भी आ गया .

रश्मि : वाह ! सुधा रानी सबसे देर से आई है तू ,कहीं रास्ते में तेरा वो ..क्या नाम था ?? मिल तो नहीं गया था.
सुधा : कौन … चंदर ! उफ्फ्फ ये क्या बोल गई मै …छोड़ न अब आ गई हूँ चल बताओ तुम सब की क्या बाते चल रही हैं…
रश्मि के घर सबने खूब मजे किये और सभी अपनी-अपनी भविष्य की तैयारियों में कैसे जुटना है यही चर्चा खास रही …पर मुझे तो कोई नौकरी नहीं करनी ,माँ बस मेरी शादी ही चाहती है अब ,उनकी इकलौती संतान हूँ वो भी लड़की सो वो अपनी ज़िम्मेदारी शीघ्र से शीघ्र पूरी कर देना चाहते हैं .रात भर नींद ठीक से न आई न जाने कैसी बेचैनी सी थी .सुबह ये निश्चय किया की आज से सुबह की सैर शुरू की जाये और बस फिर क्या था पहुँच गए हम घर के पास ही के पार्क में और शामिल हो गए उसी भीड़ में जहाँ न जाने कितने अजनबी एक साथ सैर करते हैं कोई किसी को न जनता है न किसी से बात करता है फिर भी उनकी आँखे एक दुसरे के लिए अपरिचित नहीं ,उनकी हल्की मुस्कान रोज़ ही बातें करती है एक – दुसरे से. आज पहला दिन है सो थकान हो रही है ,आदत जो नहीं इतना तेज़ चलने की ,इस लिए एक बेंच पर बैठ जाती हूँ की थोड़ी देर सुस्ता लूँ फिर चलूँ … आहा कितनी साफ़ शुद्ध हवा है इस अहसास को सिर्फ महसूस ही किया जा सकता है .माँ तो हर रोज़ सैर करती हैं तभी वो मुझे भी रोज़ जल्दी उठकर सैर करने को कहती थी,अब समझ आ रहा है … सुंदरी ! आप यहाँ ….कहते हुए चंदर ठीक मेरे बगल में बैठ जाता है और मै हतप्रभ ! आप यहाँ क्या कर रही हैं ,और बताइए आपके घर में कौन-कौन है …. मेरी खुशनसीबी आज तो पूरा दिन ही अच्छा गुज़रेगा…
सुधा : हम आप से कोई बात नहीं करना चाहते …
चंदर : सॉरी ,मुझे लगा की शायद आप मुझसे बात करना चाहें ,खैर ! रहने दीजिये…हम चलते हैं…
सुधा : नहीं हमारा मतलब …हम एक दूसरे को जानते भी तो नहीं …इसलिए…
चंदर : क्या अभी भी आपको लगता है की हम एक दूसरे को नहीं जानते ,क्या हमारे दिल ने एक -दूसरे को नही पहचाना है ,सच बताना सुंदरी …मै यहाँ रोज़ इसी वक्त आता हूँ,कल मिलता हूँ कह कर चंदर चला जाता है..
सुधा : ये क्या हो रहा है मुझे ,न जाने क्यूँ चंदर पर गुस्सा नहीं आ रहा. इससे पहले भी तो न जाने कितने ही लड़कों ने अपने प्रेम का इज़हार किया है,मनुहार भी की पर कोई मुझे, मेरे अंतर्मन को छू भी न सका ,मेरे दिल में कभी कोई दस्तक न हुई फिर आज मै ,क्यूँ बार-बार मै चंदर को याद कर रही हूँ …क्या वो भी मुझे ? नहीं-नहीं ,उसने तो ऐसा कुछ नहीं कहा और सिर्फ दो मुलाकातों में प्यार तो नहीं हो सकता .शायद जानकार भी स्वयं को बहला रही हूँ मै .अगले दिन सुबह खुद को पार्क जाने से रोक न सकी मै और चंदर को भी वहीं मौजूद पाया .आज चंदर से बात करने को भी जी चाहा,मन में आया कह दूं सारे जज़्बात पर शर्म ,हिचक ने कुछ कहने न दिया. कुछ पल शांत बैठे रहने के बाद ख़ामोशी को तोड़ते हुए बातो ही बातो में चंदर ने मेरा दाहिना हाँथ पकड़ कर अपने हांथों में रख लिया और बोला तुम्हारा हाँथ कितना मुलायम हैं सुंदरी ! और देखो मेरे कितने रफ ,कहकर उसने धीरे से मेरे हाँथों को चूम लिया .झट से मैंने अपना हाँथ चंदर से छुटाया और दूसरी तरफ देखने लगी ,न जाने क्यूँ फिर भी चंदर की इस हिमाकत पर मुझे गुस्सा न आया.चंदर ने माफ़ी मांगी और अपना फ़ोन नंबर देते हुए बोला यदि माफ़ कर देना तो इस नंबर को तुम्हारी प्रतीक्षा रहेगी . अब समझा मैंने कि प्यार हो गया और उसके लिए मुलाकातों की गिनती ज़रूरी नहीं… अब हम दोनों रोज़ घंटो फ़ोन पर बातें करने लगे,हर पल बस खयालों में चंदर ही रहते .मै सुधा, जो अब तक किसी की न हुई थी चंदरमय हो गई .अपना नाम भी सुधाचंदर माथुर लिखने लगी .चंदर एक इंजीनियर था और उसके माँ-पापा बंगलौर में रहते थे वह अपनी नौकरी के कारण यहाँ अकेला पेइंग गेस्ट बनकर रहा था .आज न जाने चंदर को क्या हुआ अचानक ही कह बैठे – सुधा मै तुमसे शादी करना चाहता हूँ,प्यार इतना करता हूँ कि अपना भविष्य बस तुम्हारे साथ ही जीना चाहता हूँ …मेरी स्वप्न सुंदरी सुधे …

उसके मुख से ये अलफ़ाज़ सुन न जाने कहाँ की लज्जा मेरे मुख पर आ गिरी ,नज़रें गडी रह गई और मुख से बस इतना ही निकल सका जी चंदर मै भी…
चंदर ने मेरे चेहरे को ऊपर उठाया और प्यार से मेरी पलकों को चूम लिया ये कहते हुए कि जल्द ही हम एक होंगे सुंदरी
कुछ दिन पश्चात ही चंदर के माता-पिता हमारे घर आए और हमारा रिश्ता चंदर से जोड़ दिया ,पर लग गए थे हम दोनों को अब ,शादी कि तिथि भी करीब ही है ,सोच-सोच कर धडकेने बढ़ जाती हैं.आज अहसास हुआ कि प्यार में कितनी ताजगी होती है,प्यार कि सुगंध ने सुधा को डुबो दिया और अब से मै खुद का अस्तित्व भी चंदर में ही देखने लगी हूँ .मै जितनी चंचल हूँ चंदर उतने ही गंभीर फिर भी हमे एक दूसरे का साथ सर्वाधिक भाता है ,ईश्वर आप से बस यही प्रार्थना है कि कभी हमारा साथ न छूटे …. न जाने कितनी बार कहानी का किरदार रहे सुधा और चंदर जो कभी मिल न सके इस कहानी में उनका मिलन हो गया है ,आज ही उनकी शादी सभी के आशीर्वाद से संपन्न हुई है और तभी ये कहानी एक रूप ले पाई है .अब से सुधा और चंदर किसी कहानी के किरदार नहीं बल्कि स्वयं का प्रेम से परिपूर्ण जीवन बिताएंगे .इसी शुभकामना के साथ….

 

” सुधा और चंदर ” हमारी कहानी पश्चिम बंगाल के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले दैनिक समाचार पत्र ‘ प्रभात वार्ता ‘ के रविवारीय अंक में प्रकाशित हुई है, आप सभी की अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा है .
सादर
इंदु

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अब ये प्यार न होगा हमसे


शनिवार की सुबह साढ़े नौ बजे हैं और सुबह की पहली चाय का सुख हमें अब मिल रहा है।प्रत्येक शनिवार यही होता है कबीर के स्कूल की छुट्टी के कारण हम सुबह जल्दी नहीं उठ पाते हैं और जब उठते हैं तो सूरज के ऑफिस जाने की ऐसी भागमभाग रहती है कि किसी तरह उनका लंच पैक करके नाश्ता करवा पाती हूँ इसी वजह से सूरज के ऑफिस जाने के बाद ही प्रथम चाय का सुख मिलता है।घर अभी पूरी तरह फैला है चाय पीने के बाद ही समेटेंगे। कबीर आज का अखबार देना बेटा देखो कहाँ है मुझे मिल नहीं रहा। क्या मम्मा आप भूल गईं डैडी हमेशा ही पेपर बाथरूम में छोड़ देते हैं।
टिंग-टांग,टिंग-टांग…कबीर प्लीज़ देख लो कौन है मैं चाय तो शांति से पी लूं। हैलो आंटी,हैलो बेटा. ये तो मेरी दोस्त कविता की आवाज़ है। कमरे में आते ही कविता फ़फ़क-फ़फ़क कर रो पड़ी। कबीर भाग कर पानी ले आया और बिना कुछ पूछे ही वहाँ से अपने कमरे में चला गया। कविता पानी पी लो थोड़ा शांत हो जाओ फिर बताओ कि बात क्या है? और तब कविता ने बयाँ किया अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा सच…
सेवा या तो मैं स्वयं को खत्म कर लूंगी या फिर प्रतीक को बहुत हो चुका अब मैं और नहीं झेल सकती रोज़-रोज़ की चिकचिक। शादी के पूरे पंद्रह वर्ष बीत गये इसी तरह पर अब और नहीं अपना आत्म सम्मान खोकर मैं नहीं जीना चाहती क्या प्यार की यही परिभाषा है जब प्यार पत्नी रूप में मिले तो उसे किसी जंक लगे सामान की तरह समझा जाए।
मैनें प्रेम विवाह किया था मैं और प्रतीक एक साथ ही विश्व-विद्यालय में पढ़ते थे हालांकि प्रतीक मेरे सीनियर थे और पढ़ाई में अव्वल और मैं एक खूबसूरत सी अल्हड़ लड़की जिस पर हर कोई मर मिटता था मेरा बबली नेचर ही मेरी पहचान था और सब इसी की वजह से ही मुझे प्यार करते थे शायद यही वजह रही होगी कि प्रतीक का दिल मुझ पर आ गया और उन्होंने मुझसे अपने प्यार का इज़हार भी कर डाला। हालांकि यह मेरे लिए पहला प्रस्ताव नहीं था इससे पहले भी कई लड़को से मुझे ऐसे प्रस्ताव मिल चुके थे। प्रतीक मे कुछ तो था हालांकि वो सामान्य कद-काठी का सामान्य चेहरा ही था फिर भी न जाने कैसे उसने मेरे दिल को छू लिया और मैं उसके विराट प्रेम के समक्ष कब उसके अधीन होती चली गई मुझे खुद ही नहीं पता। घर में माँ-पापा को ये रिश्ता कुछ ठीक नहीं लगता था पर मैंने इसकी परवाह ही नहीं की प्रेम कब इन बंधनों को मानता है वो तो बस प्रेम ही जानता है…

घर से भाग कर हम दोनो ने शादी कर ली इससे पहले कि समाज हमारे रिश्ते को जातिवाद या अन्य प्रथाओं से तौले हम एक हो गए हालांकि ये शादी सिर्फ दोस्तों की शुभकामनाओं से हुई पर बाद में हमने माँ-पापा सबको मना लिया। इतनी मुश्किलों से जुड़े इस रिश्ते से आज मुझे सिर्फ घुटन होती है क्योंकि वो प्यार जिसके लिए मैने सारी सीमाएँ लाँघी वो प्यार था भी आज तो मुझे इस पर भी शक है। प्रतीक को पाकर मैंने सब कुछ भुला दिया लेकन प्रतीक तो मुझे कभी मिला ही नहीं। शादी की पहली  रात जब दो अजनबी मिलते हैं तो उनके बीच एक रिश्ते की शुरुआत होती है जिसमें प्यार,विश्वास,समर्पण,तयाग न जाने क्या-क्या बेशुमार भरा होता है और जब दो प्यार कने वाले शादी की पहली रात मिलते हैं तो मेरे लिए उसका व्याख्यान बिलकुल अलग है-सारी कल्पनाओं से अलग। शादी के बाद एक दोस्त के घर पर हमारी पहली रात थी क्योंकि हम दोनो के ही परिवार इस शादी से नाराज़ थे उन्हें ये रिश्ता स्वीकार न था। मिलन की प्रथम रात्रि सोच कर ही मन मे अजब सी हलचल हो रही थी। एक सामान्य सा कमरा आज हमें किसी जन्नत समान लग रहा था। प्रतीक मुझे प्यार से उस कमरे में छोड़ कर चले गये कि तुम आराम करो मै बस अभी आया और मैं अपनी भावनाओं को समेटे प्रतीक के असीम प्यार के मीठे सपने बुनने लगी। काफी रात हो गई प्रतीक का कुछ पता नहीं कहाँ है? कब आएगा..मैं रोने लगी और मेरे आँसू पोछने के लिए वहाँ कोई न था रात गुज़र गई इंतजार करते,कब आँख लग गई कुछ ख़बर नहीं हाँ सुबह जब आँख खुली तब प्रतीक मेरे सामने था सॉरी कविता रात में दोस्तों के साथ टीवी पर मैच देखने में समय का पता ही न चला और जब मैं कमरे में आया तुम सो चुकी थी। खैर चलो अब हमारे लिये चाय बना दो सुबह की चाय तो तुम पिलाओगी न…..
सेवा क्या प्यार ऐसा होता है जिसे आप इतनी शिद्दत से चाहो जब वो मिल जाए तो आपको उसकी भावनाओं का ज़रा भी ख़याल न आए मेरे सारे सपने दिन ब दिन इसी तरह धराशायी होते चले गये शादी के बाद के एक दो साल की जो यादे आपके जीवन में खुशियाँ भर देती हैं वो मेरे पास सिर्फ एक दर्द के रूप मे हैं प्रतीक अपने दस्तों में ऐसे मस्त रहते कि मैं भी वहाँ हूँ इसका उन्हें अहसास भी न था। शादी के बाद मेरी पढ़ाई भी छूट गई प्रतीक ने मुझे मेरा एम.ए. भी नहीं पूरा करने दिया। दो साल बाद मुझे माँ बनने का सुख ज़रूर दिया लेकिन मुझे एक फर्नीचर मात्र बना दिया। मैंने बेटी रितु को जन्म दिया तब प्रतीक को पिता बनने की खुशी अवश्य हुई मेरे लिए तो यही बहुत था कि कम से कम वो रितु से बहुत प्यार करते हैं और मैं यही देख कर संतुष्ट हो जाती। लेकिन हमारे बीच तो दूरियाँ बढ़ती ही गई मेरे अंदर की दबी कड़वाहट भी अब बाहर आने लगी थी। प्रतीक मुझे हर बात पर नीचा दिखाते कभी कहते तुम मरे लायक ही नहीं हो,मैने नौकरी करनी चाही तो वो भी नहीं करने दी । प्रतीक से मैंने निश्छल प्यार किया लेकिन प्रतीक ने कभी मुझसे प्यार किया भी था आज मेरे पास इन सवालों के कोई जवाब नहीं। ऐसा लगता है कि जवानी के जोश में किसी शर्त के तहत उन्होंने मुझे अपने प्रेम जाल में फाँसा व छला है। मैं मात्र एक सामान नहीं हूँ जिसे जब चाहा जैसे इस्तेमाल किया और फिर उसकी तरफ देखा भी नहीं,अब मेरे सब्र की सीमा पार हो चुकी है इन्ही हालातों की वजह से मजबूरन मैंने नौकरी कर ली है और आज मैं अपने इस निर्णय से बहुत खुश हूँ क्योंकि आज मैं आत्म निर्भर हूँ और इसी वजह से इतना बड़ा कदम उठाने का साहस कर पा रही हूँ कि हम साथ नहीं रह सकते। साथ रहने की वजह सिर्फ रितु है लेकिन हमारे झगड़ो से उसका विकास भी प्रभावित हो रहा है आज सुबह तो प्रतीक ने रितु के सामने ही मेरे चरित्र को भी तार-तार कर दिया,तुम्ही बताओ उस छोटी सी बच्ची से मैं कैसे नज़रें मिलाऊँ। हर दिन अपने आत्म सम्मान की अर्थी उठाती जाऊँ! नहीं सेवा, मैंने फैसला कर लिया है मैं अपना एक अलग आशियाँ बनाऊँगी जहाँ अपनी बेटी के साथ रहूँगी और प्रतीक को पुनः ये अवसर कभी नहीं दूंगी कि वो मेरी बेइज्ज़ती कर सके यह मेरा द्रढ़ निश्चय है।

प्यार सिर्फ़ प्यार होता है,प्यार एक खूबसूरत अहसास है कोई अभिशाप नहीं इसलिए ऐसा नहीं कि प्यार नहीं करना चाहिए परन्तु ये अवश्य जान लेना चाहिए कि उस प्यार की सच्चाई क्या है जीवन के कठिन उतार-चढ़ावों मे आपका प्यार आपकी ताकत बनेगा या कि आपको खोखला ही कर देगा…

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