गुरुजनों को सादर नमन !


आज गुरु पूर्णिमा है . आज के दिन मै सभी गुरुजनों को सादर स्मरण , नमन और कृतज्ञ भाव से वंदन करती हूँ . जीवन में एक गुरु से काम नहीं चलता बल्कि जीवन पर्यंत गुरु चाहिए होते हैं जो हमे सही दिशा , सही मार्ग दिखाते हैं .
गुरु वो नहीं जो शिष्यों का अंबार लगाए बल्कि अच्छा गुरु शिष्य नहीं बनाता, वो तो शिष्य को गुरु बना देता है अपना सर्वस्व निछावर कर देता है . शिष्य को गुरु की तलाश नहीं करनी होती बल्कि गुरु स्वयं अपना शिष्य खोज लेता है , द्रोणाचार्य स्वयं हस्तिनापुर गए थे , भगवान् राम को भी विश्वामित्र ने चुना था .
गुरु अपना सर्वस्व दे देता है बस शिष्य के अंदर श्रद्धा और पात्रता होनी चाहिए इसका सबसे बड़ा उदाहरण एकलव्य है जिन्होंने द्रोणाचार्य से सारी शिक्षा, श्रद्धा भाव से ही प्राप्त की थी .
अंत में आज गुरु पूर्णिमा के दिन सभी गुरुजनों को सादर नमन और वंदन !

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चाँद टूटा और बिखरा …


चाँद टूटा और बिखरा किसने ये जाना यहाँ
हाँ बिखरती चाँदनी को सबने पहचाना यहाँ .

सूरज के उगते ही जहाँ में फैल गई रौशनी
तम को अस्तित्वहीन फिर सबने माना यहाँ .

दिल की ज़मीं नम है बहुत रोपने को बीज
लहलहाते लबों से ही मौसम सुहाना यहाँ .

वो समंदर क्या करे जो चाहे साहिल को बहुत
लहरों को सुनाता है वो दिल का फ़साना यहाँ.

हर राग है अलग यहाँ धुन  भी अलग हुई
सुनेगा कौन इंदु अब  किसका  तराना यहाँ .

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उदास मन …


उदास मन
उदास शामें
नापसंद हैं तो क्या
जो लिखी आपके हिस्से
वो मिलेंगी ज़रूर 
जब भी गुज़रे
ऐसी शाम करीब से
न छूना
बस देखना ध्यान से
लिपटे हुए जीवन को 
कुछ कसा कुछ दबा 
बेचैन सा होगा व्याकुल
आने को बाहर
ज़रूरत
बस इतनी कि
फैला दो विस्तार मन का
मुस्कुरा दो 
एक मुस्कान कर देगी उसे
सारे बंधनों से मुक्त
उदास शाम उसी पल
मुस्कुराता जीवन बन जाएगी .

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माँ !!!


माँ तुम्हारी नम आँखें
बहा देती हैं
पूरा जहाँ मेरा
तुम्हारी इक मुस्कान
उड़ने को दे देती है
मुझे पूरा जहाँ
तुम्हारे चेहरे की शिकन
और  मंथन
घनघोर अँधेरे में भी 
चीर देती  है मुझे
नज़र आता है फिर
उसी में
जीवन दर्पण
खोजती हूँ खुद को
तेरी साँसों में
जानती हूँ जबकि
तेरी रूह हूँ मैं
माँ… तुम हो तो हूँ मै ….
तुम हो तो ही मै …!!!

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फ़लक पे चाँद


फ़लक पे लटका चाँद
चिढ़ाता नहीं
बल्कि लटका है वो
कई – कई फंदों में
झूल रहा है
पूर्णिमा से अमावास
इसलिए नहीं
कि उसे पसंद है
बल्कि हवा का दबाव
ही बहुत कम है
इतना कम
कि लटकते फंदों में भी
नहीं निकल रहा
उसका दम
जबकि चाहता है
वो मुक्ति
इस घुटन से
कि फ़लक पे लटकता
चाँद गुज़रता है
हर नज़र से …

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सुर्ख औरत !


गर्म तंदूर या सुर्ख अंगारों पर
बनाए जाते हैं
स्वादिष्ट टिक्के
औरत की खूबसूरती का
राज़ भी यही
सेंकती है खुद को हर दिन
तपती है जलती है
और हो जाती है सुर्ख
अपनी तपिश में खुद को पकाकर
करती है पेश
समाज को
एक सभ्य सम्पूर्ण औरत
कि सभी को पसंद आती है
ख़ामोश…. सुर्ख….. दमकती औरत !

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अनोखा


जैसा कि नाम कुछ अलग है ‘ अनोखा ‘ वैसी वो अलग बिलकुल भी नहीं थी बस न जाने क्यूँ उसका नाम अनोखा था . करीब पाँच फुट लम्बी, साँवला रंग ,छोटी निर्जीव आँखें ,भूरे सूखे बाल , ऊपर के चारो दांत कुछ आगे को निकले हुए, उसके पास से आती पसीने की असहनीय गंध और शरीर में लिपटे हुए पुराने कहीं-कहीं से फटे हुए कपड़े ये थी अनोखा की रूपरेखा . एक बेहद गरीब नाई हरी प्रसाद की बेटी थी वो और इकलौती नहीं बल्कि चार छोटी बहने और पाँचवा एक भाई भी था जिसकी माँ की भूमिका अनोखा ही निभा रही थी. अनोखा की माँ रामरती लोगों के घर चौका-बासन और लिपाई-पुताई करके किसी तरह अपने बच्चों के लिए रोटी जुटा पाती थी . एक लड़के की चाह में पाँच बेटियाँ जनी थीं उसने . दबाव किसी का नहीं था उसे खुद ही बेटा चाहिए था अपने बुढ़ापे को सँवारने के लिए . खुद की उम्र अभी तीस पार न थी पर देखने में किसी पिछली सदी सी दिखती थी रामरती . रंग इतना काला कि उसके दाँत चूने जैसे सफ़ेद चमकते थे , शरीर सिर्फ हड्डियों का ढांचा मात्र बचा था कई बार खेतों की फसल बचाने के लिए खड़े किये गए बिजुका भी उससे भले दिखते थे .अनोखा के पिता हरी प्रसाद को मिर्गी के दौरे पड़ते थे आए दिन यही सुनने में आता कि आज यहाँ तो कल वहाँ हरी प्रसाद गिरा पड़ा है और मुंह से झाग फेंक रहा है . यही बीमारी उसकी सबसे बड़ी दुश्मन थी पूरे गाँव में कोई भी उससे अपने बाल या दाढ़ी ( हजामत ) नहीं बनवाता था कि कहीं उसकी साँसों से ये बीमारी उन्हें भी न लग जाए. पास के गाँव में सप्ताह में दो दिन सब्जी और मवेशी का बाज़ार लगता था अतः हरी प्रसाद वहीँ जाकर किसी पेड़ की छाँव तले अपनी पिटारी खोल उस्तरे को चमकाता हुआ बैठ जाता और कोई दो-चार लोग जो उसे नहीं पहचानते थे अपने बाल कटवा लेते थे या हजामत बनवा लेते थे बस यही उसकी कमाई थी .खेती बाड़ी न के बराबर थी एक बिसुआ उसरहा खेत उसे मिला था अपने भाइयों से बँटवारे के बाद जिसमे मुश्किल से धान की फसल हो पाती थी और थोड़े बहुत गेंहूं भी मिल जाते थे . बीमारी के चलते दूसरे लोग उसे अपनी खेती भी बटाई पर नहीं देते थे उसके पास अपने बैल या हल भी नहीं था जुताई आदि के लिए. बामुश्किल वो अपने भाइयों से बैल और हल ले पाता था अपने खेत की जुताई के लिए इसके बदले वो उनके खेतों में फसल की कटाई – ढूआई करा देता था . इतनी सब कठिनाइयों के बीच जो दो-चार रूपए कमाता भी तो रोज तो नहीं पर हाँ महीने में एकाध बार देसी दारु में डुबो देता था उसका कमज़ोर शरीर झेल भी न पाता और वो पड़ा रहता कभी किसी मेड़ पर ,कभी किसी तालाब के किनारे बेसुध . गाँव का कोई न कोई बच्चा या बड़ा ये ख़बर उसके घर पंहुचाता की हरी प्रसाद यहाँ या वहाँ पड़ा है दारु पीकर तब रामरती और अनोखा एक साथ आते और उसे घसीटते हुई दोनों घर तक ले जाती .रामरती के मुँह से गालियाँ बरसतीं , अपनी किस्मत को कोसती और सारा गुस्सा अपनी बेटियों पर निकालती ,उन्हें पीट डालती लेकिन इस सब का हरी प्रसाद पर कोई असर न होता और अनोखा बचपन से ही आदी थी इस सबकी इसलिए कभी कुछ नहीं कहती बस अपने पिता को घर तक ले जाने में चुपचाप रामरती की मदद करती थी . रामरती रोते हुए बेटे अनूप को कलेजे से लगा के चिल्ला – चिल्ला के कहती कि बस मेरा बेटा बड़ा हो जाए तो मुझे इस नरक की दुनिया से मुक्ति मिले न जाने इन पाँच-पाँच बोझ की गठरियों से कब पीछा छूटेगा , मुझे मार कर ही मरेंगी ये सब ! और उस पर ये दारु बाज खसम न मरता है न मरने देता है . घर में अनाज की कमी इतनी कि न जाने कितनी रातें रामरती ने सिर्फ पानी पर गुज़ारीं थीं . दिन में तो फिर भी जिस घर में काम करती कोई न कोई उसे बासी रोटी -आचार या खराब हो रहा खाना खिला ही देता हाजमा इतना मज़बूत हो चुका था उसका कि सब कुछ हजम हो जाता . अनोखा अब चौदह वर्ष की हो चुकी थी और उसका शरीर अब उन फटे कपड़ों से छुप नहीं रहा था रामरती के लिए सबसे बड़ी मुसीबत यही हो रही थी की सब गाँव वालों की नज़रों से कैसे बचाए अपनी बेटी के विकसित हो रहे शरीर को . रामरती ने अपनी समस्या जिन घरों में काम करती थी उनकी मालकिनो से बताई तो कुछ भली औरतों ने अपनी पुरानी फटी ब्रा रामरती को दे दी कि इसे सिल कर वो अनोखा को पहनाये और अनोखिया से बोल कि दुपट्टे से ढँक कर रखा करे ठीक से अपना शरीर ज़्यादा बाहर आने – जाने की ज़रुरत नहीं है घर पर ही रहे और घर सम्हाले बाहर कमाने के लिए तो तुम हो ही . पुरानी साडी को फाड़ कर रामरती ने अनोखा के लिए दुपट्टा भी बना दिया और फटी ब्रा की मरम्मत करके अनोखा को पहना दी इस हिदायत के साथ अब तू बड़ी हो रही कायदे से रहा कर पर भला कब तक और कहाँ तक ढँक पाती ये पुरानी अंगिया और पुरानी ओढ़नी अनोखा के नित नए विकसित हो रहे शरीर को. आखिर उसे भी तो अच्छा लगता था अपने शारीर का बदलता हुआ यह रूप क्यों कि अब जब भी वो घर में रहती तो चचेरे भाई भी उसे बड़े ध्यान से निहारते और जब भी बाहर जाती गाँव के चाचा-ताऊ सब उसे अपने पास बुलाते, उसके हाल पूछते और बिना किसी काम के ही दो – चार रुपए भी पकड़ा देते कि रख लो कुछ अपनी पसंद का ले लेना . आज तो जैसे ही बिसात खाने वाले की आवाज़ सुनकर अनोखा घर से बाहर भागी और उसके पास बैठ के सामान देख रही थी कि तभी गाँव के रज्जन काका वहाँ आ गए और उन्होंने बिसात खाने वाले से उसे पूरे ९ रूपये के कान के बुँदे और ३ रुपए की नाखूनी दिलवाई साथ ही बड़े प्यार से बोले अनोखा कल यह बुँदे पहन कर इसी वक़्त मेरे ट्यूबवेल पर आना जरा मैं भी तो देखूं कि कैसी दिखती है तू इन बूंदों में . अनोखा ने पहली बार कान में बुँदे पहने थे आठ बरस की थी जब उसने शौक में कान छिदवाए थे लेकिन आज तक सिवाए नीम की सूखी डंडी के कोई जेवर उसे न मिला था . हरा नग था उन बुन्दो का और उसमे तीन छोटे – छोटे घुंघरुओं की लटकन भी थी उन्हें पहन कर अपने छोटे- छोटे घिसे हुए नाखूनों में नाखूनी लगा कर अनोखा इतरा रही थी और सोच रही थी कि माँ बस यूँ ही परेशान रहती है और सब को कोसती है जबकि सब लोग कितने अच्छे हैं गाँव में ख़ास कर रज्जन काका .
शाम को घर आते ही रामरती की नज़र जैसे ही अनोखा पर पड़ी वह दंग रह गई और जोर से उसके बाल खींचते हुए बोली कलमुही कहाँ से लाई ये सब और नाखूनी लगाकर क्यूँ बैठी है ? अनोखा घबरा कर – डर कर रोने लगी . माँ को पता चलेगा तो मार ही डालेगी सोचकर उसने झूठ बोला कि रज्जन काका की बेटी बेबी जिज्जी ने दिए हैं हमें वो कह रही थीं कि हमारी शादी हो गई है और अब हम सोने के गहने पहनते हैं इनका कोई काम नहीं है इन्हें अब तू रख ले और ये नाखूनी भी उन्होंने ही दी ये सुनकर रामरती कुछ शांत हुई और बोली ठीक है लेकिन आइंदा कभी कोई तुझे कुछ सामान दे तो मुझे बताना और ये नखूनी-अखूनी शादी के बाद लगाना अभी कायदे से रह ! चल अब रात के लिए रोटी सेंक भूख लगी है आज रामसरन कक्कू के यहाँ से माठा मिला है उसी से सब खा लेंगे और हाँ देख ये थोडा गुड़ है इसे अनूप के मट्ठे में डाल देना कहकर रामरती चली जाती है घर के बाहर बैठकर पंचायत कर रही अपनी जिठानियों और देवरानियों के पास और शामिल हो जाती है गाँव के सभी ठाकुरों की ठकुरई के बारे में बात करने और दबीं जुबान से उन्हें गरियाने के लिए तभी मौका देखते ही उसकी जिठानी हमेशा की तरह उसे छेड़ती है – अरे रामरती अनोखा सयानी हो गई है कोई लड़का देख भी रही है या नहीं ? मेरी मान जल्द उसकी शादी कर दे कहीं कुछ ऊँच-नीच हो गई तो क्या करेगी. तू कहे तो अपने बड़े भाई से बात चलाऊँ कोई दान-दहेज़ भी नहीं देना पड़ेगा बस मेरे भईया को एक लड़का दे दे और फिर क्या, राज करे पूरा जीवन. तीन बेटियां है बस चौथे बच्चे के समय भौजाई ख़तम हो गई तब से उनका घर सूना है खाने पीने की भी कोई कमी न है मेरे भईया के पास वैसे भी तू कहाँ से कर पायेगी अनोखिया की शादी .रामरती वहाँ से बिना कुछ बोले हुए चली आती है और मन ही मन सोचती है कि सही तो कह रही है उसकी जिठानी आखिर कैसे होगी अनोखा की शादी . खाने के बाद खाट पर लेटी हुई रामरती इंतज़ार करती है नींद का रात चढ़ आई लेकिन नींद उसकी आँखों से कोसों दूर है दिमाग में वही सवाल कि कैसे जीवन कटेगा लडकियाँ बड़ी हो रही हैं और यहाँ तो खाने तक के लाले हैं ऐसे में शादी ? तभी हरी प्रसाद आता है और एक झटके में उसके ऊपर टूट पड़ता है ये कहते हुए कि मट्ठा खट्टा था बहुत मेरी भूख अभी बाकी है. निष्प्राण,निर्जीव रामरती से अपनी वासना की भूख शांत कर हरीप्रसाद सो जाता है , और रामरती, उसकी भूख ? उसे भूख है ही नहीं . ज़िंदगी ने इतना भर दिया है उसे कि वो भूख को ही भूल चुकी है. कई बार तो उसे खुद के जीवित होने पर भी शक हो उठता है रात बीत जाती है और सुबह होते ही रामरती चल पड़ती है उन घरों की ओर जहाँ वो चौका-बासन करती है ,सुबह की चाय उसे वहीँ नसीब हो जाती है हालांकि दूध नहीं होता उस चाय में बची हुई उबली हुई पत्तियों में ही पानी डाल कर उबाल कर दे दिया जाता है उसे पीने को पर शक्कर खूब होती है क्यूंकि मालकिन अक्सर ही कहती हैं कि इन काम वालों को मीठा बहुत पसंद होता है इनकी चाय में शक्कर खूब होनी चाहिए बस . सही तो कहती हैं मालकिन, हमारे जीवन की मिठास इसी चाय की ही तरह तो है न पत्ती, न दूध,बस दिखावे की चाय जिसका बस रंग गाढ़ा है हमारे गाढ़े जीवन की तरह .
उधर घर में अनोखा जल्दी-जल्दी सारे काम निपटाती है अपने छोटे भाई अनूप को नहला-धुला कर ,उसकी आँखों में मोटा सा कानो तक फैला हुआ काजल लगाकर उसे अपनी छोटी बहनों के हवाले कर खुद नहा कर तैयार हो जाती है. अनोखा को ब्रा पहनना पसंद नहीं रोज ही रामरती की डाँट से पहन लेती है पर आज वो ब्रा पहनना नहीं भूलती . आज उसे अपने बदन पर ये कसाव अच्छा लग रहा था कानो में हरे बुँदे खूब जँच रहे थे . अब रज्जन काका से मिलने कैसे जाए बस यही सोचते हुए वो हाँथों में लोटा उठा कर चल देती है ताकि कोई सवाल न करे कि वो कहाँ जा रही है क्योंकि उसकी चाची और ताई सब अपनी मोटी नज़र उस पर रखते हैं कि कब वो कोई गलती करे और वो रामरती को नीचा दिखा सके . ट्यूबवेळ पर रज्जन पहले से ही मौजूद था अनोखा को देखते ही उसकी धमनियों का प्रवाह तेज़ हो गया लेकिन खुद को नियंत्रित करते हुए सामान्य स्वर में बोला अरे आओ अनोखा मै तेरी ही राह देख रहा था. अनोखा ये कहते हुए कि काका आपने कहा था न कि बुँदे पहन कर दिखाना चुप – चाप जमीन की ओर निहारने लगती है . हाँ ! रज्जन बोला, थोड़ा पास तो आ ,मेरे पास आ कर बैठ कहते हुए रज्जन अनोखा को अपने पास खींच लेता है. अनोखा डर जाती है लेकिन कहती कुछ नहीं, हिम्मत ही नहीं उसमे बस नीचे ज़मीन को ही निहारती रहती है. रज्जन चुप्पी तोड़ता है ,कितनी अच्छी लग रही है तू ,किसी फिलम कि हीरोइन माफक . अनोखा शरमा जाती है और दुपट्टे से मुंह ढँक लेती है .रज्जन कि नज़र सीधे अनोखा के कसे हुए शरीर पर जाती है . देख अनोखा मै तेरे लिए और भी बुँदे, माले और नया सूट भी ला दूँगा या तू अपनी पसंद का ले लेना मै तुझे पैसे दे दूँगा अब शरमाना छोड़ और खुश रह बस ! अनोखा कहती है काका आज तक मैंने कभी नया कपड़ा नहीं पहना ,घर में कुछ नई साड़ियाँ हैं माँ के बक्से में लेकिन उन्हें माँ भी नहीं पहनती, कहती है कि मेरे ब्याह में मुझे देगी पता नहीं सच कहती है या झूठ क्यूंकि प्यार तो वो सिर्फ अनूप को ही करती है आप कितने अच्छे हो रज्जन काका कहते हुए वो थोड़ा सहज हो जाती है . देख मै तेरे लिए क्या लाया हूँ कहते हुए रज्जन अपने कुरते की जेब से अख़बार कि एक पुड़िया निकालता है और उसकी ओर बढ़ा देता है जिसमे चिपकी होती हैं तीन-चार जलेबियाँ .अनोखा खुश होकर कहती है जलेबी ! रज्जन कहता है हाँ तेरे लिए ही लाया हूँ और अनोखा झट से अखबार लेकर जलेबियाँ खाने लगती है . रज्जन ध्यान से अनोखा के होठों को निहारता है और एकदम से उसका मुँह पकड़ कर अपने मुँह में भर लेता है . काका आप क्या कर रहे हैं कहते हुए अनोखा खुद को छुड़ाती है . कुछ नहीं तूने जलेबियाँ खाई तो मैंने सोचा मै भी मुँह मीठा कर लूं रज्जन कहता है . तू डर क्यूँ रही है अनोखा देख तुझे कुछ भी नहीं हुआ , मुझे अच्छा लगा क्या तुझे अच्छा नहीं लगा कहकर रज्जन अनोखा की कमर में हाँथ डालकर उसके पेट को दबाता है . मुझे डर लग रहा है काका यदि माँ को पता चला तो मुझे मार ही डालेगी कहते हुए अनोखा अपनी ओढ़नी को फैला लेती है . रज्जन कहता है मै तुझे प्यार करने लगा हूँ अनोखा और मैं तेरा पूरा ख्याल रखूँगा किसी को भी कुछ नहीं पता चलेगा तुझे किसी से भी डरने की कोई ज़रुरत नही है , मै हूँ ना . तू रामरती को भी मत बताना कहते हुए रज्जन खुद को अनोखा के शरीर से पूरी तरह सटा देता है . अनोखा उम्र के जिस मोड़ पर है उसे ये सब किसी सपने और सतरंगी दुनिया के सामान लगता है . रज्जन धीरे-धीरे अनोखा के शरीर को सहलाता है वो डरती है और साथ ही शरमाती भी है लेकिन मना नहीं करती आखिर अभी-अभी जलेबियाँ खाई थीं उसने और फिर नया सूट भी तो मिलगा तभी किसी की आवाज़ आती है रज्जन …ओ रज्जन ! रज्जन चौकन्ना होता है अनोखा को एक झटके से अलग कर झट से खड़ा होता है, कल फिर आना कहते हुए उसे कोठरी के पीछे के दरवाजे से निकल जाने को कहता है और खुद को सँभालते हुए कोठरी के बाहर आता है वहाँ गाँव के प्रधान होते हैं . अरे प्रधान साहब आप यहाँ, बताइए कैसे आना हुआ . अनोखा चली जाती है और आज पहली बार वो अपने शरीर में कुछ पिघलन महसूस करती है. जल्दी से घर पहुँच कर बुँदे उतार देती है और घर के कामो में जुट जाती है लेकिन आज उसे अपना शरीर हवा की तरह उड़ता हुआ सा लगता है. माँ कभी भी जलेबी नहीं लाई हाँ एक बार किसी ने दो जलेबियाँ दी थीं उसे वो भी माँ ने अनूप को खिला दी थीं, उसकी बची ज़रा सी चाशनी ही मुझे चाटने को मिली थी और आज पूरी चार जलेबियाँ खाईं मैंने कितना अच्छा लगा था अनोखा सोचती है . इसी तरह पूरा दिन बीत जाता है और रात आते ही अनोखा सुबह की प्रतीक्षा में बेचैन हो रही है कि कल भी उसके लिए कुछ तो ज़रूर ही लायेंगे रज्जन काका .आज रात खुद से ही शरमा रही है और खुद को ही सहला भी रही है . ये सब उसे अच्छा लग रहा है पर क्यूँ ,क्या ये तो उसे खुद भी नहीं पता लेकिन ये सच है कि इतना खुश इससे पहले वो कभी नही हुई . हरी नाई रोज ही निकल जाता कि शायद आज कोई उससे बाल बनवा ले और रामरती घरों के चौका-बासन करने चली जाती उनके जाते ही अनोखा भी फटाफट सारे काम निपटा कर निकल जाती किसी न किसी बहाने से अपने रज्जन काका से मिलने . रज्जन काका की उम्र करीब ४८ की होगी और उनकी बेटी, बेबी जो कि १९ की है इसी साल उसकी शादी हुई है . अनोखा अभी चौदह की पूरी हो पंद्रहवीं की दहलीज में कदम रख रही है. रज्जन रोज ही अनोखा के लिए मिठाई लाता,कभी कोई अँगूठी तो कभी नगद रूपए भी देता . आज तो उसने अनोखा को पचास रूपए दिए ये कहकर कि अपने लिए एक नई ब्रा खरीद ले जिसमे लाल रंग की लेस लगी हो अनोखा रोज एक ही उधड़ी सी कुछ मटमैले रंग की ब्रा पहने रहती है यह जानने के लिए रज्जन को कभी उसकी कमीज़ नहीं उतारनी पड़ी क्यूंकि अनोखा के घिसे पारदर्शी कुरते के ऊपर से दुपट्टा हटाते ही रज्जन की ललचाई नज़रें सीधा वहीँ ठहरती हैं . ये रज्जन का रोज का काम था वो अनोखा की ओढ़नी दूर रखवा देता कि मुझसे क्या शर्म मै तो तेरा ही हूँ और जी भर निहारता उसके अधखुले,अधढंके कसे शरीर को. अगले ही दिन पैसे को सलवार के नारे में खोंस कर अनोखा बाज़ार से खरीद लाती है अपने जीवन का पहला नया कपड़ा वो भी अंतरंग और मचल पड़ती है सोचकर ही कि कल वो नया कपड़ा पहनेगी . पर माँ ! सोचते ही डर जाती है कि माँ को पता चलेगा तो मार ही डालेगी . मारे डर के नई ब्रा को भी खोंस लेती है सलवार के नारे के ही बीच में ताकि किसी कि नज़र न ही पड़े . खुश थी क्यूंकि पूरे दस रूपए भी बच गए थे जिसकी उसने आइसक्रीम खा ली थी . सब कितना अच्छा लग रहा है वो सोचती है कि बड़े होने के कितने फायदे हैं. माँ तो घर में रोटी और नमक ही देती है या कभी-कभी मठ्ठा या चटनी बस ! रज्जन काका उसे रोज ही उसकी पसंद की चीज़े खिलाते हैं और माँ कहती है किसी से बात न करो ,खुद नहीं करती बात किसी से तभी कोई माँ को कुछ नहीं देता . मै खुश हूँ और मुझे माँ जैसा नहीं बनना . अगले दिन नई ब्रा पहन कर ऐसे इतराती है खुद पर जैसे कोई सोने का हार पहन लिया हो. घर के छोटे से मटमैले शीशे में खुद को निहारती है मटक-मटक कर और जा पँहुचती है अपनी खुशियों के भगवान् रज्जन काका के पास .अनोखा को देखते ही रज्जन ताड़ जाता है फिर भी सवाल करता है कुछ लिया या नहीं ? अनोखा नज़रें नीचे कर शरमा जाती है और रज्जन उसकी ओढ़नी हटा देता है धीरे से उसे बांहों में जकड़ लेता है उसके कानो में बोलता है ऐसे दिख नहीं रहा ज़रा ठीक से दिखा देखूं तो सही कहते हुए अनोखा का कुर्ता उतारने लगता है अनोखा डर जाती है पर मना नहीं कर पाती आखिर रज्जन काका ने ही तो दिलवाई है रज्जन हटा देता है उसके शरीर से कुर्ता और धीरे-धीरे उसके करीब जाकर जकड़ लेता है उसे और कर देता है अनोखा का कौमार्य भंग ! अनोखा तेज़ दर्द से कराह उठती है ,उठ भी नहीं पाती . नीचे खून देख कर डर कर रोने लगती है ,रज्जन उसे समझाता है मै हूँ तेरे साथ और पहली बार में होता है ऐसा, तू थोड़ी देर आराम कर फिर उठना सब ठीक हो जायेगा. अनोखा धीरे-धीरे सुस्त कदमो से खुद को संभालती हुई घर आ जाती है . आज उसे कुछ अच्छा नहीं लगा,बहुत थक गई है वो घर आकर भी कोई काम नहीं करती बस लेटी रहती है पूरा दिन.शाम को रामरती से डांट भी खाती है पर उठती नहीं,पेट दर्द का बहाना बना कर लेटी रहती है अगले दिन सुबह उसे ठीक लगता है ,लेकिन कुछ मीठा खाने की चाह नही रही अब और न ही रज्जन काका से मिलने की . दो-तीन दिन वो घर से नहीं निकली तो रज्जन खुद दोपहर उसके घर आकर उसकी तबियत पूछता है और साथ ही कल आना कुछ ज़रूरी बात करनी है कहकर चला जाता है. रज्जन के इस तरह से आने और उसका का हाल पूछने से अनोखा को अच्छा लगता है और वो खुद को ठीक महसूस करती है अगले दिन फिर वो रज्जन से मिलने जाती है रज्जन उसे पकड़ कर सब जगह चूमने लग जाता है ये कहते हुए कि अनोखा अब मैं तेरे बिन नहीं रह पाऊंगा तू क्यों नहीं आई तीन दिनों से क्या मै तुझे पसंद नहीं और जवाब की प्रतीक्षा किये बिना कुरते की जेब से पाजेब निकल कर खुद ही उसे पहनाने लगता है. अनोखा कुछ बोल नहीं पाती बस एक बार फिर रज्जन के साथ खुद को रज्जन का कर देती है ,इस बार उसे भी अच्छा लगता है . पर ज्यादा अच्छा क्या लगा रज्जन का साथ या अपने पैरों में चाँदी की पायल ये न समझ पाई वो खुद भी. धीरे-धीरे ये मुलाकातें बढ़ती गईं और फिर एक रोज़ रामरती की नज़र पड़ी कि अनोखा का शरीर पहले से अधिक गठा और स्वस्थ नज़र आ रहा है इस फर्क को वो समझ पाती कि अनोखा की उबकाइयों ने सब बता दिया . रामरती अनोखा को बुरी तरह पीटती है और उसके कुछ न बताने पर उसकी तलाशी लेती है तलाशी लेने पर उसे पायल मिलती है जो अनोखा ने छप्पर के अन्दर छुपा रखी थी जब रामरती जोर से उसका गला दबाती है तब जाकर वो रज्जन का नाम लेती है. रामरती वही आँगन में लड़खड़ा जाती है ये कहते हुए कि कहाँ से लाए ज़हर की पुड़िया जो खिला सके अनोखा को और खुद को भी. हरीप्रसाद को कोसते हुए, अनोखा को गालियाँ बकते हुए वो सीधे रज्जन के घर जाती है . रज्जन घर में नहीं था और उसकी दुल्हिन से कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं हुई आखिर उनके घर ही काम करती है रामरती और यदि काम से निकाल दिया तो ? कहाँ से पेट भरेगी सबका उधर अनोखा भाग कर खेत में रज्जन के पास जाकर सब बताती है कि माँ कह रही है तू पेट से है और मुझे बहुत मारा तो मैंने आपका नाम बता दिया .रज्जन कोई बात नहीं अनोखा तू चिंता मत कर और अपनी माँ को बोल कल तुझे लेकर दूसरे गाँव के अस्पताल में मिले ,जो भी खर्चा होगा मै दूंगा बस एक बात का ध्यान रहे ये बात किसी और को पता नहीं चलनी चाहिए .अगले दिन रामरती अनोखा को लेकर अस्पताल पहुँचती है रज्जन उसे पैसे और साथ ही धमकी देकर कि ये बात कहीं और नहीं निकलनी चाहिए वहाँ से चला जाता है . पंद्रह वर्ष की अनोखा का उसकी जान के रिस्क पर कराया जाता है गर्भपात! इस उम्र में गर्भ में नया जन्म और फिर उसकी हत्या अनोखा को ज्यादा कुछ फर्क नहीं पड़ता सिवा इसके की माँ बहुत गुस्सा है जबकि रामरती नहीं समझ पाती कि वो जिन्दा है या मर गई . गाँव में भला कब ऐसी बातें छुपती हैं आग की तरह ये बात भी फ़ैल गई और अब तो हर जवान-बूढ़ा पुरुष अनोखा से मिलना चाहता सिवाय रज्जन काका के . अनोखा को रामरती ने घर में बंद कर दिया था और वो कहीं आ जा न सके ये जिम्मेदारी उसकी छोटी चारों बहनों की थी .पूरे गाँव में हर घर में हर एक की जुबान पर बस एक ही बात थी कि फूटी किस्मत है रामरती की पति मिर्गी वाला मिला और लड़की ने तो नाक ही कटा दी,हमारी होती तो ज़हर खिला कर मार डालते ऐसी कुल्टा लड़की को अरे रज्जन का क्या दोष आदमी है इसी से न संभाली गई होगी अपनी जवानी पूरे गाँव के मुँह पर कालिख पोत दी इसने . इस गंदगी को जल्दी से जल्दी गाँव से फेंक देना चाहिए,हर कोई समझाता रामरती को. रामरती की जुबान चिपक चुकी थी और आँखे रेगिस्तान से भी अधिक सूखी हो चली थीं कोई राह नज़र नहीं आ रही थी उसे कई ठाकुरों ने तो यहाँ तक समझाया कि अनोखा को मेरे पास भेज दिया कर तेरे दिन भी बहुर जायेंगे आखिर और भी तो चार बेटियाँ हैं तेरे . रामरती बस यही सोचती कि पैदा होते ही गला क्यूँ न घोंट दिया मैंने इन लड़कियों का ,लड़कियां होती ही हैं भार कहते हुए बस अनूप को गले से चिपका लेती है.शाम का वक्त है रामरती की जिठानी आती है और बेहद दया भाव से कहती है जो होना था हो गया तू कहे तो अब भी बात बन सकती है मै अपने भईया को कुछ नहीं बताउंगी अनोखा की शादी जल्दी से उनके साथ करवा सकती हूँ तेरे सर से मुसीबत भी हट जाएगी और मेरे भाई का घर भी बस जायेगा . लेकिन जिज्जी तुम्हारे भईया की उम्र तो चालीस पार है और अनोखा अभी पंद्रह की भी पूरी नहीं हुई रामरती कहती है. ये सुनते ही जिठानी गरम तवे सी छन्ना के बोली हाँ !और रज्जन तो बस अभी सोलह बरस का ही है न ! जब अड़तालीस साल के आदमी के साथ सोना आता है तुम्हारी बेटी को तो हमारे भईया तो अभी चालीस के ही हैं.सही कहते हैं भला करने चलो और अपना ही हाँथ जलाओ जिठानी जोर से कहती है . रामरती कुछ सोच नहीं पाती कि क्या करे ,किससे मदद ले,कैसे अनोखा की शादी कर जल्द से जल्द उसे गाँव से अपने जीवन से निकल फेंके इसी उधेड़बुन में बैठी है कि तभी अनूप रोते हुए आता है , कहता है मम्मी मेरे पापा मर गए ! चलो देखो चल कर सब कह रहे हैं वो मर गए.
‘अच्छा हो की मर गया हो तेरा बाप कम से कम कहीं से तो मुक्ति मिले ’ कहते हुए रामरती भागती है गाँव के बड़े तालाब की ओर वहीँ किनारे हरिप्रसाद पड़ा है भीड़ लगी हुई है कोई कह रहा है कि इसे मिर्गी आई है, कोई कह रहा है कि दारु पी है इसने .सब दूर खड़े हैं कोई उसके पास नहीं जाता . रामरती उसे छूती है ,ठंडा है उसका पूरा शरीर और दारू की तेज़ दुर्गन्ध आ रही है , मुंह से लेकर कान के अन्दर तक झाग फैला है, मृत्यु एक साथ सारे ही ऐबों को ले जाती है. एक जोर की चीख गूँज जाती है पूरे गाँव में “अनूप के पापा ” ! रामरती वहीँ हांथों को पटक कर चूड़ियाँ तोड़ देती है और कहती है अच्छा हुआ मर गए, मुक्ति तो मिली . चूड़ियों के टूटने से हांथों से खून बहने लगता है और उन्ही खून भरे हांथों से मिटा देती है अपना सिन्दूर . हरी प्रसाद का क्रिया कर्म जैसे-तैसे उसके भाई कर देते हैं .रामरती कई दिनों तक घर से नहीं निकलती एक सन्नाटा पसरा है उसके चारों ओर . शाम का वक्त है अनोखा आती है और सन्नाटे को तोड़ती हुई कहती है माँ घर में कुछ भी खाने को नहीं है . सब तो खा गई , अब मै ही बची हूँ, आ मुझे भी खा ले कहते हुए रामरती अपनी चुप्पी तोड़ती है तभी अनूप रोते हुए आता है माँ, मुझे भूख लगी है. रामरती उसे चुप कराती है और घर में तलाशती है कि कुछ खाने को मिल जाये लेकिन घर में सिवाय ख़ाली बर्तनों के कुछ भी नहीं मिलता . रामरती भाग कर ठाकुर के घर जाकर रोती है और वहाँ से अनूप के लिए खाना लाती है, ठकुराइन उसे खाना तो दे देती हैं लेकिन साथ ही कल से काम पर आने कि हिदायत भी कि यदि काम नहीं करेगी तो उसके बच्चों के लिए खाना कौन देगा इस तरह जितना शोक करना था कर लिया,वैसे भी क्या करता था तेरा पति, अब तू आगे की सोच और कल से काम पर आना शुरू कर. रामरती घर जाकर अपने कलेजे के टुकड़े को खाना खिलाती है और लड़कियों को खुद परोस के खाने के लिए कह देती है अगले दिन से ही रामरती घरों में काम के लिए जाने लगती है अभी एक महीना भी नहीं बीता कि फिर से जमींदार उसे नए-नए बहानों से परेशान करने लगे कि वो अनोखा को उनके पास भेज दे. रामरती बेहद डर चुकी थी अतः सीधा अपनी जिठानी से अनोखा की शादी कि बात करती है कि क्या वो अब भी अपने भाई के साथ अनोखा की शादी कर सक सकती है .जिठानी अपनी ख़ुशी को दबाते हुए कहती है अब इतना अहसान तो करना ही पड़ेगा तुझ पर पहले ही मान जाती तो इतनी बेईज्ज़ती तो नहीं उठानी पड़ती अब देखती हूँ मै भैया से बात कर के. एक महीने के अन्दर साधारण ढंग से अनोखा कि शादी हो जाती है. बारात में दूल्हा और उसकी तीन बेटियाँ थी. दूल्हा अनोखा को देख किसी बांके छोरे की तरह लालायित था जबकि अनोखा इतनी शांत कि तालाब का शांत पानी भी उसके समक्ष कोलाहल करता नज़र आये .बेटियाँ उसे मम्मी-मम्मी पुकार रही थीं .बड़ी लड़की की उम्र तो १० या ११ की ही होगी . अनोखा की शादी संपन्न हो गई और विदाई में उसे मिली थीं तीन बेटियाँ . वैसे भी अपने घर में अपनी चार बहनों और भाई अनूप की माँ तो वही थी बस फर्क ये था कि उसी उम्र के उसके भाई-बहन उसे दीदी बुला रहे थे जबकि वो बेटियाँ उसे मम्मी बुला रही थीं . अनोखा की विदाई में सभी आँखें शून्य थीं सिवाय अनूप के वो सबसे छोटा था और अनोखा खुद से ज्यादा अनूप का ख्याल रखती थी इसलिए अनूप को दीदी का जाना बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा था विदाई में रामरती अनोखा को गले लगाते हुए कहती है अब मेरी जिम्मेदारी ख़तम अब वही तेरा घर है जी या मर बस यहाँ मत आना . ससुराल में अनोखा का स्वागत करने के लिए भी कोई न था सिवाय अनोखा की विधवा सास के और वो थी भी तो दूसरी पत्नी, इसलिए सास को भी कोई उत्साह नहीं था कि वो अनोखा का स्वागत धूम धाम से करे . पूरा दिन गुज़र गया शाम होते ही तीनो लड़कियों को दादी के पास भेज कर अनोखा का पति कांतिलाल कमरे में आता है और बिना किसी वार्तालाप के वसूल लेता है अपने पति होने का अधिकार .शादी के दूसरे ही महीने अनोखा गर्भवती हो जाती है सास और पति दोनों को लड़का ही चाहिए इस लिए तीन महीने पूरे होते ही वो उसकी जांच करवाते हैं. गर्भ में लड़की है पता चलते ही अनोखा का गर्भपात करा दिया जाता है. पंद्रह की उम्र और दो-दो बार गर्भपात, अनोखा पीली पड़ जाती है ,उसका शरीर निष्प्राण सा दीखता है. अभी कच्ची उम्र है अनोखा की कहते हुए डॉक्टर कांतिलाल को कुछ वक्त अनोखा से संबंध न रखने की सलाह देता है लेकिन कांटी लाल को इंतज़ार नहीं है और कुछ ही महीनो में फिर से अनोखा की कोख हरी हो जाती है, कर दी जाती है. तीन महीने पूरे होते ही एक बार फिर से जाँच,लेकिन इस बार लड़का है कि खबर से सास और पति उसे भर पेट खाना भी खिलाते हैं और उसका ख्याल भी रखते हैं. अनोखा का कमज़ोर शरीर टूट चुका है अब तक वो सिर्फ लेटी रहती है उससे ठीक से चला भी नहीं जाता. कम उम्र कमज़ोर शरीर का नतीजा आठवें महीने में ही उसे प्रसव का दर्द उठ जाता है और बच्चा जनने में ही निकल जाती है अनोखा की जान ! बड़ी मुश्किल से बच्चा बचता है क्यूंकि डॉक्टर से बच्चा बचाने के लिए ही कहा गया था माँ तो नई भी आ जाएगी लेकिन लड़का इतनी मुश्किल से तो घर का चिराग मिला है इसलिए बच्चा हर हाल में बचना चाहिए . कांतिलाल और उसकी माँ खुश है कि लड़का हुआ है उनके वंश का वंशज मिल गया है, पालने के लिए माँ तो मिल ही जायेगी . अनोखा बिलकुल शांत हो चुकी है क्योंकि उसे जीवन से मुक्ति मिली है हालाँकि क्या यही जीवन था क्या यही होना चाहिए था…. क्या यही मुक्ति है ….अनोखा में कुछ खास या अलग भले ही न रहा हो किन्तु उसका जीवन उसके नाम की तरह अनोखा ही गुज़रा ….!

हमारी यह कहानी  ‘ लमही ‘ के अप्रैल – जून  अंक में प्रकाशित हुई है !

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