अपनी ही तलाश में…


जीवन हर पल नया होता है इसलिए इसे किसी भी एक रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता। हर दिन के अलग-अलग अनुभव,कभी अच्छे तो कभी बुरे और कभी कुछ खास नहीं,सामान्य। यह तो सभी जानते हैं कि यही उतार-चढ़ाव जीवन का रूप हैं,यही जीवन है पर फिर भी सदा यही समझ नहीं आता कि कौन से रूप को जीवन कहा जाए और यदि ये रूप ही जीवन हैं तो फिर जीवन का अपना अस्तित्व कया है? क्या वो स्वयं अस्तित्वहीन है और अभी वो अपनी ही तलाश में है। अनेकानेक सवाल उपजते हैं मन मे जवाब की तलाश में। अनेकों रूप तो दिखते हैं पर जीवन नहीं कयोंकि इन रूपों की अपनी वजह है,अपना वजूद है अतः ये जीवन नहीं। इनका स्वतंत्र रूप ही इनकी पहचान है और ‘रूप’ में आप सुख-दुख,हास्य-क्रोध,अमीरी-गरीबी जैसी हजारों भावनायें महसूस कर सकते हैं,जिनके आधार पर जीवन के मायने तलाशने लगते हैं-किंतु ‘जीवन’ जिसकी स्वयं की कोई पहचान नहीं उसके मायने ?
‘हम खुश हैं तो जीवन अच्छा हम दुखी जीवन बुरा’यही सब मानते हैं लेकिन अच्छा या बुरा हमसे जुड़ा है जीवन से नहीं फिर इस जीवन के विषय में इतनी चर्चा क्यों,हर ज़ुबाँ पर इसी का नाम क्यों।
शायद! अस्तित्वहीन चीज़ें अपने अस्तित्व की पहचान के लिए अधिक शोर मचाती हैं ताकि कोई तो उन्हें उनकी पहचान एक नाम दिला सके,और जीवन इसमें सर्वोपरि है तभी वो हर रूप,हर बात,हर क्षण खुद को अपनी मौजूदगी बताता है और अपने होने की शिनाख़्त चाहता है। तरस आता है जीवन पर,इसकी तमाम कोशिशों पर जो भटक रही हैं अपनी ही तलाश में…

18 टिप्पणियाँ

Filed under अभिलेख

18 responses to “अपनी ही तलाश में…

  1. इस तलाश में ही तो जीवन का अर्थ छुपा है.

  2. जीवन तलाशता है
    खुद को
    दिखता है जैसा देखो उस को
    नहीं पहचान पाया कोई
    थाह उसकी
    नहीं जान पाया आज तक
    उसको
    जीवन तो जीवन है
    जिसने जैसा भी भुगता
    वैसा ही समझा उस को

  3. जीवन शायद हमारी ही विचारों और इच्छाओं का ही प्रतिबिम्ब होता है, जैसे हमारे विचार पल-पल बदलते रहते हैं, जीवन रूपी प्रतिबिम्ब भी निरंतर बदलता रहता है| और जिस तरह से एक बच्चा अपनी ही परछाईं का पकड़ने की कोशिश करता रहता है, हम भी अपने जीवन को खुद से बाहर तलाशते रहते हैं|

  4. जीवन अतः भगवान को जानने का प्रवास है ,
    रास्ते अलग-अलग तो व्याख्या भी भिन्न है ,
    इसकी तलाश मे ‘उसे’ भूलो तो प्रवास व्यर्थ है,
    रास्ता जरूरी या ‘वह’ यही जीवन का अर्थ है |
    सुंदर विचार , धन्यवाद |

  5. बहुत ही अनुपम भाव संयोजन …

  6. कितना सुन्दर लिखती हैं आप इंदु! ‘कविता लिखी नहीं जाती स्वतः लिख जाती है’…अब क्या कहेंगी आप? गद्य भी स्वतः ही लिख जाता है? बधाई! शुभकामनाएं! I’m sorry but due to some technical fault at worldpress my comment is not being accepted under your post, hence this mail. Regards…Amit Agarwal

    Amit ji aapka comment hum paste ker rahe hai’n.
    aur bhi logo’n ki mail aa rahi hai ki comment publish nahi ho raha hai,i hope ki jo bhi prob hai,jald theek ho jaaye….

    Regards
    indu

  7. for some reasons i am unable to post on wordpress
    your new creation
    is
    AAA
    awesome as always !!

    ‘हम खुश हैं तो जीवन अच्छा हम दुखी जीवन बुरा’यही सब मानते हैं लेकिन अच्छा या बुरा हमसे जुड़ा है जीवन से नहीं फिर इस जीवन के विषय में इतनी चर्चा क्यों,हर ज़ुबाँ पर इसी का नाम क्यों। 🙂

    Thanks & Regards,
    Rahul Miglani

    rahul ji ye raha aapka comment 🙂

  8. बिलकुल सही बात कही है आपने।

    सादर

  9. कल 16/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

  10. Neeraj Kumar
    11:42 AM (19 minutes ago)

    to me
    Comment on:

    https://hridyanubhuti.wordpress.com/2012/03/14/अपनी-ही-तलाश-में/

    Jeevan is deh se hai aur sukh aur dukh isi sharir se upajte hain.jeevan aur sharir ek dusre ke purak lagte hain. jeevan khatm,sharir khatm yaa sharir khatm tab jeevan khatm. Kuch pata nahi chalta, aur is kuch pata nahi chalne ki isthiti ke saath hamara astitva bhi ek di khatm ho jata hai. Sab kuch aise hi chalta hai aur humlog isko dekhne samjhne ka prayas karte hai aur likhte hai. ek gehri soch se upja hai aapka ye ank.

  11. inducares

    Life is an enigma really & you have portrayed it very well.

  12. इस उम्दा लेखन के लिए बधाई!!

  13. bahut sahi likha induji ….kudh ki talash me to jindagi kya hum hi kho jate hai

  14. yeh humaari soch hai jo humein majboor karti hai ki hum apne aap ko, apne dukh sukh ko, jeevan ke saath jodh dete hai!

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