चुप्पी ….!


एक हद तक
अच्छी लगती है
फिर नापसंद
फिर सालती है और
फिर भी न टूटी तो
आपको तोड़ती है
एहतियातन
खुद को टूटने से
बचाने के लिए
इसे तोड़ देना चाहिए !

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चुप्पी
बड़े काम की चीज़ है
जब चाहे साध लो
माहौल का
रुख ही बदल दो
खुशनुमा को ग़मगीन
तो कभी
बत्तर हालात को
और बत्तर कर दो
सामजिक दायित्वों से
भागने का
सबसे आसान तरीका
ये चादर ओढ़ लो !!!

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कैक्टस के फूल


मैंने तुम्हे चाहा
और तुमने
मुझे चुभन दी
मैंने सोचा
तुम काँटों में घिरे हो
तुम्हे नर्म अहसास दूँ
तुमने मेरे जज़्बात को
काँटों से भेद दिया
मुझे तकलीफ हुई
तुम मुस्कुराए
तब समझ आया कि
इतने काँटे
तुमने क्यों हैं लगाए
खुद तो नर्म बिस्तर पर
कटे तुम्हारी ज़िंदगी
सहानुभूति बटोरने को
हैं इतने दाँव बिछाए
जो भी करीब आए
उसे चुभ – चुभ जाए
कैक्टस के फूल
मैंने तुम्हे चाहा ….!!!

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साथ रहेंगे हम !!!


सफ़र करते हुए
खिड़की से बाहर
चमकती रेल की
पटरियों को देखकर
तुम याद आए
और नम हो उठीं आँखें .
हम दोनो
रेल की पटरियाँ
ही तो हैं
चल रहे हैं साथ
फिर भी
पूरी दुनिया के
किसी भी
छोर के अंत में
मिलेंगे नहीं हम .
कि बिन एक पटरी के
अस्तित्वहीन है दूसरी
गुज़र रही है ज़िंदगी की रेल
और समान दूरी पर
एक साथ
चल रहे हैं हम .
मालूम है कभी मिल न सकेंगे
फिर भी
अनवरत साथ रहेंगे हम !

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गुरुजनों को सादर नमन !


आज गुरु पूर्णिमा है . आज के दिन मै सभी गुरुजनों को सादर स्मरण , नमन और कृतज्ञ भाव से वंदन करती हूँ . जीवन में एक गुरु से काम नहीं चलता बल्कि जीवन पर्यंत गुरु चाहिए होते हैं जो हमे सही दिशा , सही मार्ग दिखाते हैं .
गुरु वो नहीं जो शिष्यों का अंबार लगाए बल्कि अच्छा गुरु शिष्य नहीं बनाता, वो तो शिष्य को गुरु बना देता है अपना सर्वस्व निछावर कर देता है . शिष्य को गुरु की तलाश नहीं करनी होती बल्कि गुरु स्वयं अपना शिष्य खोज लेता है , द्रोणाचार्य स्वयं हस्तिनापुर गए थे , भगवान् राम को भी विश्वामित्र ने चुना था .
गुरु अपना सर्वस्व दे देता है बस शिष्य के अंदर श्रद्धा और पात्रता होनी चाहिए इसका सबसे बड़ा उदाहरण एकलव्य है जिन्होंने द्रोणाचार्य से सारी शिक्षा, श्रद्धा भाव से ही प्राप्त की थी .
अंत में आज गुरु पूर्णिमा के दिन सभी गुरुजनों को सादर नमन और वंदन !

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चाँद टूटा और बिखरा …


चाँद टूटा और बिखरा किसने ये जाना यहाँ
हाँ बिखरती चाँदनी को सबने पहचाना यहाँ .

सूरज के उगते ही जहाँ में फैल गई रौशनी
तम को अस्तित्वहीन फिर सबने माना यहाँ .

दिल की ज़मीं नम है बहुत रोपने को बीज
लहलहाते लबों से ही मौसम सुहाना यहाँ .

वो समंदर क्या करे जो चाहे साहिल को बहुत
लहरों को सुनाता है वो दिल का फ़साना यहाँ.

हर राग है अलग यहाँ धुन  भी अलग हुई
सुनेगा कौन इंदु अब  किसका  तराना यहाँ .

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उदास मन …


उदास मन
उदास शामें
नापसंद हैं तो क्या
जो लिखी आपके हिस्से
वो मिलेंगी ज़रूर 
जब भी गुज़रे
ऐसी शाम करीब से
न छूना
बस देखना ध्यान से
लिपटे हुए जीवन को 
कुछ कसा कुछ दबा 
बेचैन सा होगा व्याकुल
आने को बाहर
ज़रूरत
बस इतनी कि
फैला दो विस्तार मन का
मुस्कुरा दो 
एक मुस्कान कर देगी उसे
सारे बंधनों से मुक्त
उदास शाम उसी पल
मुस्कुराता जीवन बन जाएगी .

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माँ !!!


माँ तुम्हारी नम आँखें
बहा देती हैं
पूरा जहाँ मेरा
तुम्हारी इक मुस्कान
उड़ने को दे देती है
मुझे पूरा जहाँ
तुम्हारे चेहरे की शिकन
और  मंथन
घनघोर अँधेरे में भी 
चीर देती  है मुझे
नज़र आता है फिर
उसी में
जीवन दर्पण
खोजती हूँ खुद को
तेरी साँसों में
जानती हूँ जबकि
तेरी रूह हूँ मैं
माँ… तुम हो तो हूँ मै ….
तुम हो तो ही मै …!!!

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