बिन जड़ों के ….!


जड़ से अलग जब से हुए
जड़ हो गए हैं सब
जड़ बुद्धि जड़ शक्ति
हर तरफ है शोर
बिन जड़ों के हो रही
भला कैसे सबकी भोर
दबी – जमीं सिसकती
पुकारती जड़ें
इंसान अपने दंभ में
न सुनता इन्हें
बिन जड़ों के उड़ रहा
आज वो जड़हीन
कैसे रोपेगा कोई
बीज हवा में कहो ……!!!

2s टिप्पणियाँ

Filed under कविता

कल रहूँ न रहूँ !


कल रहूँ … न रहूँ
फ़र्क नहीं इसका
आज हूँ या नहीं
सवाल यही खुद से !
ज़िंदगी चल रही
तेज़ कभी मद्धम
ज़िंदगी है कहाँ
सवाल यही खुद से !

8s टिप्पणियाँ

Filed under कविता

नहीं होना चाहती !


नहीं होना चाहती
मैं पौधा छुईमुई का
कि कोई भी बंद कर दे
मुझे मेरे वजूद में
हो जाना चाहती हूँ
कैक्टस की तरह
छुअन का ख़याल भी
न कर सके कोई
जब तक रहूँ
जो हूँ रहूँ
कि सख्त चुभते
कैक्टस पर भी
खिलते हैं कोमल फूल
हो जाना चाहती हूँ दुनिया की तरह सख्त
बन जाना चाहती हूँ
एक अदद कैक्ट्स !

3s टिप्पणियाँ

Filed under कविता

सच है …!


सच लिखना मुश्किल नहीं
सच पढ़ना बेहद कठिन
सच कहना भी मुश्किल नहीं
पर सच सुनना
उससे भी कठिन !
बस इसी खातिर
लिखा जाता रहा झूठ
कहा जाता रहा झूठ
अपनी सहूलियतों के लिए
ज़िंदगी के दुर्गम रास्तों पर
आसानी से चलता रहा झूठ
सच है कि सब झूठ है और
झूठ है कि सब सच !
सिवा इसके कि शब्दों के
वर्ण हैं सच
शब्दों के मायने ….बचे अब शेष नहीं ….!!!

24s टिप्पणियाँ

Filed under कविता

चुप्पी ….!


एक हद तक
अच्छी लगती है
फिर नापसंद
फिर सालती है और
फिर भी न टूटी तो
आपको तोड़ती है
एहतियातन
खुद को टूटने से
बचाने के लिए
इसे तोड़ देना चाहिए !

————————–
चुप्पी
बड़े काम की चीज़ है
जब चाहे साध लो
माहौल का
रुख ही बदल दो
खुशनुमा को ग़मगीन
तो कभी
बदतर हालात को
और बदतर कर दो
सामजिक दायित्वों से
भागने का
सबसे आसान तरीका
ये चादर ओढ़ लो !!!

7s टिप्पणियाँ

Filed under कविता

कैक्टस के फूल


मैंने तुम्हे चाहा
और तुमने
मुझे चुभन दी
मैंने सोचा
तुम काँटों में घिरे हो
तुम्हे नर्म अहसास दूँ
तुमने मेरे जज़्बात को
काँटों से भेद दिया
मुझे तकलीफ हुई
तुम मुस्कुराए
तब समझ आया कि
इतने काँटे
तुमने क्यों हैं लगाए
खुद तो नर्म बिस्तर पर
कटे तुम्हारी ज़िंदगी
सहानुभूति बटोरने को
हैं इतने दाँव बिछाए
जो भी करीब आए
उसे चुभ – चुभ जाए
कैक्टस के फूल
मैंने तुम्हे चाहा ….!!!

7s टिप्पणियाँ

Filed under कविता

साथ रहेंगे हम !!!


सफ़र करते हुए
खिड़की से बाहर
चमकती रेल की
पटरियों को देखकर
तुम याद आए
और नम हो उठीं आँखें .
हम दोनो
रेल की पटरियाँ
ही तो हैं
चल रहे हैं साथ
फिर भी
पूरी दुनिया के
किसी भी
छोर के अंत में
मिलेंगे नहीं हम .
कि बिन एक पटरी के
अस्तित्वहीन है दूसरी
गुज़र रही है ज़िंदगी की रेल
और समान दूरी पर
एक साथ
चल रहे हैं हम .
मालूम है कभी मिल न सकेंगे
फिर भी
अनवरत साथ रहेंगे हम !

6s टिप्पणियाँ

Filed under कविता