अनोखा


जैसा कि नाम कुछ अलग है ‘ अनोखा ‘ वैसी वो अलग बिलकुल भी नहीं थी बस न जाने क्यूँ उसका नाम अनोखा था . करीब पाँच फुट लम्बी, साँवला रंग ,छोटी निर्जीव आँखें ,भूरे सूखे बाल , ऊपर के चारो दांत कुछ आगे को निकले हुए, उसके पास से आती पसीने की असहनीय गंध और शरीर में लिपटे हुए पुराने कहीं-कहीं से फटे हुए कपड़े ये थी अनोखा की रूपरेखा . एक बेहद गरीब नाई हरी प्रसाद की बेटी थी वो और इकलौती नहीं बल्कि चार छोटी बहने और पाँचवा एक भाई भी था जिसकी माँ की भूमिका अनोखा ही निभा रही थी. अनोखा की माँ रामरती लोगों के घर चौका-बासन और लिपाई-पुताई करके किसी तरह अपने बच्चों के लिए रोटी जुटा पाती थी . एक लड़के की चाह में पाँच बेटियाँ जनी थीं उसने . दबाव किसी का नहीं था उसे खुद ही बेटा चाहिए था अपने बुढ़ापे को सँवारने के लिए . खुद की उम्र अभी तीस पार न थी पर देखने में किसी पिछली सदी सी दिखती थी रामरती . रंग इतना काला कि उसके दाँत चूने जैसे सफ़ेद चमकते थे , शरीर सिर्फ हड्डियों का ढांचा मात्र बचा था कई बार खेतों की फसल बचाने के लिए खड़े किये गए बिजुका भी उससे भले दिखते थे .अनोखा के पिता हरी प्रसाद को मिर्गी के दौरे पड़ते थे आए दिन यही सुनने में आता कि आज यहाँ तो कल वहाँ हरी प्रसाद गिरा पड़ा है और मुंह से झाग फेंक रहा है . यही बीमारी उसकी सबसे बड़ी दुश्मन थी पूरे गाँव में कोई भी उससे अपने बाल या दाढ़ी ( हजामत ) नहीं बनवाता था कि कहीं उसकी साँसों से ये बीमारी उन्हें भी न लग जाए. पास के गाँव में सप्ताह में दो दिन सब्जी और मवेशी का बाज़ार लगता था अतः हरी प्रसाद वहीँ जाकर किसी पेड़ की छाँव तले अपनी पिटारी खोल उस्तरे को चमकाता हुआ बैठ जाता और कोई दो-चार लोग जो उसे नहीं पहचानते थे अपने बाल कटवा लेते थे या हजामत बनवा लेते थे बस यही उसकी कमाई थी .खेती बाड़ी न के बराबर थी एक बिसुआ उसरहा खेत उसे मिला था अपने भाइयों से बँटवारे के बाद जिसमे मुश्किल से धान की फसल हो पाती थी और थोड़े बहुत गेंहूं भी मिल जाते थे . बीमारी के चलते दूसरे लोग उसे अपनी खेती भी बटाई पर नहीं देते थे उसके पास अपने बैल या हल भी नहीं था जुताई आदि के लिए. बामुश्किल वो अपने भाइयों से बैल और हल ले पाता था अपने खेत की जुताई के लिए इसके बदले वो उनके खेतों में फसल की कटाई – ढूआई करा देता था . इतनी सब कठिनाइयों के बीच जो दो-चार रूपए कमाता भी तो रोज तो नहीं पर हाँ महीने में एकाध बार देसी दारु में डुबो देता था उसका कमज़ोर शरीर झेल भी न पाता और वो पड़ा रहता कभी किसी मेड़ पर ,कभी किसी तालाब के किनारे बेसुध . गाँव का कोई न कोई बच्चा या बड़ा ये ख़बर उसके घर पंहुचाता की हरी प्रसाद यहाँ या वहाँ पड़ा है दारु पीकर तब रामरती और अनोखा एक साथ आते और उसे घसीटते हुई दोनों घर तक ले जाती .रामरती के मुँह से गालियाँ बरसतीं , अपनी किस्मत को कोसती और सारा गुस्सा अपनी बेटियों पर निकालती ,उन्हें पीट डालती लेकिन इस सब का हरी प्रसाद पर कोई असर न होता और अनोखा बचपन से ही आदी थी इस सबकी इसलिए कभी कुछ नहीं कहती बस अपने पिता को घर तक ले जाने में चुपचाप रामरती की मदद करती थी . रामरती रोते हुए बेटे अनूप को कलेजे से लगा के चिल्ला – चिल्ला के कहती कि बस मेरा बेटा बड़ा हो जाए तो मुझे इस नरक की दुनिया से मुक्ति मिले न जाने इन पाँच-पाँच बोझ की गठरियों से कब पीछा छूटेगा , मुझे मार कर ही मरेंगी ये सब ! और उस पर ये दारु बाज खसम न मरता है न मरने देता है . घर में अनाज की कमी इतनी कि न जाने कितनी रातें रामरती ने सिर्फ पानी पर गुज़ारीं थीं . दिन में तो फिर भी जिस घर में काम करती कोई न कोई उसे बासी रोटी -आचार या खराब हो रहा खाना खिला ही देता हाजमा इतना मज़बूत हो चुका था उसका कि सब कुछ हजम हो जाता . अनोखा अब चौदह वर्ष की हो चुकी थी और उसका शरीर अब उन फटे कपड़ों से छुप नहीं रहा था रामरती के लिए सबसे बड़ी मुसीबत यही हो रही थी की सब गाँव वालों की नज़रों से कैसे बचाए अपनी बेटी के विकसित हो रहे शरीर को . रामरती ने अपनी समस्या जिन घरों में काम करती थी उनकी मालकिनो से बताई तो कुछ भली औरतों ने अपनी पुरानी फटी ब्रा रामरती को दे दी कि इसे सिल कर वो अनोखा को पहनाये और अनोखिया से बोल कि दुपट्टे से ढँक कर रखा करे ठीक से अपना शरीर ज़्यादा बाहर आने – जाने की ज़रुरत नहीं है घर पर ही रहे और घर सम्हाले बाहर कमाने के लिए तो तुम हो ही . पुरानी साडी को फाड़ कर रामरती ने अनोखा के लिए दुपट्टा भी बना दिया और फटी ब्रा की मरम्मत करके अनोखा को पहना दी इस हिदायत के साथ अब तू बड़ी हो रही कायदे से रहा कर पर भला कब तक और कहाँ तक ढँक पाती ये पुरानी अंगिया और पुरानी ओढ़नी अनोखा के नित नए विकसित हो रहे शरीर को. आखिर उसे भी तो अच्छा लगता था अपने शारीर का बदलता हुआ यह रूप क्यों कि अब जब भी वो घर में रहती तो चचेरे भाई भी उसे बड़े ध्यान से निहारते और जब भी बाहर जाती गाँव के चाचा-ताऊ सब उसे अपने पास बुलाते, उसके हाल पूछते और बिना किसी काम के ही दो – चार रुपए भी पकड़ा देते कि रख लो कुछ अपनी पसंद का ले लेना . आज तो जैसे ही बिसात खाने वाले की आवाज़ सुनकर अनोखा घर से बाहर भागी और उसके पास बैठ के सामान देख रही थी कि तभी गाँव के रज्जन काका वहाँ आ गए और उन्होंने बिसात खाने वाले से उसे पूरे ९ रूपये के कान के बुँदे और ३ रुपए की नाखूनी दिलवाई साथ ही बड़े प्यार से बोले अनोखा कल यह बुँदे पहन कर इसी वक़्त मेरे ट्यूबवेल पर आना जरा मैं भी तो देखूं कि कैसी दिखती है तू इन बूंदों में . अनोखा ने पहली बार कान में बुँदे पहने थे आठ बरस की थी जब उसने शौक में कान छिदवाए थे लेकिन आज तक सिवाए नीम की सूखी डंडी के कोई जेवर उसे न मिला था . हरा नग था उन बुन्दो का और उसमे तीन छोटे – छोटे घुंघरुओं की लटकन भी थी उन्हें पहन कर अपने छोटे- छोटे घिसे हुए नाखूनों में नाखूनी लगा कर अनोखा इतरा रही थी और सोच रही थी कि माँ बस यूँ ही परेशान रहती है और सब को कोसती है जबकि सब लोग कितने अच्छे हैं गाँव में ख़ास कर रज्जन काका .
शाम को घर आते ही रामरती की नज़र जैसे ही अनोखा पर पड़ी वह दंग रह गई और जोर से उसके बाल खींचते हुए बोली कलमुही कहाँ से लाई ये सब और नाखूनी लगाकर क्यूँ बैठी है ? अनोखा घबरा कर – डर कर रोने लगी . माँ को पता चलेगा तो मार ही डालेगी सोचकर उसने झूठ बोला कि रज्जन काका की बेटी बेबी जिज्जी ने दिए हैं हमें वो कह रही थीं कि हमारी शादी हो गई है और अब हम सोने के गहने पहनते हैं इनका कोई काम नहीं है इन्हें अब तू रख ले और ये नाखूनी भी उन्होंने ही दी ये सुनकर रामरती कुछ शांत हुई और बोली ठीक है लेकिन आइंदा कभी कोई तुझे कुछ सामान दे तो मुझे बताना और ये नखूनी-अखूनी शादी के बाद लगाना अभी कायदे से रह ! चल अब रात के लिए रोटी सेंक भूख लगी है आज रामसरन कक्कू के यहाँ से माठा मिला है उसी से सब खा लेंगे और हाँ देख ये थोडा गुड़ है इसे अनूप के मट्ठे में डाल देना कहकर रामरती चली जाती है घर के बाहर बैठकर पंचायत कर रही अपनी जिठानियों और देवरानियों के पास और शामिल हो जाती है गाँव के सभी ठाकुरों की ठकुरई के बारे में बात करने और दबीं जुबान से उन्हें गरियाने के लिए तभी मौका देखते ही उसकी जिठानी हमेशा की तरह उसे छेड़ती है – अरे रामरती अनोखा सयानी हो गई है कोई लड़का देख भी रही है या नहीं ? मेरी मान जल्द उसकी शादी कर दे कहीं कुछ ऊँच-नीच हो गई तो क्या करेगी. तू कहे तो अपने बड़े भाई से बात चलाऊँ कोई दान-दहेज़ भी नहीं देना पड़ेगा बस मेरे भईया को एक लड़का दे दे और फिर क्या, राज करे पूरा जीवन. तीन बेटियां है बस चौथे बच्चे के समय भौजाई ख़तम हो गई तब से उनका घर सूना है खाने पीने की भी कोई कमी न है मेरे भईया के पास वैसे भी तू कहाँ से कर पायेगी अनोखिया की शादी .रामरती वहाँ से बिना कुछ बोले हुए चली आती है और मन ही मन सोचती है कि सही तो कह रही है उसकी जिठानी आखिर कैसे होगी अनोखा की शादी . खाने के बाद खाट पर लेटी हुई रामरती इंतज़ार करती है नींद का रात चढ़ आई लेकिन नींद उसकी आँखों से कोसों दूर है दिमाग में वही सवाल कि कैसे जीवन कटेगा लडकियाँ बड़ी हो रही हैं और यहाँ तो खाने तक के लाले हैं ऐसे में शादी ? तभी हरी प्रसाद आता है और एक झटके में उसके ऊपर टूट पड़ता है ये कहते हुए कि मट्ठा खट्टा था बहुत मेरी भूख अभी बाकी है. निष्प्राण,निर्जीव रामरती से अपनी वासना की भूख शांत कर हरीप्रसाद सो जाता है , और रामरती, उसकी भूख ? उसे भूख है ही नहीं . ज़िंदगी ने इतना भर दिया है उसे कि वो भूख को ही भूल चुकी है. कई बार तो उसे खुद के जीवित होने पर भी शक हो उठता है रात बीत जाती है और सुबह होते ही रामरती चल पड़ती है उन घरों की ओर जहाँ वो चौका-बासन करती है ,सुबह की चाय उसे वहीँ नसीब हो जाती है हालांकि दूध नहीं होता उस चाय में बची हुई उबली हुई पत्तियों में ही पानी डाल कर उबाल कर दे दिया जाता है उसे पीने को पर शक्कर खूब होती है क्यूंकि मालकिन अक्सर ही कहती हैं कि इन काम वालों को मीठा बहुत पसंद होता है इनकी चाय में शक्कर खूब होनी चाहिए बस . सही तो कहती हैं मालकिन, हमारे जीवन की मिठास इसी चाय की ही तरह तो है न पत्ती, न दूध,बस दिखावे की चाय जिसका बस रंग गाढ़ा है हमारे गाढ़े जीवन की तरह .
उधर घर में अनोखा जल्दी-जल्दी सारे काम निपटाती है अपने छोटे भाई अनूप को नहला-धुला कर ,उसकी आँखों में मोटा सा कानो तक फैला हुआ काजल लगाकर उसे अपनी छोटी बहनों के हवाले कर खुद नहा कर तैयार हो जाती है. अनोखा को ब्रा पहनना पसंद नहीं रोज ही रामरती की डाँट से पहन लेती है पर आज वो ब्रा पहनना नहीं भूलती . आज उसे अपने बदन पर ये कसाव अच्छा लग रहा था कानो में हरे बुँदे खूब जँच रहे थे . अब रज्जन काका से मिलने कैसे जाए बस यही सोचते हुए वो हाँथों में लोटा उठा कर चल देती है ताकि कोई सवाल न करे कि वो कहाँ जा रही है क्योंकि उसकी चाची और ताई सब अपनी मोटी नज़र उस पर रखते हैं कि कब वो कोई गलती करे और वो रामरती को नीचा दिखा सके . ट्यूबवेळ पर रज्जन पहले से ही मौजूद था अनोखा को देखते ही उसकी धमनियों का प्रवाह तेज़ हो गया लेकिन खुद को नियंत्रित करते हुए सामान्य स्वर में बोला अरे आओ अनोखा मै तेरी ही राह देख रहा था. अनोखा ये कहते हुए कि काका आपने कहा था न कि बुँदे पहन कर दिखाना चुप – चाप जमीन की ओर निहारने लगती है . हाँ ! रज्जन बोला, थोड़ा पास तो आ ,मेरे पास आ कर बैठ कहते हुए रज्जन अनोखा को अपने पास खींच लेता है. अनोखा डर जाती है लेकिन कहती कुछ नहीं, हिम्मत ही नहीं उसमे बस नीचे ज़मीन को ही निहारती रहती है. रज्जन चुप्पी तोड़ता है ,कितनी अच्छी लग रही है तू ,किसी फिलम कि हीरोइन माफक . अनोखा शरमा जाती है और दुपट्टे से मुंह ढँक लेती है .रज्जन कि नज़र सीधे अनोखा के कसे हुए शरीर पर जाती है . देख अनोखा मै तेरे लिए और भी बुँदे, माले और नया सूट भी ला दूँगा या तू अपनी पसंद का ले लेना मै तुझे पैसे दे दूँगा अब शरमाना छोड़ और खुश रह बस ! अनोखा कहती है काका आज तक मैंने कभी नया कपड़ा नहीं पहना ,घर में कुछ नई साड़ियाँ हैं माँ के बक्से में लेकिन उन्हें माँ भी नहीं पहनती, कहती है कि मेरे ब्याह में मुझे देगी पता नहीं सच कहती है या झूठ क्यूंकि प्यार तो वो सिर्फ अनूप को ही करती है आप कितने अच्छे हो रज्जन काका कहते हुए वो थोड़ा सहज हो जाती है . देख मै तेरे लिए क्या लाया हूँ कहते हुए रज्जन अपने कुरते की जेब से अख़बार कि एक पुड़िया निकालता है और उसकी ओर बढ़ा देता है जिसमे चिपकी होती हैं तीन-चार जलेबियाँ .अनोखा खुश होकर कहती है जलेबी ! रज्जन कहता है हाँ तेरे लिए ही लाया हूँ और अनोखा झट से अखबार लेकर जलेबियाँ खाने लगती है . रज्जन ध्यान से अनोखा के होठों को निहारता है और एकदम से उसका मुँह पकड़ कर अपने मुँह में भर लेता है . काका आप क्या कर रहे हैं कहते हुए अनोखा खुद को छुड़ाती है . कुछ नहीं तूने जलेबियाँ खाई तो मैंने सोचा मै भी मुँह मीठा कर लूं रज्जन कहता है . तू डर क्यूँ रही है अनोखा देख तुझे कुछ भी नहीं हुआ , मुझे अच्छा लगा क्या तुझे अच्छा नहीं लगा कहकर रज्जन अनोखा की कमर में हाँथ डालकर उसके पेट को दबाता है . मुझे डर लग रहा है काका यदि माँ को पता चला तो मुझे मार ही डालेगी कहते हुए अनोखा अपनी ओढ़नी को फैला लेती है . रज्जन कहता है मै तुझे प्यार करने लगा हूँ अनोखा और मैं तेरा पूरा ख्याल रखूँगा किसी को भी कुछ नहीं पता चलेगा तुझे किसी से भी डरने की कोई ज़रुरत नही है , मै हूँ ना . तू रामरती को भी मत बताना कहते हुए रज्जन खुद को अनोखा के शरीर से पूरी तरह सटा देता है . अनोखा उम्र के जिस मोड़ पर है उसे ये सब किसी सपने और सतरंगी दुनिया के सामान लगता है . रज्जन धीरे-धीरे अनोखा के शरीर को सहलाता है वो डरती है और साथ ही शरमाती भी है लेकिन मना नहीं करती आखिर अभी-अभी जलेबियाँ खाई थीं उसने और फिर नया सूट भी तो मिलगा तभी किसी की आवाज़ आती है रज्जन …ओ रज्जन ! रज्जन चौकन्ना होता है अनोखा को एक झटके से अलग कर झट से खड़ा होता है, कल फिर आना कहते हुए उसे कोठरी के पीछे के दरवाजे से निकल जाने को कहता है और खुद को सँभालते हुए कोठरी के बाहर आता है वहाँ गाँव के प्रधान होते हैं . अरे प्रधान साहब आप यहाँ, बताइए कैसे आना हुआ . अनोखा चली जाती है और आज पहली बार वो अपने शरीर में कुछ पिघलन महसूस करती है. जल्दी से घर पहुँच कर बुँदे उतार देती है और घर के कामो में जुट जाती है लेकिन आज उसे अपना शरीर हवा की तरह उड़ता हुआ सा लगता है. माँ कभी भी जलेबी नहीं लाई हाँ एक बार किसी ने दो जलेबियाँ दी थीं उसे वो भी माँ ने अनूप को खिला दी थीं, उसकी बची ज़रा सी चाशनी ही मुझे चाटने को मिली थी और आज पूरी चार जलेबियाँ खाईं मैंने कितना अच्छा लगा था अनोखा सोचती है . इसी तरह पूरा दिन बीत जाता है और रात आते ही अनोखा सुबह की प्रतीक्षा में बेचैन हो रही है कि कल भी उसके लिए कुछ तो ज़रूर ही लायेंगे रज्जन काका .आज रात खुद से ही शरमा रही है और खुद को ही सहला भी रही है . ये सब उसे अच्छा लग रहा है पर क्यूँ ,क्या ये तो उसे खुद भी नहीं पता लेकिन ये सच है कि इतना खुश इससे पहले वो कभी नही हुई . हरी नाई रोज ही निकल जाता कि शायद आज कोई उससे बाल बनवा ले और रामरती घरों के चौका-बासन करने चली जाती उनके जाते ही अनोखा भी फटाफट सारे काम निपटा कर निकल जाती किसी न किसी बहाने से अपने रज्जन काका से मिलने . रज्जन काका की उम्र करीब ४८ की होगी और उनकी बेटी, बेबी जो कि १९ की है इसी साल उसकी शादी हुई है . अनोखा अभी चौदह की पूरी हो पंद्रहवीं की दहलीज में कदम रख रही है. रज्जन रोज ही अनोखा के लिए मिठाई लाता,कभी कोई अँगूठी तो कभी नगद रूपए भी देता . आज तो उसने अनोखा को पचास रूपए दिए ये कहकर कि अपने लिए एक नई ब्रा खरीद ले जिसमे लाल रंग की लेस लगी हो अनोखा रोज एक ही उधड़ी सी कुछ मटमैले रंग की ब्रा पहने रहती है यह जानने के लिए रज्जन को कभी उसकी कमीज़ नहीं उतारनी पड़ी क्यूंकि अनोखा के घिसे पारदर्शी कुरते के ऊपर से दुपट्टा हटाते ही रज्जन की ललचाई नज़रें सीधा वहीँ ठहरती हैं . ये रज्जन का रोज का काम था वो अनोखा की ओढ़नी दूर रखवा देता कि मुझसे क्या शर्म मै तो तेरा ही हूँ और जी भर निहारता उसके अधखुले,अधढंके कसे शरीर को. अगले ही दिन पैसे को सलवार के नारे में खोंस कर अनोखा बाज़ार से खरीद लाती है अपने जीवन का पहला नया कपड़ा वो भी अंतरंग और मचल पड़ती है सोचकर ही कि कल वो नया कपड़ा पहनेगी . पर माँ ! सोचते ही डर जाती है कि माँ को पता चलेगा तो मार ही डालेगी . मारे डर के नई ब्रा को भी खोंस लेती है सलवार के नारे के ही बीच में ताकि किसी कि नज़र न ही पड़े . खुश थी क्यूंकि पूरे दस रूपए भी बच गए थे जिसकी उसने आइसक्रीम खा ली थी . सब कितना अच्छा लग रहा है वो सोचती है कि बड़े होने के कितने फायदे हैं. माँ तो घर में रोटी और नमक ही देती है या कभी-कभी मठ्ठा या चटनी बस ! रज्जन काका उसे रोज ही उसकी पसंद की चीज़े खिलाते हैं और माँ कहती है किसी से बात न करो ,खुद नहीं करती बात किसी से तभी कोई माँ को कुछ नहीं देता . मै खुश हूँ और मुझे माँ जैसा नहीं बनना . अगले दिन नई ब्रा पहन कर ऐसे इतराती है खुद पर जैसे कोई सोने का हार पहन लिया हो. घर के छोटे से मटमैले शीशे में खुद को निहारती है मटक-मटक कर और जा पँहुचती है अपनी खुशियों के भगवान् रज्जन काका के पास .अनोखा को देखते ही रज्जन ताड़ जाता है फिर भी सवाल करता है कुछ लिया या नहीं ? अनोखा नज़रें नीचे कर शरमा जाती है और रज्जन उसकी ओढ़नी हटा देता है धीरे से उसे बांहों में जकड़ लेता है उसके कानो में बोलता है ऐसे दिख नहीं रहा ज़रा ठीक से दिखा देखूं तो सही कहते हुए अनोखा का कुर्ता उतारने लगता है अनोखा डर जाती है पर मना नहीं कर पाती आखिर रज्जन काका ने ही तो दिलवाई है रज्जन हटा देता है उसके शरीर से कुर्ता और धीरे-धीरे उसके करीब जाकर जकड़ लेता है उसे और कर देता है अनोखा का कौमार्य भंग ! अनोखा तेज़ दर्द से कराह उठती है ,उठ भी नहीं पाती . नीचे खून देख कर डर कर रोने लगती है ,रज्जन उसे समझाता है मै हूँ तेरे साथ और पहली बार में होता है ऐसा, तू थोड़ी देर आराम कर फिर उठना सब ठीक हो जायेगा. अनोखा धीरे-धीरे सुस्त कदमो से खुद को संभालती हुई घर आ जाती है . आज उसे कुछ अच्छा नहीं लगा,बहुत थक गई है वो घर आकर भी कोई काम नहीं करती बस लेटी रहती है पूरा दिन.शाम को रामरती से डांट भी खाती है पर उठती नहीं,पेट दर्द का बहाना बना कर लेटी रहती है अगले दिन सुबह उसे ठीक लगता है ,लेकिन कुछ मीठा खाने की चाह नही रही अब और न ही रज्जन काका से मिलने की . दो-तीन दिन वो घर से नहीं निकली तो रज्जन खुद दोपहर उसके घर आकर उसकी तबियत पूछता है और साथ ही कल आना कुछ ज़रूरी बात करनी है कहकर चला जाता है. रज्जन के इस तरह से आने और उसका का हाल पूछने से अनोखा को अच्छा लगता है और वो खुद को ठीक महसूस करती है अगले दिन फिर वो रज्जन से मिलने जाती है रज्जन उसे पकड़ कर सब जगह चूमने लग जाता है ये कहते हुए कि अनोखा अब मैं तेरे बिन नहीं रह पाऊंगा तू क्यों नहीं आई तीन दिनों से क्या मै तुझे पसंद नहीं और जवाब की प्रतीक्षा किये बिना कुरते की जेब से पाजेब निकल कर खुद ही उसे पहनाने लगता है. अनोखा कुछ बोल नहीं पाती बस एक बार फिर रज्जन के साथ खुद को रज्जन का कर देती है ,इस बार उसे भी अच्छा लगता है . पर ज्यादा अच्छा क्या लगा रज्जन का साथ या अपने पैरों में चाँदी की पायल ये न समझ पाई वो खुद भी. धीरे-धीरे ये मुलाकातें बढ़ती गईं और फिर एक रोज़ रामरती की नज़र पड़ी कि अनोखा का शरीर पहले से अधिक गठा और स्वस्थ नज़र आ रहा है इस फर्क को वो समझ पाती कि अनोखा की उबकाइयों ने सब बता दिया . रामरती अनोखा को बुरी तरह पीटती है और उसके कुछ न बताने पर उसकी तलाशी लेती है तलाशी लेने पर उसे पायल मिलती है जो अनोखा ने छप्पर के अन्दर छुपा रखी थी जब रामरती जोर से उसका गला दबाती है तब जाकर वो रज्जन का नाम लेती है. रामरती वही आँगन में लड़खड़ा जाती है ये कहते हुए कि कहाँ से लाए ज़हर की पुड़िया जो खिला सके अनोखा को और खुद को भी. हरीप्रसाद को कोसते हुए, अनोखा को गालियाँ बकते हुए वो सीधे रज्जन के घर जाती है . रज्जन घर में नहीं था और उसकी दुल्हिन से कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं हुई आखिर उनके घर ही काम करती है रामरती और यदि काम से निकाल दिया तो ? कहाँ से पेट भरेगी सबका उधर अनोखा भाग कर खेत में रज्जन के पास जाकर सब बताती है कि माँ कह रही है तू पेट से है और मुझे बहुत मारा तो मैंने आपका नाम बता दिया .रज्जन कोई बात नहीं अनोखा तू चिंता मत कर और अपनी माँ को बोल कल तुझे लेकर दूसरे गाँव के अस्पताल में मिले ,जो भी खर्चा होगा मै दूंगा बस एक बात का ध्यान रहे ये बात किसी और को पता नहीं चलनी चाहिए .अगले दिन रामरती अनोखा को लेकर अस्पताल पहुँचती है रज्जन उसे पैसे और साथ ही धमकी देकर कि ये बात कहीं और नहीं निकलनी चाहिए वहाँ से चला जाता है . पंद्रह वर्ष की अनोखा का उसकी जान के रिस्क पर कराया जाता है गर्भपात! इस उम्र में गर्भ में नया जन्म और फिर उसकी हत्या अनोखा को ज्यादा कुछ फर्क नहीं पड़ता सिवा इसके की माँ बहुत गुस्सा है जबकि रामरती नहीं समझ पाती कि वो जिन्दा है या मर गई . गाँव में भला कब ऐसी बातें छुपती हैं आग की तरह ये बात भी फ़ैल गई और अब तो हर जवान-बूढ़ा पुरुष अनोखा से मिलना चाहता सिवाय रज्जन काका के . अनोखा को रामरती ने घर में बंद कर दिया था और वो कहीं आ जा न सके ये जिम्मेदारी उसकी छोटी चारों बहनों की थी .पूरे गाँव में हर घर में हर एक की जुबान पर बस एक ही बात थी कि फूटी किस्मत है रामरती की पति मिर्गी वाला मिला और लड़की ने तो नाक ही कटा दी,हमारी होती तो ज़हर खिला कर मार डालते ऐसी कुल्टा लड़की को अरे रज्जन का क्या दोष आदमी है इसी से न संभाली गई होगी अपनी जवानी पूरे गाँव के मुँह पर कालिख पोत दी इसने . इस गंदगी को जल्दी से जल्दी गाँव से फेंक देना चाहिए,हर कोई समझाता रामरती को. रामरती की जुबान चिपक चुकी थी और आँखे रेगिस्तान से भी अधिक सूखी हो चली थीं कोई राह नज़र नहीं आ रही थी उसे कई ठाकुरों ने तो यहाँ तक समझाया कि अनोखा को मेरे पास भेज दिया कर तेरे दिन भी बहुर जायेंगे आखिर और भी तो चार बेटियाँ हैं तेरे . रामरती बस यही सोचती कि पैदा होते ही गला क्यूँ न घोंट दिया मैंने इन लड़कियों का ,लड़कियां होती ही हैं भार कहते हुए बस अनूप को गले से चिपका लेती है.शाम का वक्त है रामरती की जिठानी आती है और बेहद दया भाव से कहती है जो होना था हो गया तू कहे तो अब भी बात बन सकती है मै अपने भईया को कुछ नहीं बताउंगी अनोखा की शादी जल्दी से उनके साथ करवा सकती हूँ तेरे सर से मुसीबत भी हट जाएगी और मेरे भाई का घर भी बस जायेगा . लेकिन जिज्जी तुम्हारे भईया की उम्र तो चालीस पार है और अनोखा अभी पंद्रह की भी पूरी नहीं हुई रामरती कहती है. ये सुनते ही जिठानी गरम तवे सी छन्ना के बोली हाँ !और रज्जन तो बस अभी सोलह बरस का ही है न ! जब अड़तालीस साल के आदमी के साथ सोना आता है तुम्हारी बेटी को तो हमारे भईया तो अभी चालीस के ही हैं.सही कहते हैं भला करने चलो और अपना ही हाँथ जलाओ जिठानी जोर से कहती है . रामरती कुछ सोच नहीं पाती कि क्या करे ,किससे मदद ले,कैसे अनोखा की शादी कर जल्द से जल्द उसे गाँव से अपने जीवन से निकल फेंके इसी उधेड़बुन में बैठी है कि तभी अनूप रोते हुए आता है , कहता है मम्मी मेरे पापा मर गए ! चलो देखो चल कर सब कह रहे हैं वो मर गए.
‘अच्छा हो की मर गया हो तेरा बाप कम से कम कहीं से तो मुक्ति मिले ’ कहते हुए रामरती भागती है गाँव के बड़े तालाब की ओर वहीँ किनारे हरिप्रसाद पड़ा है भीड़ लगी हुई है कोई कह रहा है कि इसे मिर्गी आई है, कोई कह रहा है कि दारु पी है इसने .सब दूर खड़े हैं कोई उसके पास नहीं जाता . रामरती उसे छूती है ,ठंडा है उसका पूरा शरीर और दारू की तेज़ दुर्गन्ध आ रही है , मुंह से लेकर कान के अन्दर तक झाग फैला है, मृत्यु एक साथ सारे ही ऐबों को ले जाती है. एक जोर की चीख गूँज जाती है पूरे गाँव में “अनूप के पापा ” ! रामरती वहीँ हांथों को पटक कर चूड़ियाँ तोड़ देती है और कहती है अच्छा हुआ मर गए, मुक्ति तो मिली . चूड़ियों के टूटने से हांथों से खून बहने लगता है और उन्ही खून भरे हांथों से मिटा देती है अपना सिन्दूर . हरी प्रसाद का क्रिया कर्म जैसे-तैसे उसके भाई कर देते हैं .रामरती कई दिनों तक घर से नहीं निकलती एक सन्नाटा पसरा है उसके चारों ओर . शाम का वक्त है अनोखा आती है और सन्नाटे को तोड़ती हुई कहती है माँ घर में कुछ भी खाने को नहीं है . सब तो खा गई , अब मै ही बची हूँ, आ मुझे भी खा ले कहते हुए रामरती अपनी चुप्पी तोड़ती है तभी अनूप रोते हुए आता है माँ, मुझे भूख लगी है. रामरती उसे चुप कराती है और घर में तलाशती है कि कुछ खाने को मिल जाये लेकिन घर में सिवाय ख़ाली बर्तनों के कुछ भी नहीं मिलता . रामरती भाग कर ठाकुर के घर जाकर रोती है और वहाँ से अनूप के लिए खाना लाती है, ठकुराइन उसे खाना तो दे देती हैं लेकिन साथ ही कल से काम पर आने कि हिदायत भी कि यदि काम नहीं करेगी तो उसके बच्चों के लिए खाना कौन देगा इस तरह जितना शोक करना था कर लिया,वैसे भी क्या करता था तेरा पति, अब तू आगे की सोच और कल से काम पर आना शुरू कर. रामरती घर जाकर अपने कलेजे के टुकड़े को खाना खिलाती है और लड़कियों को खुद परोस के खाने के लिए कह देती है अगले दिन से ही रामरती घरों में काम के लिए जाने लगती है अभी एक महीना भी नहीं बीता कि फिर से जमींदार उसे नए-नए बहानों से परेशान करने लगे कि वो अनोखा को उनके पास भेज दे. रामरती बेहद डर चुकी थी अतः सीधा अपनी जिठानी से अनोखा की शादी कि बात करती है कि क्या वो अब भी अपने भाई के साथ अनोखा की शादी कर सक सकती है .जिठानी अपनी ख़ुशी को दबाते हुए कहती है अब इतना अहसान तो करना ही पड़ेगा तुझ पर पहले ही मान जाती तो इतनी बेईज्ज़ती तो नहीं उठानी पड़ती अब देखती हूँ मै भैया से बात कर के. एक महीने के अन्दर साधारण ढंग से अनोखा कि शादी हो जाती है. बारात में दूल्हा और उसकी तीन बेटियाँ थी. दूल्हा अनोखा को देख किसी बांके छोरे की तरह लालायित था जबकि अनोखा इतनी शांत कि तालाब का शांत पानी भी उसके समक्ष कोलाहल करता नज़र आये .बेटियाँ उसे मम्मी-मम्मी पुकार रही थीं .बड़ी लड़की की उम्र तो १० या ११ की ही होगी . अनोखा की शादी संपन्न हो गई और विदाई में उसे मिली थीं तीन बेटियाँ . वैसे भी अपने घर में अपनी चार बहनों और भाई अनूप की माँ तो वही थी बस फर्क ये था कि उसी उम्र के उसके भाई-बहन उसे दीदी बुला रहे थे जबकि वो बेटियाँ उसे मम्मी बुला रही थीं . अनोखा की विदाई में सभी आँखें शून्य थीं सिवाय अनूप के वो सबसे छोटा था और अनोखा खुद से ज्यादा अनूप का ख्याल रखती थी इसलिए अनूप को दीदी का जाना बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा था विदाई में रामरती अनोखा को गले लगाते हुए कहती है अब मेरी जिम्मेदारी ख़तम अब वही तेरा घर है जी या मर बस यहाँ मत आना . ससुराल में अनोखा का स्वागत करने के लिए भी कोई न था सिवाय अनोखा की विधवा सास के और वो थी भी तो दूसरी पत्नी, इसलिए सास को भी कोई उत्साह नहीं था कि वो अनोखा का स्वागत धूम धाम से करे . पूरा दिन गुज़र गया शाम होते ही तीनो लड़कियों को दादी के पास भेज कर अनोखा का पति कांतिलाल कमरे में आता है और बिना किसी वार्तालाप के वसूल लेता है अपने पति होने का अधिकार .शादी के दूसरे ही महीने अनोखा गर्भवती हो जाती है सास और पति दोनों को लड़का ही चाहिए इस लिए तीन महीने पूरे होते ही वो उसकी जांच करवाते हैं. गर्भ में लड़की है पता चलते ही अनोखा का गर्भपात करा दिया जाता है. पंद्रह की उम्र और दो-दो बार गर्भपात, अनोखा पीली पड़ जाती है ,उसका शरीर निष्प्राण सा दीखता है. अभी कच्ची उम्र है अनोखा की कहते हुए डॉक्टर कांतिलाल को कुछ वक्त अनोखा से संबंध न रखने की सलाह देता है लेकिन कांटी लाल को इंतज़ार नहीं है और कुछ ही महीनो में फिर से अनोखा की कोख हरी हो जाती है, कर दी जाती है. तीन महीने पूरे होते ही एक बार फिर से जाँच,लेकिन इस बार लड़का है कि खबर से सास और पति उसे भर पेट खाना भी खिलाते हैं और उसका ख्याल भी रखते हैं. अनोखा का कमज़ोर शरीर टूट चुका है अब तक वो सिर्फ लेटी रहती है उससे ठीक से चला भी नहीं जाता. कम उम्र कमज़ोर शरीर का नतीजा आठवें महीने में ही उसे प्रसव का दर्द उठ जाता है और बच्चा जनने में ही निकल जाती है अनोखा की जान ! बड़ी मुश्किल से बच्चा बचता है क्यूंकि डॉक्टर से बच्चा बचाने के लिए ही कहा गया था माँ तो नई भी आ जाएगी लेकिन लड़का इतनी मुश्किल से तो घर का चिराग मिला है इसलिए बच्चा हर हाल में बचना चाहिए . कांतिलाल और उसकी माँ खुश है कि लड़का हुआ है उनके वंश का वंशज मिल गया है, पालने के लिए माँ तो मिल ही जायेगी . अनोखा बिलकुल शांत हो चुकी है क्योंकि उसे जीवन से मुक्ति मिली है हालाँकि क्या यही जीवन था क्या यही होना चाहिए था…. क्या यही मुक्ति है ….अनोखा में कुछ खास या अलग भले ही न रहा हो किन्तु उसका जीवन उसके नाम की तरह अनोखा ही गुज़रा ….!

हमारी यह कहानी  ‘ लमही ‘ के अप्रैल – जून  अंक में प्रकाशित हुई है !

11s टिप्पणियाँ

Filed under कहानी

गाँव की लड़की


याद आ गई खाते हुए कैथा 
लाल मिर्च वाले नमक के साथ
और सुनाई दी उसकी
तेज़ मिर्च वाली
चटकारे की चटाक  !
फिर फीते से बंधी
तेल लगी कसी हुई
दो चोटियाँ
बीच में सीधी सपाट
उसकी माँग
जैसे बंटे 
 हो दो हिस्से
और एक भी बाल को
इजाज़त नहीं पार करने की
वो बाड़ !
बैठी दो सहेलियों के साथ
चटाचट खेलती गुट्टों की आवाज़
चट -चट …….ख़ट-खट
खिलखिलाती उन्मुक्त हँसी
वो खनकती आवाज़ !
नीला कुर्ता सफ़ेद सलवार

कुर्ते में चिमटी से लगाया हुआ दुपट्टा
जाती हुई स्कूल अपने
छोटे भाई-बहनों के साथ
जैसे जाना है किसी और ही जहान
बस उड़ान को
तैयार हो रहे पंख !
चूल्हे में कंडे सुलगाती
फुंकनी से फूंक मारती

चिमटे से लकड़ी सुधारती
धुँए से आँखों को मचलती

और फिर जलते चूल्हे पर
रखती हुई अदहन चावल का 
काटती हुई साग
एक साथ

सारा काम कर लेने का
विश्वास !

मोटा लगा आल्ता
चौड़ी सी पाजेब और
तीन -तीन बिछुए
लाल साड़ी सपाट माँग में
आखिर तक भरा सिन्दूर

माथे पे बड़ी सी बिंदी
कलाइयों में भरी चूड़ियाँ

ओढ़े हुए पिछौरी
लम्बा सा घूँघट
थोड़ी हील की चप्पल
एक नया ही रूप !
 फिर सुखाती हुई कथरी
गोद में बच्चा
चढ़ा चूल्हा, चौका-बासन
बिखरे बाल
अधखुला शरीर
घुटने तक चढ़ी बिना फ़ॉल की साड़ी
बटोर रही हैं आँगन
आँचर में अभी भी बंधा है कैथा

कि खाएगी फुरसत में कभी
हाँ वही गाँव की लड़की !

9s टिप्पणियाँ

Filed under कविता

आहिस्ता – आहिस्ता !


जैसे ही सिल के दाँत
घिसने लगते हैं
उसे फिर से छिदवाती है औरत
पत्थर पर चलती हुई
छेनी और हथौड़ी की मार
थोड़ा खुरच देती है सिल को
और बार – बार लगातार
प्रहार के बाद
तैयार होती है सिल
पूरी तरह
अब जो चाहे पीसो
पिसेगा
पहले थोड़ी खिसकन
ज़रूर निकलेगी
आहिस्ता – आहिस्ता
सब गायब !
तैयार की जाती  है औरत
भी इसी तरह
रोज छेदी जाती है
उसके सब्र की सिल
हथौड़ी से चोट होती है
उसके विश्वास पर
और छेनी
करती है तार – तार
उसके
आत्म सम्मान को
कि तब तैयार होती है
औरत पूरी तरह
चाहे जैसे रखो
रहेगी
पहले थोड़ा विरोध थोड़ा दर्द
ज़रूर निकलेगा
आहिस्ता – आहिस्ता
सब गायब !

6s टिप्पणियाँ

Filed under कविता

नहीं रुकता प्रेम


नहीं रुकता प्रेम
कभी भी
नहीं …
कभी थमता भी नहीं
कि बिना संवाद के भी
जारी है
निरंतर संवाद !

मौन की भाषा
पढ़ती हैं आँखें
मौन के संवाद
बोलती हैं आँखें
और सुनता है ह्रदय
मौन की गूँज को
कि नहीं रुकता प्रेम
कभी भी
नहीं…
कभी थमता भी नहीं ….!

7s टिप्पणियाँ

Filed under कविता

ये जीवन है


सुबह से दो सर्जरी करने के बाद अब ओ पी डी में मरीजों से घिरा हूँ . नाम क्या है ? शेफ़ाली डाक्टर साहब . शेफ़ाली लिखते ही कलम अंतिम शब्द पर रुक सी गई और याद आ गया वो दिन जब ये नाम पहली बार लिखा था. बीस साल हो गए. लखनऊ के मेडिकल कालेज का पहला दिन और मेरी पहली दोस्त . हाय मै शेफ़ाली और आप ? मै राजीव ! मै कानपुर से हूँ और आप ? मै अलाहाबाद से ! पहली क्लास में वो मेरे पास ही आकर बैठी और मेरी कॉपी पर लिखे नाम को देखकर बोली ‘ ओह ! तुम्हारी राइटिंग कितनी सुन्दर है तुम डॉक्टर कैसे बन सकते हो ?’ एक लम्बी साँस खींच कर उसकी तरफ देखते हुए मैंने बोला जैसे कि आप ! मतलब क्या है तुम्हारा ? मतलब ये कि सुन्दर लड़कियाँ पढ़ती भी हैं ? जी हाँ और तभी मै यहाँ हूँ. लेकिन डा. की राइटिंग तो कभी अच्छी नहीं देखी . अच्छा लो मेरी नोट बुक पर मेरा भी नाम लिख दो और पहली बार ये नाम क्या लिखा मैंने कि बस अगले पाँच सालों तक सभी कॉपी किताबों में उसका नाम लिखना जैसे मेरे कोर्स का हिस्सा ही हो गया .रोज क्लास ख़त्म होते ही हम दोनों सारी भीड़ – भाड़ से दूर कैम्पस के कोने में लगे पाकर के पेड़ के नीचे उसी की टेक लेकर ज़मीन पर एक साथ बैठते और उस दिन के हर लेक्चर पर खूब चर्चा करते. आज का लेक्चर कितना बोरिंग था ना राजीव मेरी समझ में तो कुछ भी नहीं आया . हाँ कुछ चीज़े हम सिर्फ लेक्चर से नहीं समझ सकते हैं कल प्रैक्टिकल करोगी तब समझ जाओगी . वैसे तुम्हे डर तो नहीं लगेगा ? हाँ या पता नहीं कल की कल देखेंगे. एक बात याद रखना शेफ़ाली कि तुम्हारा लक्ष्य क्या है ? बस ! सारा डर भाग जाएगा. थैंक्स राजीव अब मुझे कोई डर नहीं लगेगा कहते हुए उसकी बड़ी – बड़ी आँखें थोड़ा और बड़ी हो जाती हैं. यार तुम अपनी आँखों से मुझे डरा देती हो. हद है सब तो कहते हैं कि मेरी आँखें सुंदर हैं और तुम्हे इनसे डर लगता है ? जब तुम इन्हें ऐसे और बड़ा करके देखती हो तब ! ठीक है कोई तो है जो मुझसे डरता है . तुमसे नहीं तुम्हारी आँखों से शेफ़ाली और फिर दोनों ही हँस पड़ते है. पहला सेमिस्टर हम दोनों का ही अच्छा गया अब तक हम कॉलेज के माहौल में रम चुके थे.रोज सुबह – सुबह क्लास के लिए भागमभाग. होस्टल का चाय नाश्ता फिर लेक्चर, प्रैक्टिकल, ब्रेक के बाद लंच और शाम की क्लास ख़त्म होते ही हम सब का थक के चूर होना लेकिन फिर करीब एक-दो घंटे तक साथ बैठना सब एक रूटीन सा हो चुका था. देखते ही देखते चार साल बीत गए और हम दोनों एक दूसरे के बेहद करीब हो गए . मठरी और लड्डू आये हैं घर से बड़ी मुश्किल से तुम्हारे लिए अपनी सहेलियों से छुपा कर लाई हूँ अब खुद ही खाना ये नहीं कि जनाब किसी और को खिला रहे हैं. बैग से स्टील का एक चपटा हुआ टिफिन निकालकर शेफ़ाली मेरे बैग में डाल देती है . बड़ी फिकर हो रही है मेरी इरादे क्या हैं मेमसाहब ? सब ठीक तो है कहते हुए शेफ़ाली का हाँथ पकड़ कर अपनी तरफ खींच लेता है …..

हाँ सब ठीक है ऐसे क्यूँ पूछ रहे हो राजीव ? क्योंकि मै कुछ अलग सा महसूस कर रहा हूँ आजकल क्या तुम भी ? मतलब ? शेफ़ाली मै तुमसे प्यार करने लगा हूँ और अब ये सोचने लगा हूँ कि क्या हम एक साथ पूरा जीवन नहीं बिता सकते ? ये हमारा आखिरी साल है फिर… तुम क्या सोचती हो शेफ़ाली ? मै क्या कहूँ राजीव ? क्या तुम मेरा साथ दोगी ? क्या तुम मुझसे प्यार करती हो ?. शेफ़ाली ने भरी हुई आँखों से कहा हाँ राजीव ! और वो मेरी गोद में सर रख कर रोने लगी . फिर रो क्यूँ रही हो ? क्योंकि हमारे घर में ये रिश्ता कभी नहीं स्वीकार होगा राजीव. लेकिन क्यूँ ? क्योंकि हम एक जाति के नहीं हैं और अंतरजातीय विवाह के लिए मेरे घर में कोई राजी नही होगा . मै हूँ ना शेफ़ाली सब संभाल लूँगा क्या इतना भरोसा नहीं है मुझ पर. शेफ़ाली के आंसू पोछते हुए उसका मुँह अपने हांथो में भरकर अच्छा एक बात बताओ मुझे हुआ तो हुआ तुम्हे मुझसे कैसे प्यार हो गया ? और तुमने कभी बताया भी नही ये तो गलत है कहते हुए राजीव मुस्कुराया और शेफ़ाली शरमा कर राजीव की गोद से उठ कर अलग बैठ गई. क्या राजीव तुम भी ना ! और क्यूँ तुम कब से मुझे चाहने लगे . क्या करें यार कापी – किताबों में नाम लिखते – लिखते कब अपने दिल पे लिख दिया पता ही नही चला बस ! वो आखिरी साल था हमारा मेडिकल का बहुत ही ख़ास साल . एक तो डॉ . बन जाने की खुशी और जल्दी भी तो दूसरी ये कि हम दोनों एक साथ रहेंगे सदा . वक्त कब बीत गया पता ही नहीं चला और हम सब अब डॉ . बन चुके थे और अब सब अपनी –अपनी मंजिल की तरफ जा रहे थे किसी को प्रैक्टिस करनी थी तो किसी को आगे एम् डी की पढ़ाई. शेफ़ाली के घर में उसकी शादी उसके मम्मी – पापा की पहली ज़िम्मेदारी थी. घर में शादी के लिए आई ढेरों तस्वीरें देखकर शेफ़ाली हैरान थी .आज शाम लड़के वाले तुमसे मिलने आयेंगे जैसे ही पापा ने कहा, मै डा. राजीव से शादी करना चाहती हूँ शेफ़ाली बोल पड़ी .क्या ? कौन राजीव शेफ़ाली ? हमने साथ ही पढाई की है पापा बस वो हमारी जाति के नहीं हैं .आप एक बार उनसे मिल कर तो देखिये . शेफ़ाली शायद तुम भूल गई हो कि हम अभी भी इसी समाज में रहते हैं और हम तुम्हारी शादी अपनी ही जाति के लड़के के साथ करेंगे . तुम डा . क्या बन गईं तुम्हे हमारे मान – सम्मान का ख़याल ही नहीं रहा पापा ने थोड़ी गंभीर आवाज़ में कहा. शेफ़ाली रो पड़ी नहीं पापा ऐसा नहीं है लेकिन आप एक बार ..प्लीज़ ! शेफ़ाली तुमने अपने पापा को आज बहुत दुखी किया है वो तुम पर गर्व करते थे और आज तुम अपने पापा से बहस कर रही हो ? नहीं मम्मी ऐसा नहीं है हम दोनों एक दूसरे से प्यार करते हैं और हमारे साथ के कितने ही डा . हैं जिनकी शादियां भी हो रही हैं आप लोग एक बार राजीव से मिल तो लीजिए मम्मी वो बहुत अच्छे हैं हम एक साथ खुश रहेंगे आप प्लीज़ पापा से कहो ना . शेफ़ाली तुम्हे अपने मन का करना है तो तुम्हारे लिए इस घर में कोई जगह नहीं है इस बार पापा गुस्से में बोले. अपने आप को संभालो शेफ़ाली कहते हुए मम्मी मेरे आँसूं पोछने लगी हालांकि उनकी आँखे ज़रूर भीग गईं थीं …

हम दोनों अपने – अपने परिवारों के रिश्तों में जकड़े हुए थे और उनकी नामंजूरी ने हमे तोड़ दिया था. उन्हें प्रेम विवाह से कोई आपत्ति नहीं थी लेकिन प्रेम अपनी जाति के लड़के या लड़की से होना चाहिए बस ! उन्हें कौन समझाता कि प्रेम दो इंसानों के बीच होता है जातियों के बीच नहीं लेकिन हमारी हर कोशिश भरभरा कर ढेर हो गई . उन्हें दुःख देकर हम अपना घर नहीं बसा सकते थे और माता – पिता की ख़ुशी से बढ़ कर कोई ख़ुशी नहीं हो सकती है हमे कोई अधिकार नहीं कि हम उन्हें तकलीफ दे अतः हमने खुद को तकलीफ दी और जुदा हो गए एक दूसरे से इस वादे के साथ कि चाहे कुछ भी हो जाये हम खुश रहेंगे सदा ….. हमने फैसला किया था कि हम जीवन के हर पल को पूरी इमानदारी के साथ जिएँगे . जीवन में आगे बढ़ेंगे अपने मम्मी – पापा की पसंद से शादी भी करेंगे और उसे निभाएंगे भी . हम अपने अतीत का कभी ज़िक्र ही नहीं करेंगे और जान बूझ कर एक दूसरे से कभी नहीं मिलेंगे लेकिन हाँ यदि कभी गलती से टकरा गए तो अनजान भी नहीं बनेंगे और मैंने ये फ़ैसला निभाया भी जैसा मेरे घर वालों ने चाहा मैंने वही किया और मेरे जीवन में मेरी हम सफ़र बन कर दिव्या शामिल हो गई . दिव्या एक बेहद सुलझे विचारों की लड़की है और उसे नौकरी करने से अधिक बेहतर घर संभालना लगता है बल्कि इतने सालों में एक वही है जिसे सभी का खयाल है मै तो इतना बिजी रहता हूँ फिर भी वो कभी शिकायत नहीं करती . मेरे दो बेटे हैं और हम एक साथ बहुत खुश हैं . लेकिन क्या शेफ़ाली ने भी अपना वादा निभाया होगा ? ये सवाल मुझे बेचैन कर गया फिर खुद ही जवाब भी कि हाँ क्यूँ नहीं ज़रूर उसने भी हमारे वादे का मान रखा होगा. पिछले बीस सालों में हम न कभी मिले न कभी हमने एक दूसरे के बारे में कुछ भी जानने की कोशिश की हाँ मुझे ये ज़रूर पता था कि हम यादों में कभी जुदा नहीं हुए लेकिन आज फेस बुक पर शेफ़ाली का इतना छोटा सा मैसेज न जाने क्या – क्या सवाल ज़हन में पैदा कर रहा है . कैसी है वो ? कहाँ है वो ? शादी हो गई ? बच्चे ? पता नहीं क्या –क्या …उसकी प्रोफाइल सिर्फ दोस्तों के लिए ही खुली है अतः वहाँ से भी कुछ नहीं पता कर सका सिवाय इसके कि वो अब भी लखनऊ में ही है शायद !
मै तो लखनऊ तब से गया ही नहीं या ये कह दो कि वो शहर मुझे पसंद ही नहीं उसने मुझसे मेरी शेफ़ाली को अलग किया था . बीस साल हो गए मै इस सपनो की नगरी मुंबई का हिस्सा बन चुका हूँ साथ ही मेरी पत्नी दिव्या मेरे जीवन का और मेरे दोनों बेटे हमारे जीवन का . ज़िंदगी कितनी तेज़ी से गुज़र गई ,बीस साल हो गए ? पूरा दिन मै बेचैन रहा और जैसे ही वक्त मिलता केबिन में जाकर अपना फेस बुक चेक करता कि कहीं कोई मैसेज तो नहीं ? बार – बार अपना फ़ोन देखता कि कहीं कोई मिस कॉल तो नहीं . इतना लम्बा दिन है आज दो – दो सर्जरी थीं आज सुबह से फिर उसके बाद ओपीडी के मरीज़ रोज तो वक्त कब गुज़र जाता है ख़बर नहीं होती लेकिन आज का दिन है कि कट ही नहीं रहा बस मुझे बेचैन किये जा रहा है. थक कर कुर्सी को पीछे करके सर की टेक कुर्सी के बैक से लगा कर आँखें बंद कर लेता हूँ कि थोडा आराम कर लूँ तभी शाम के करीब सात बजे एक अन नोन न. से कॉल आती है मेरे फ़ोन पर मै जल्दी से फ़ोन उठता हूँ कि शायद ये शेफ़ाली हो और मेरा अंदाजा बिलकुल सही होता है सुबह के इतने लम्बे इंतज़ार के बाद उधर से वही आवाज़ “ हेलो राजीव , मै शेफ़ाली ” पहचाना ? ओह ! हाय कैसी हो, कहाँ हो ? हाँ पहचानूँगा क्यूँ नहीं. “ यहीं मुंबई में हूँ किसी काम के सिलसिले में आई थी सोचा इस बार आप से भी मिल लूँ ” .यहीं मुंबई में, तो क्या इसे मालूम है कि मै यहाँ मुंबई में रहता हूँ ? और इस बार, से क्या मतलब ? क्या शेफ़ाली मुंबई आती रहती है ? लेकिन कैसे / क्यूँ ? मै मन ही मन सोचने लगा . मतलब क्या शेफ़ाली को मेरे बारे में सब पता है क्या वो अब भी ? न जाने कितने सवाल एक साथ मुझ पर हावी हो गए. “ हेलो ” क्या हुआ राजीव ? शेफ़ाली की आवाज़ ने मेरा ध्यान खींचा . और मैंने खुद को सँभालते हुए कहा हाँ शेफ़ाली मै भी तुमसे मिलना चाहता हूँ बताओ कब कहाँ मिलना है ? मै खुद तुमसे मिलने आ जाता हूँ .
“ तो फिर मिलते हैं तुम्हारे हॉस्पिटल के ठीक सामने सड़क पार करते ही बाईं तरफ जो कॉफ़ी बीन कैफ़े है वहीँ पर ठीक आठ बजे ” कहते हुए शेफ़ाली ने फ़ोन रख दिया . और मै कुछ देर तक अपनी सीट पर चुपचाप ऐसे बैठा रहा जैसे भाव शून्य. सब पता है इसे तो ये भी कि मेरा हॉस्पिटल कहाँ है उसके सामने का कैफ़े तक . क्या शेफ़ाली को मेरे बारे में सब पता है ? बीस साल हो गए लेकिन इतने सालों बाद भी शेफ़ाली की आवाज़ में वही खनक और वही सौम्यता थी , क्या शेफ़ाली सब जानती है ये सवाल बेचैन कर रहा है मुझे और मैंने तो उससे कुछ पूछा भी नहीं ये भी नहीं कि वो है कहाँ इस वक्त ? लेकिन इतना ज़रूर समझ गया कि वो मेरी व्यस्तताओं से अवगत है तभी उसने मेरे हॉस्पिटल के पास ही मिलने के लिए कहा होगा उसका इतना केयरिंग नेचर अभी भी नहीं बदला. कुछ भी हो जाये उसकी वजह से किसी को तकलीफ न हो इस बात का ध्यान तो वो हमेशा से ही रखती रही है .
कैफे में ब्लैक कलर की कॉलर वाली टीशर्ट और डेनिम जींस में बैठी शेफ़ाली बिलकुल वैसी ही लगी जैसी बीस साल पहले थी वही बड़ी – बड़ी और बोलती हुई आँखें जो उसके हेलो कहने से पहले ही बोल पड़ती थीं और होठों पर फैली हुई लम्बीईईईई सी मुस्कान जो किसी को भी अपनी तरफ़ खींच ले. बस उसकी लम्बी चोटी गायब थी और बाल पहले से काफी छोटे थे हाँ शायद वजन पहले से थोडा अधिक था . बिना किसी औपचारिकता के हम एक दूसरे के ठीक सामने बैठ गए और आँखें एक दूसरे में गड गईं . कितना कुछ पूछना था मुझे लेकिन अब एक सवाल भी नहीं निकल रहा था मुँह से . कैसे हो ? यह भी पहले शेफ़ाली ने पूछा. हाँ अच्छा हूँ और अच्छा लगा तुम्हारा यूँ अचानक मिलना. तुम सुनाओ कैसी हो ? मैंने पूछा लेकिन उसके जवाब से पहले ही शेफ़ाली ने कहा अचानक नहीं राजीव मुझे इस बार मिलना था तुमसे इस लिए मैंने तुम्हे मैसेज किया अन्यथा मै तो पिछले १५ वर्षों से यहाँ हर महीने ही आती हूँ अपने हॉस्पिटल के काम से लेकिन कभी जानबूझकर एक दूसरे की लाइफ़ में नहीं आयेंगे ये कहा था हमने और इसी वजह से मै कभी आप से नहीं मिली लेकिन आज खुद को रोक नहीं सकी राजीव. मुझे लगा कि हम क्यों न मिले ? और हम क्यों नहीं मिल रहे हैं एक दूसरे से ? हम किससे भाग रहे हैं क्या हमने कोई गुनाह किया था कभी ? क्या प्यार गुनाह है ? हमने तो सभी की ख़ुशी की खातिर अपने प्यार तक को भुला दिया फिर ? इस सवाल ने मुझे बेचैन कर दिया था राजीव क्या हम इतने कमज़ोर हैं कि अपने ही लिए गए फ़ैसले पर कायम नहीं रह सकेंगे ? जब हम उस उम्र में इतना बड़ा फैसला ले सकते हैं और पूरी ईमानदारी से उसे निभाते भी हैं तो फिर क्यूँ हम अजनबी बने हैं इतने सालों से एक दूसरे से ? मेरा भी परिवार है पति है ,बच्चें हैं और मैं बहुत खुश हूँ संतुष्ट भी फिर सिर्फ इस वजह से कि हमने कभी कोई वादा किया था अतः हम नहीं मिल सकते कहाँ तक सही है राजीव आप ही बताइये ? एक सबसे अच्छे दोस्त की कमी लगातार पिछले बीस वर्षों से खल रही है और ये कमी कहीं से भी नहीं पूरी हो सकती थी इस लिए आज खुद को तुमसे मिलने से नहीं रोक पाई …..

शेफ़ाली बोलती गई और मै चुपचाप सुन रहा था साथ ही मुझे आश्चर्य हो रहा था ये जानकर कि शेफ़ाली कितना सही कह रही है जबकि मैंने कभी इस तरह से सोचा ही नहीं था . हाँ मै उसे याद तो करता था सदा ही लेकिन बस हमेशा उसी वादे में जकड़ा रहा कि हमे कभी नहीं मिलना है. हम दोनों इतने सालों तक एक दूसरे के सबसे अच्छे दोस्त रहे और फिर प्यार हुआ हमे और फिर पिछले बीस वर्षों से हम अजनबी रहे क्यों ? जबकि हम कभी अजनबी थे ही नहीं. आज हम दोनों ही अपने-अपने परिवार के साथ खुश हैं हमारी ज़िंदगी में कोई कमी नहीं है सिवाय एक दोस्त के फिर क्यूँ न हम इस अजनबी बनी हुई दीवार को गिरा दें सोचते हुए मैं तुरंत घर फ़ोन मिला देता हूँ फ़ोन दिव्या ही उठाती है मै बोलता हूँ कि दिव्या पता है “ आज अचानक हमारी बैच मेट शेफ़ाली मिली वो किसी काम के सिलसिले में लखनऊ से यहाँ आई हुई है, क्या हम उसे आज डिनर पर अपने घर बुला लें ? ” दिव्या को तो हमेशा ही अच्छा लगता है कि उसके घर लोग आयें और वो पूरे दिल से सभी का स्वागत करती है. हाँ राजीव क्यूँ नहीं ज़रूर, मै डिनर की तयारी करती हूँ आप उन्हें ज़रूर बुलाइए कहते हुए दिव्या फ़ोन रख देती है . उधर शेफ़ाली अपने पति कार्तिक को बता रही थी कि आज वो अपने दोस्त राजीव से मिली है और उसे थैंक्स भी कह रही थी कि कार्तिक आप नहीं होते तो आज मै राजीव से नहीं मिल पाती. थैंक्स कि आप ने मुझे समझा भी और समझाया भी . लव यू कार्तिक मेरी ज़िंदगी में आने के लिए और उसे संवारने के लिए. आज आप ने मुझे बरसों बाद मेरे दोस्त से मिलवाया है, मै अभी राजीव के साथ उसके घर डिनर पर ही जा रही हूँ और आज पहली बार उसकी पत्नी और बच्चों से मिलूंगी. और हाँ कल दोपहर ठीक एक बजे मेरी फ्लाईट वहाँ पंहुचेगी मै सीधे आपके पास हॉस्पिटल ही आऊँगी आप बस ड्राइवर को भेज दीजियेगा. और बाय ..लव यू …टेक केयर कल मिलते हैं कहते हुए शेफ़ाली ने फ़ोन काट दिया. चले राजीव, दिव्या इंतज़ार कर रही होगी कहते हुए शेफ़ाली मेरे साथ मेरी कार में बगल वाली सीट पर बैठ गई और फिर न जाने हम दोनों ने कहाँ – कहाँ की और अपने बैच के हर किसी के बारे में कितनी बातें की. इतना खुल कर तो मै पिछले बीस सालों में कभी हँसा ही नहीं था जितना कि आज . आज मन को बहुत हल्का लग रहा है जैसे कि न जाने कितना भार इतने बरसों से इस मन पर था और आज अचानक वो गायब हो गया है. यूँ लगा बीस सालों के थके हुए जकड़े हुए मन को आज राहत मिली है ……..
घर पँहुचते ही दिव्या हमेशा की तरह गर्म जोशी और अपनत्व के साथ शेफ़ाली का स्वागत करती है और शेफ़ाली भी जैसे कि अपनी किसी पुरानी सहेली से मिल रही हो इस तरह दिव्या के साथ घुल मिल जाती है . दोनों बेटे शेफ़ाली आंटी द्वारा लाये गए अपने – अपने गिफ्ट पाकर खुश हो जाते हैं और थैंक्यू आंटी कह कर अपने कमरे में चले जाते हैं. खाने के बाद स्वीट डिश खाते – खाते दिव्या पूछ बैठती है कि आप दोनों जब इतने अच्छे दोस्त थे तो फिर इतने सालों तक एक दूसरे की कोई ख़बर क्यों नहीं ली ? और मै कोई जवाब तलाशूं उससे पहले ही शेफ़ाली बोल पड़ती है हाँ वही तो दिव्या ये जनाब पढ़ाई ख़त्म होते ही एम् . डी . की पढ़ाई के लिए मुंबई आ गए और मैंने वहीँ लखनऊ में ही नौकरी कर ली और फिर जल्द ही मेरी शादी भी हो गई और तुम तो जानती ही हो कि शादी के बाद ज़िंदगी में कितनी सारी नई ज़िम्मेदारियाँ शामिल हो जाती हैं बस समय का पता ही नहीं चला . नई ज़िंदगी और साथ में नौकरी भी ,फिर बच्चे …बस इन सभी के साथ अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करते –करते अब जाकर ये अहसास हुआ कि ज़िंदगी में पीछे क्या छूट गया है और बस उसी अहसास ने मुझे अपने पुराने दोस्तों की खोज के लिए मजबूर कर दिया . अचानक सर्च करते – करते जैसे ही मुझे राजीव की प्रोफाइल दिखी मैंने झट से इन्हें मैसेज किया और आज हम सब एक साथ आपके घर पर हैं.
हाँ तुम सही कह रही हो शेफ़ाली ज़िंदगी तो सच में सभी की बहुत बिज़ी हो गई है . राजीव को अपने खाने तक की सुध नहीं रहती इनका पूरा समय हॉस्पिटल में ही बीत जाता है फिर घर आकर बच्चे भी पापा के साथ समय बिताना चाहते हैं इन सबके बीच दोस्तों को याद करने की भी फुरसत नहीं मिलती . अच्छा किया कि ये पहल तुमने कर दी कम से कम इसी बहाने मुझे एक अच्छी सहेली तो मिल गई . बातें करते – करते रात के एक बज गए . अब मुझे चलना चाहिए कहते हुए शेफ़ाली उठ जाती है . नहीं इतनी रात को आप अकेले क्यूँ जायेंगी और जायेंगी ही क्यूँ यहीं रुक जाइए क्या ये आपका घर नहीं ? दिव्या कहती है . नहीं ये बात नहीं अगली बार जब आउंगी तो ज़रूर रुकूँगी दिव्या लेकिन कल सुबह की मेरी फ्लाईट है और सारा सामान होटल में है , टैक्सी भी बुक है इसलिए अभी इजाज़त दीजिये. अच्छा ठीक है लेकिन आपको होटल हम अकेले नहीं जाने देंगे . राजीव आप शेफ़ाली को छोड़ आइये मै साथ नहीं आ पाउंगी क्योंकि बच्चे सो रहे हैं . राजीव और शेफ़ाली दोनों चले जाते हैं . रात का वक्त है दोनों खामोश है होटल पँहुच कर दिव्या बस यही कहती है कि राजीव तुम लकी हो कि दिव्या जैसी सुलझी हुई जीवन साथी तुम्हे मिली है . आज तुम्हे इस तरह खुश देखकर मुझे हमारे जीवन से कोई भी शिकायत नहीं है . क्या हुआ कि हम नहीं मिले ….उससे अच्छा तो आज ये लग रहा है कि हम आज मिल सके हैं और ये मिलना अब सदा के लिए है इसमें कोई बिछोह नहीं है…..है ना कहते हुए शेफ़ाली चली जाती है मै अकेले वापस लौट रहा हूँ अपने घर अपनी दिव्या के पास . एफ़.एम् में गाना बज रहा है ‘ ये जीवन है इस जीवन का यही है ..यही है …यही है …रंग रूप !

33s टिप्पणियाँ

Filed under कहानी

नज़्म


चाहत यही
कि गुज़रे एक शाम
तुम्हारे साथ
करूँ महसूस
ज़मीं से ऊपर उड़ रहे कदमों को
हवा से लहराता हुआ बदन
कानों में गूँजता मल्हार.
चाहत ये भी कि
ठण्ड से सख्त हुए गालों पर
गर्म सेंक तुम्हारे हाथों  की
और झुकी बंद पलकों पर
अनगिनत बोसे लबों के .
चाहत ज़रा सी
शामें अनगिनत
ढल जाएगी ज़िंदगी
ऐसी ही शाम में
कि चाहत फिर भी
रहेगी ज़िन्दा
गुज़रे एक शाम तुम्हारे साथ ……!

8s टिप्पणियाँ

Filed under नज़्म

मुक्तक


तेरी साँसों की खुशबू से मेरे अहसास महके हैं,
तेरे लबों की गरमी से दिल के तार दहके हैं .
मै तुझमे हूँ तू मुझमे है ये अहसास है कैसा,
तेरी नज़रों से घायल हो मेरे जज़्बात बहके हैं .

4s टिप्पणियाँ

Filed under मुक्तक