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ये कैसा समय है !


ये कैसा समय है
कि सब अपने में खोए हैं
और अपने नज़रंदाज़ हो रहे
ये कैसा समय है
जब कि सब बिक रहा
और सब
बेचा भी जा रहा ….
ये ऐसा भी समय है जब आदर्श
खोखले हैं, ज्ञात है
फिर भी
इस समय में जीना है
जहाँ जिंदा हैं मरे हुए अकड़े हुए लोग
एक नव निर्माण हो रहा दुनिया का
मरे हुए मरने से डर रहे
और जीवित
जिंदा बचे रहने से !!!

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नहीं होना चाहती !


नहीं होना चाहती
मैं पौधा छुईमुई का
कि कोई भी बंद कर दे
मुझे मेरे वजूद में
हो जाना चाहती हूँ
कैक्टस की तरह
छुअन का ख़याल भी
न कर सके कोई
जब तक रहूँ
जो हूँ रहूँ
कि सख्त चुभते
कैक्टस पर भी
खिलते हैं कोमल फूल
हो जाना चाहती हूँ दुनिया की तरह सख्त
बन जाना चाहती हूँ
एक अदद कैक्ट्स !

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साथ रहेंगे हम !!!


सफ़र करते हुए
खिड़की से बाहर
चमकती रेल की
पटरियों को देखकर
तुम याद आए
और नम हो उठीं आँखें .
हम दोनो
रेल की पटरियाँ
ही तो हैं
चल रहे हैं साथ
फिर भी
पूरी दुनिया के
किसी भी
छोर के अंत में
मिलेंगे नहीं हम .
कि बिन एक पटरी के
अस्तित्वहीन है दूसरी
गुज़र रही है ज़िंदगी की रेल
और समान दूरी पर
एक साथ
चल रहे हैं हम .
मालूम है कभी मिल न सकेंगे
फिर भी
अनवरत साथ रहेंगे हम !

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फ़िक्र नहीं मुझे…


तेरे वजूद को समेट लिया है खुद में
मेरा वजूद तू हुआ अब फ़िक्र नहीं मुझे
तेरे हर शब्द हर भाव को जी लिया है
दुनिया करे जो बातें अब फ़िक्र नहीं मुझे
मेरी यादों में पलते हैं तेरे होश सारे
जहाँ कहे मुझे बेहोश अब फ़िक्र नहीं मुझे
इक हूक भरी आवाज़ उठती है तुझमे भी
तू रहे  इससे बेखबर अब फ़िक्र नहीं मुझे
तेरे ज़हन से ना हटेंगे कर लो चाहे कुछ भी
लाख करो इंकार इकरार की फ़िक्र नहीं मुझे
कभी तो कहोगे बेसब्र होकर तुम भी
इस जनम या उस जनम  अब फ़िक्र नहीं मुझे…

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मेरे ख़्वाब !


लो बना लिया ख़्वाबों को
पत्थर का मैंने
दुनिया सिर्फ एक शीशा
नज़र आती है अब
जैसे कि झेल ही न सकेगी
मेरे एक छोटे से ख्वाब को भी
यदि उछाल दूँ उसकी तरफ
बिखर जायेगी
कई – कई हिस्सों में.
शीशे में सब दिख रहा है
अपने पत्थर रुपी ख़्वाब भी
और ज़िंदगी की सारी चालाकियाँ भी
ज़िंदगी घबराई हुई है कि कहीं
उस पर न आ गिरे कोई ख्वाब
और ख्वाब
मुस्कुरा रहें हैं क्योंकि
नहीं लग रहा उन्हें कोई डर.
मालूम है उन्हें
न तोड़ सकेगा कोई
न मिटा सकेगा कोई
अमर रहेंगे वे सृष्टि के साथ सदा
ख़त्म होगी ज़िंदगी
पर कभी न ख़त्म होंगे मेरे ख़्वाब !

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सच है ! दुनिया बड़ी रंगीली


सच है ! दुनिया तेरे रंग अजीब
सफ़ेद था जो
काला हो गया
और काला,
फिर बगुले सा सफ़ेद
रंग पे रंग बदलते जाते-
चढ़ते जाते, लेकिन
कभी कोई हल्का न पड़ता
काला वापस सफ़ेद कैसे ?
इतने बदलते रंगों में
भला किसे अपनाया जाए
हर रंग का है अलग रंग,
भरमाता हुआ –
बूझो तो जाने ???
सच है ! दुनिया बड़ी रंगीली …

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