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नज़्म


चाहत यही
कि गुज़रे एक शाम
तुम्हारे साथ
करूँ महसूस
ज़मीं से ऊपर उड़ रहे कदमों को
हवा से लहराता हुआ बदन
कानों में गूँजता मल्हार.
चाहत ये भी कि
ठण्ड से सख्त हुए गालों पर
गर्म सेंक तुम्हारे हाथों  की
और झुकी बंद पलकों पर
अनगिनत बोसे लबों के .
चाहत ज़रा सी
शामें अनगिनत
ढल जाएगी ज़िंदगी
ऐसी ही शाम में
कि चाहत फिर भी
रहेगी ज़िन्दा
गुज़रे एक शाम तुम्हारे साथ ……!

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काश !!!


सोचा था समेट लूँगी वो पल
जो गुज़र रहा था
वो पल ही नहीं उसकी धड़कन भी
और सिर्फ धड़कन ही नहीं
धड़कनों की हर हरकत को
सोचा था समेट लूँगी…
स्वछंद हँसी-आवारा कदम
बस वहीँ पड़ रहे थे
जहाँ वो पड़ना चाह रहे थे
इतनी आवाज़ थी हमारे
मौन के दरमियाँ कि
दूजी कोई आवाज़ थी ही नही वहाँ
वो लम्हा था
कुछ पलों में गुज़र रहा था
और हम उन पलों को
लम्हा-लम्हा जी रहे थे
पल कब रुका है ?
काश ! कि रुक जाता वो पल
काश ! कि थम जाते वो लम्हे
काश ! काश ! काश !

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