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ए एन 32


तुम्हारा कुछ पता नहीं
कहाँ हो ? कैसे जानें
ज़िंदगी की नई शुरुआत
तुम्हीं से थी
पिछले सत्रह वर्षों से
एक दिन भी न गुज़रा
तुम्हारे बगैर
लगातार सालों साल
हम साथ गए समंदर पार
और देश के सभी कोनों से लेकर
विदेश यात्रा तक
कभी डर न लगा
लेकिन आज
जब तुम्हारी कोई ख़बर नहीं मिल रही
डर रहा हूँ
किसी अनहोनी से
तुम लौट आओ सकुशल
कि देश को ज़रुरत है तुम्हारी
कई परिवार
राह तक रहे
उनकी रौशनी भी
तुम्हारे साथ है
मुझे, नींद नहीं आती आजकल
कि बिन तुम्हारे
फ़ैल गया है सन्नाटा
एक सैनिक की ज़िंदगी में ।

 

 

 

 

 

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1 टिप्पणी

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धर्म पर लिखूँ तो…


धर्म पर लिखूँ तो हालात बिगड़ जाते हैं ,
देश पर लिखूँ तो धर्म झगड़ जाते हैं ।

प्रेम पर लिखूँ तो बस प्रेम ही प्रेम है ,
छल पर लिखूँ तो ये तार उधड़ जाते हैं ।

समंदर पर लिखूँ तो बेहिसाब खज़ाने हैं ,
साहिल पर लिखूँ तो खज़ाने बिछड़ जाते हैं ।

मौसम पर लिखूँ तो किस मौसम पर लिखूँ ,
जिन पर न लिखूँ वो मौसम अकड़ जाते हैं ।

लिखने को तो चाहे कितना भी झूठ लिख दूँ ,
मग़र इंदु की कलम है,सब झूठ पकड़ जाते हैं ।

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सब गलत-हम सही


सब गलत बस हम सही
यही ज़िद ही मुँह की खाती है ।

क्यूँ भला किसी और को माने
सोच दूसरे की,सराही नहीं जाती है ।

कब बदलेगा देश, बदलेंगे लोग कब
न बदलेंगे हम कभी,रीत चलती जाती है।

इंतज़ार सबके बदलने का,है दिनों-रात
बदलाव के स्वागत की रुत नहीं आती है ।

बातें हैं बड़ी-बड़ी, है लिखा भी बहुत
इंसान बने रहने में ही,मेहनत बड़ी आती है ।

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