Category Archives: गज़ल

चाँद टूटा और बिखरा …


चाँद टूटा और बिखरा किसने ये जाना यहाँ
हाँ बिखरती चाँदनी को सबने पहचाना यहाँ .

सूरज के उगते ही जहाँ में फैल गई रौशनी
तम को अस्तित्वहीन फिर सबने माना यहाँ .

दिल की ज़मीं नम है बहुत रोपने को बीज
लहलहाते लबों से ही मौसम सुहाना यहाँ .

वो समंदर क्या करे जो चाहे साहिल को बहुत
लहरों को सुनाता है वो दिल का फ़साना यहाँ.

हर राग है अलग यहाँ धुन  भी अलग हुई
सुनेगा कौन इंदु अब  किसका  तराना यहाँ .

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धर्म पर लिखूँ तो…


धर्म पर लिखूँ तो हालात बिगड़ जाते हैं ,
देश पर लिखूँ तो धर्म झगड़ जाते हैं ।

प्रेम पर लिखूँ तो बस प्रेम ही प्रेम है ,
छल पर लिखूँ तो ये तार उधड़ जाते हैं ।

समंदर पर लिखूँ तो बेहिसाब खज़ाने हैं ,
साहिल पर लिखूँ तो खज़ाने बिछड़ जाते हैं ।

मौसम पर लिखूँ तो किस मौसम पर लिखूँ ,
जिन पर न लिखूँ वो मौसम अकड़ जाते हैं ।

लिखने को तो चाहे कितना भी झूठ लिख दूँ ,
मग़र इंदु की कलम है,सब झूठ पकड़ जाते हैं ।

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चाहतों की बारिशों …


चाहतों की बारिशों ने भिगाया है बदन
खुशबू-ए-इश्क से लहराया है  बदन .

ख्व़ाब फूलों की मानिंद खिलने लगे
यूँ लगा ज़िंदगी ने महकाया है बदन .

इक बोसा लबों का बहका गया जिस्म
गर्मी- ए – इश्क ने पिघलाया है  बदन .

आइने में दिख रहा है अक्स बस तेरा
सिमट कर खुदी में शरमाया है बदन .

तन्हा सी कट रही थी शाम-ए-ज़िंदगी
रौशनी-ए-प्यार ने सजाया है  बदन .

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बात आँखों से आँखों को करने दो…


इश्क़ की तपिश को इनमें भरने दो,
बात आँखों से आँखों को करने दो।।
क्या दिल में छिपी है पता तो चले,
ज़रा गहरे में तो दिल के उतरने दो।।
खोये तुझमे हैं ऐसे न जहाँ की ख़बर,
टूटकर आज बाज़ुओं में बिखरने दो।।
जब ख़ुदा ने ही बख्शी भँवर इश्क़ की,
डूबकर ही फ़िर आज इसमें तरने दो।।
हर दर्द की इश्क़ जब दवा बन गया,
सारे ज़ख्मों की इसे पीर हरने दो।।
जान ले तू भी ‘इंदु’ इश्क़ है इक इबादत,
ख़ुदा की इस नियामत को सँवरने दो।।

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मंजिलें हैं अभी और भी…


बदलता है दौर भी
बदलता है ठौर भी।

बदलते ज़माने में
बदलते हैं तौर भी।

मिज़ाज पर मौसम के
रक्खो ज़रा गौर भी।

जद्दोजेहद ज़िंदगी की
बदलती है कौर भी।

थकना नहीं रुकना नहीं
मंजिलें हैं अभी और भी।

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ज़िंदगी का तो मकसद फैलाना रिफ़ाह है।


माना हर आँख में यहाँ अश्क़-ए-तिम्साह है,
शिआर-ए-मुसव्विर उकेरना खालिस निगाह है।
कूँची में भरे रंग बस कहते हैं यही सबसे,
ज़िंदगी का तो मकसद फैलाना रिफ़ाह है।
सब बह चले उधर हैं जिस तरफ़ है हुकूमत,
ये बदलते ज़माने की बदलती रियाह है।
हथियार भी उठाना जब लाज़िम नहीं था,
हर लफ्ज़ हम पे बरसा तब बनके रिमाह है।
वतन की खातिर इंदु जो शहीद हो गए हैं,
माँ के कलेजे में बसा उनका जिबाह है।
~इंदु~

तिम्साह – मगरमच्छ
मुसव्विर – चित्रकार
शिआर – आदत
रिफ़ाह – भलाइयाँ
रियाह – हवाएँ
रिमाह – शक्तियाँ , बरछे
जिबाह – माथा ,ललाट

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चाँद …


इतरा कर चाँद का यूँ  मौन पुकारा है
सब आशिक हमारे हैं कौन तुम्हारा है।
हर नूर हम से बरसे कि नूर ही हैं हम
चिलमन से न छुपे ऐसा रूप हमारा है।
चाँदनी हमी से रौशन है इस जहाँ में
शफ्फाफ़ बदन भी हमी को पुकारा है।
चाँद हूँ ख्वाब हूँ धड़कता हूँ दिलों में
आशिकों की आशिकी का यही सहारा है।
शायरों की शायरी मंझधार में ही तैरती
कलम को भी मिला मुझसे ही किनारा है।

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