नहीं होना चाहती !


नहीं होना चाहती
मैं पौधा छुईमुई का
कि कोई भी बंद कर दे
मुझे मेरे वजूद में
हो जाना चाहती हूँ
कैक्टस की तरह
छुअन का ख़याल भी
न कर सके कोई
जब तक रहूँ
जो हूँ रहूँ
कि सख्त चुभते
कैक्टस पर भी
खिलते हैं कोमल फूल
हो जाना चाहती हूँ दुनिया की तरह सख्त
बन जाना चाहती हूँ
एक अदद कैक्ट्स !

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सच है …!


सच लिखना मुश्किल नहीं
सच पढ़ना बेहद कठिन
सच कहना भी मुश्किल नहीं
पर सच सुनना
उससे भी कठिन !
बस इसी खातिर
लिखा जाता रहा झूठ
कहा जाता रहा झूठ
अपनी सहूलियतों के लिए
ज़िंदगी के दुर्गम रास्तों पर
आसानी से चलता रहा झूठ
सच है कि सब झूठ है और
झूठ है कि सब सच !
सिवा इसके कि शब्दों के
वर्ण हैं सच
शब्दों के मायने ….बचे अब शेष नहीं ….!!!

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चुप्पी ….!


एक हद तक
अच्छी लगती है
फिर नापसंद
फिर सालती है और
फिर भी न टूटी तो
आपको तोड़ती है
एहतियातन
खुद को टूटने से
बचाने के लिए
इसे तोड़ देना चाहिए !

————————–
चुप्पी
बड़े काम की चीज़ है
जब चाहे साध लो
माहौल का
रुख ही बदल दो
खुशनुमा को ग़मगीन
तो कभी
बदतर हालात को
और बदतर कर दो
सामजिक दायित्वों से
भागने का
सबसे आसान तरीका
ये चादर ओढ़ लो !!!

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कैक्टस के फूल


मैंने तुम्हे चाहा
और तुमने
मुझे चुभन दी
मैंने सोचा
तुम काँटों में घिरे हो
तुम्हे नर्म अहसास दूँ
तुमने मेरे जज़्बात को
काँटों से भेद दिया
मुझे तकलीफ हुई
तुम मुस्कुराए
तब समझ आया कि
इतने काँटे
तुमने क्यों हैं लगाए
खुद तो नर्म बिस्तर पर
कटे तुम्हारी ज़िंदगी
सहानुभूति बटोरने को
हैं इतने दाँव बिछाए
जो भी करीब आए
उसे चुभ – चुभ जाए
कैक्टस के फूल
मैंने तुम्हे चाहा ….!!!

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साथ रहेंगे हम !!!


सफ़र करते हुए
खिड़की से बाहर
चमकती रेल की
पटरियों को देखकर
तुम याद आए
और नम हो उठीं आँखें .
हम दोनो
रेल की पटरियाँ
ही तो हैं
चल रहे हैं साथ
फिर भी
पूरी दुनिया के
किसी भी
छोर के अंत में
मिलेंगे नहीं हम .
कि बिन एक पटरी के
अस्तित्वहीन है दूसरी
गुज़र रही है ज़िंदगी की रेल
और समान दूरी पर
एक साथ
चल रहे हैं हम .
मालूम है कभी मिल न सकेंगे
फिर भी
अनवरत साथ रहेंगे हम !

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गुरुजनों को सादर नमन !


आज गुरु पूर्णिमा है . आज के दिन मै सभी गुरुजनों को सादर स्मरण , नमन और कृतज्ञ भाव से वंदन करती हूँ . जीवन में एक गुरु से काम नहीं चलता बल्कि जीवन पर्यंत गुरु चाहिए होते हैं जो हमे सही दिशा , सही मार्ग दिखाते हैं .
गुरु वो नहीं जो शिष्यों का अंबार लगाए बल्कि अच्छा गुरु शिष्य नहीं बनाता, वो तो शिष्य को गुरु बना देता है अपना सर्वस्व निछावर कर देता है . शिष्य को गुरु की तलाश नहीं करनी होती बल्कि गुरु स्वयं अपना शिष्य खोज लेता है , द्रोणाचार्य स्वयं हस्तिनापुर गए थे , भगवान् राम को भी विश्वामित्र ने चुना था .
गुरु अपना सर्वस्व दे देता है बस शिष्य के अंदर श्रद्धा और पात्रता होनी चाहिए इसका सबसे बड़ा उदाहरण एकलव्य है जिन्होंने द्रोणाचार्य से सारी शिक्षा, श्रद्धा भाव से ही प्राप्त की थी .
अंत में आज गुरु पूर्णिमा के दिन सभी गुरुजनों को सादर नमन और वंदन !

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चाँद टूटा और बिखरा …


चाँद टूटा और बिखरा किसने ये जाना यहाँ
हाँ बिखरती चाँदनी को सबने पहचाना यहाँ .

सूरज के उगते ही जहाँ में फैल गई रौशनी
तम को अस्तित्वहीन फिर सबने माना यहाँ .

दिल की ज़मीं नम है बहुत रोपने को बीज
लहलहाते लबों से ही मौसम सुहाना यहाँ .

वो समंदर क्या करे जो चाहे साहिल को बहुत
लहरों को सुनाता है वो दिल का फ़साना यहाँ.

हर राग है अलग यहाँ धुन  भी अलग हुई
सुनेगा कौन इंदु अब  किसका  तराना यहाँ .

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